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विनोद आनंद द्वारा लिखित ‘बाजपट्टी संग्राम के नायक: सिर्फ रामफल मंडल’ ही नहीं बल्कि 1942 के विस्मृत शहीदों का है इतिहास

समीक्षक :-सिनोद कुमार मंडल .नेत्र चिकित्सक,केवटी, दरभंगा समीक्षक का आत्म कथ्य -साहित्य अध्ययन मे रुचि औऱ उसके विश्लेषण करने का प्रयास रहता है, बाजपट्टी संग्राम के नायक:रामफल मंडल को पढ़…

राखी का धागा और लोकतंत्र का सवाल

राखी का धागा केवल भाई-बहन के रिश्ते को नहीं जोड़ता, बल्कि हमें हमारी सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास भी कराता है। जब यही भावना पूरे समाज में फैलती है, तो एक…

शिवोहम पब्लिकेशन हाउस: नवोदित लेखकों के सपनों को पंख देता एक साहित्यिक मंच

सा हित्य किसी भी सभ्य समाज का प्राण होता है, जो न केवल शब्दों का एक संग्रह मात्र है, बल्कि यह हमारे समाज, संस्कृति, संवेदनाओं और विचारों का एक जीवंत…

विष्कन्या का प्रेम : विष से विदेह तक: विनोद आनंद के उपन्यासों में मिथक, संवेदना और नवीन दृष्टि का अनुशीलन

विनोद आनंद की साहित्यिक प्रतिभा की सराहना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि उन्होंने पत्रकारिता की वस्तुनिष्ठता और साहित्य की भावुकता का एक दुर्लभ संतुलन साधा है। वे न केवल एक…

पुस्तक समीक्षा – “वो नदी का किनारा” : स्मृतियों, संवेदनाओं और जीवन प्रवाह का काव्यात्मक प्रतिबिंब

पुस्तक : वो नदी का किनारा लेखक : अनिश राय प्रकाशक : शिवोहम प्रकाशन शिवोहम प्रकाशन की इस कृति की एक भावपूर्ण साहित्यिक मीमांसा नदी केवल जल का प्रवाह नहीं…

पुस्तक समीक्षा – “शृङ्गार रस” : प्रेम, सौंदर्य और संवेदनाओं का काव्यात्मक उत्कर्ष

पुस्तक : शृङ्गार रस साझा काव्य संकलन सम्पादक : ऋषभ विश्वकर्मा प्रकाशक : शिवोहम प्रकाशन शिवोहम प्रकाशन की इस कृति की एक रसात्मक साहित्यिक मीमांसा भा रतीय काव्य परंपरा में…

शहीद रामफल मंडल पर केंद्रित विनोद आनंद की कविताएं

कवि परिचय :