39 वर्षीय इस कवि के चार कविता संग्रह निकल चुके हैं।उनके यूट्यूब के 40 लाख लोग फ़ॉलोवेर्स हैं।वह बेबी मिल्क एक्शन आंदोलन की नेत्री है जिसका काम विश्व में स्तनपानको बढ़ावा देना है।embareassed कविता भी स्तनपान को लेकर समाज विशेषकर पुरुषों के नज़रिए के विरोध में लिखी गयी है।
प्रसिद्ध अनुवादक यादवेंद्र ने इस कविता का अनुवाद किया है और एक टीप भी लिखी है।
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2018 की बहुत चर्चित बात है – कोलकाता की एक युवा स्त्री सात माह की बेटी को लेकर महानगर के एक सबसे बड़े शॉपिंग मॉल में जाती है और बच्ची की भूख लगती है – यहाँ वहाँ घूमते हुए वह ऐसे स्थल की तलाश करती है जहाँ बैठ कर बच्ची को अपना दूध पिला सके,और उसकी प्राइवेसी भी बनी रहे। उसे कोई ऐसी जगह नहीं मिलती,मॉल के कर्मियों से पूछने पर उसे टॉयलेट में जाकर दूध पिलाने को कहा जाता है पर वहाँ इतनी दुर्गंध थी कि वह अंदर ठहर नहीं पाती। उसके अनुनय विनय करने पर एक स्टोर मालिक ने बच्ची को दूध पिलाने की इजाजत दे दी। पर यहाँ उसकी परेशानी का अंत नहीं हुआ – घर पहुँच कर डॉक्टर स्त्री फेसबुक पर अपनी व्यथा बयान करती है तो शॉपिंग मॉल वालों को बड़ी तेज मिर्ची लगती है। सोशल मीडिया की उग्र प्रतिक्रियाएँ मालिकों को और भड़का देती हैं – वे उस पीड़ित माँ को उपदेश देते हुए लम्बी प्रतिक्रिया लिखते हैं कि बच्ची को दूध पिलाने जैसा घरेलू काम घर में निबटा कर आया करो … यह मॉल खरीब फ़रोख्त करने के लिए बना है बच्चे को दूध पिलाने के लिए नहीं ( शब्द इधर उधर हो सकते हैं भाव यही है) इसके बाद मॉल ने अपनी वॉल से प्रतिक्रियाओं वाला हिस्सा हटा दिया।
गलती इंसानी फितरत है पर इस चोरी के बाद ऐसी अश्लील सीनाजोरी बिरले ही देखने में आती है … इस बेहद शर्मनाक घटना ने मुझे अनायास कुछ साल पहले लिखी यह मर्मस्पर्शी और अंदर तक छू जाने वाली कविता याद दिला दी।
समसामयिक विषयों पर मुखर प्रतिक्रिया देने वाली ब्रिटेन की अत्यंत लोकप्रिय युवा “स्पोकन वर्ड” कवि हॉली मैक्निश ने स्तनपान से जुड़े लज्जाभाव और परेशानी को व्यक्त करने वाली कविता “इम्बैरेस्ड” ( अनुवाद करते हुए मैंने उसको शर्मिंदा शीर्षक दिया) लिखी जो यू ट्यूब पर लाखों लोगों द्वारा दुनिया भर में देखी और सराही गयी। कैम्ब्रिज में रहने वाली मैक्निश के कविता संकलन और एल्बम बाज़ार में हैं और स्लैम पोइट्री के अनेक ख़िताब वे जीत चुकी हैं। वास्तविक घटनाओं से उपजी इस कविता को लिखने के बारे में वे बताती हैं :
“यह कविता मैंने अपने छः महीने की बच्ची के सो जाने पर पब्लिक टॉयलेट में लिखी। मैं दिनभर बेटी के साथ शहर में यहाँ वहाँ घूमती रही और जब उसको दूध पिलाने लगी तो सामने से किसी ने कॉमेंट किया कि इतने छोटे बच्चे को लेकर मुझे घर में रहना चाहिये ,बाहर निकलने की क्या दरकार है। छोटे बच्चों को हर दो तीन घंटे बाद भूख लगती है और उन्हें दूध पिलाना पड़ता है,और हर दो तीन घंटे बाद काम धाम छोड़ कर घर भागना मुमकिन नहीं है – वैसे भी यह तर्क निहायत मूर्खतापूर्ण है। पर यह कॉमेंट सुनकर मैं शर्म से भर उठी और अगले छः महीने बच्ची के साथ अकेली होती तो दूध पिलाने के समय भाग कर टॉयलेट में घुस जाती – साथ में ब्वॉय फ्रेंड ,दोस्त मित्र या माँ हुई तो अलग बात है। मुझे ऐसा करते हुए हमेशा अपने आपसे घृणा हुई पर करती क्या – डर ,घबराहट और झेंप घेर लेती। अब जब टीवी या मीडिया के बारे में सोचती हूँ तो अजीब लगता है कि न किसी सोप में न किसी कार्टून में या और न कहीं और ही किसी स्त्री को बच्चे को दूध पिलाते हुए दिखाते हों – भूल कर भी नहीं। अंग्रेज़ और अमेरिकी इस बात से डर कर बहुत दूर भागते हैं – मुझे यह बहुत अजीब सा लगता है। मुझे अपने देश की संस्कृति बेहद अजीब लगती है जहाँ लोगबाग पैसों से हर सूरत में चिपके रहते हैं। मुझे बड़ी शिद्द्त से महसूस होता है कि कुदरत ने जो नियामत हमें बिना कोई मूल्य चुकाये बख्शी है – अपने शरीर को लेकर मैं उन खुश नसीबों में शुमार हूँ – उसके लिए भारी भरकम राशि खा म खा चुकाते रहने वाले माँ पिता की तादाद हमारे समाज में कम नहीं है।खुद मेरी अनेक सहेलियाँ हैं जिनका बच्चों के लिए फॉर्मूला खरीदते खरीदते दिवाला निकल जाता है पर उन्हें अपना दूध पिलाने में शर्म आती है। आखिर हम खरबपति कंपनियों को वैसी चीज़ से मुनाफ़ा क्यों कमाने दें जो हमारे शरीर में बगैर कानी कौड़ी चुकाये भरपूर मात्र में उपलब्ध है। मार्केटिंग की यह कितनी कुशल रण नीति है कि हम ऐसा कुछ करना अनुचित समझने लगते हैं- यह सोच सोच कर मैं हर आते दिन ज्यादा उदास हो जाती हूँ। अब वह दिन दूर नहीं जब हम टेस्कोज़ मॉल में पसीने की बोतल खरीदने जाया करेंगे और रात में पढ़ने के लिए इलेक्ट्रॉनिक किताबें — पढ़ें और साथ साथ खरीदे हुए पसीने की बूँदें अपने बदन पर मलते रहें। आप इन्तजार कीजिये …
मेरा ऐसा कोई आग्रह नहीं है कि दूसरों के विचार बदल डालूँ ,बस यह चाहती हूँ कि मेरी बात लोगों तक सीधे सीधे पहुँच जाये – जब यह बात लोगों की समझ में आकर प्रतिध्वनित होने लगती है तो बहुत ख़ुशी होती है। स्तनपान पर लिखी इस कविता के बारे में ढेर सारे लोगों ने मुझे ई मेल किये ,उसको बार बार पढ़ा सुना और आश्वस्त हुए ,और घर से बाहर निकल कर स्तनपान कराते हुए ज्यादा सहज महसूस किया।”
शर्मिंदा
—– हॉली मैक्निश
मैं अक्सर सोचती हूँ पब्लिक टॉयलेट्स में दूध पीना
कहीं उसको क्रुद्ध तो नहीं करते
फैसले लेने की मनमानी से
और खा म खा की विनम्रता ओढ़े ओढ़े
अब मैं खीझने लगी हूँ
कि मेरी बच्ची की शुरू शुरू की घूँटें
सराबोर हैं मल की दुर्गन्ध से
हर वक्त घबरायी और असहज रहती
जन्म के बाद के महीनों में जब जब उसको दूध पिलाती
जबकि चाहा सबकुछ अच्छा हो उसके सुंदर जीवन में ….
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मुझे आठ हफ़्ते लगे जब हिम्मत जुटा पायी
कि निकलूँ सबके सामने शहर में
और अब लोगों की फब्तियाँ हैं
नश्तर की तरह आर पार काटने को आतुर ….
भाग कर घुस जाती हूँ टॉयलेट के अंदर
इसमें भला क्या है जो अच्छा लगे …….
मुझे शर्म आती है कि
मेरे बदन की पल भर की कौंध कैसे लोगों को ठेस मार देती है
जिसकी मैंने कोई नुमाइश नहीं लगाई
न ही उघाड़ कर दिखलाती ही हूँ
पर लोग हैं कि मुझे घर के अंदर बंद रहने की हिदायत देते हैं
एक सहेली को धक्के मार मार कर
लगभग फेंक दिया लोगों ने बस से नीचे
और दूसरी औरत को खदेड़ दिया
बच्चे सहित पब से बाहर …
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जीसस ने इस दूध को पिया
ऐसा ही सिद्धार्थ ने किया
मुहम्मद ने किया
और मोज़ेज ने किया
दोनों के पिताओं ने भी ऐसा ही किया
गणेश शिव ब्रिजिट और बुद्ध
सब के सब ऐसा ही करते रहे
और मैं पक्के भरोसे के साथ कह सकती हूँ
कि बच्चों ने भूख से पेशाब के भभकों को
बिलकुल गले नहीं लगाया
उनकी माँओं को मुँह छुपाने के लिए सर्द टॉयलेट की सीटों पर
मज़बूरी में घुस कर बैठना पड़ा लज्जापूर्वक …
वह भी ऐसे देश में जो अटा पड़ा है
वैसे विशालकाय इश्तहारों से
जिनमें यहाँ से वहाँ तक चमकते दमकते हैं
स्तन ही स्तन …….
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प्रदूषण और कचरे से बजबजाते शहरों में
उनको खूब अच्छी तरह मालूम है
कि बोतल दूध पीने वाले ढेरों बच्चे मर जाते हैं
शहरों में तो पैसों की लूट पड़ी है जैसे हों मिठाई
और हम चुका रहे हैं भारी कीमत उसकी
जो कुदरत ने हमें नियामत बख्शी है बे पैसा
शहरों के अस्पताल में पटापट मर रहे हैं बच्चे
उलटी दस्त से पलक झपकते
माँओं का दूध पलट सकता है पल भर में यह चलन
इसलिए अब नहीं बैठूँगी सर्द टॉयलेट की सीटों पर
चाहे कितना भी असहज लगे बेटी को सबके बीच दूध पिलाते
यह देश अटा पड़ा है
वैसे विशालकाय इश्तहारों से
जिनमें यहाँ से वहाँ तक चमकते दमकते हैं
स्तन ही स्तन …….
अब हमें यहाँ वहाँ बच्चों की दूध पिलाती माँओं को
देखते रहने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।
( भावानुवाद : यादवेन्द्र)
साभार:स्त्री दर्पण पेज
सौजन्य:डॉ रीता दास राम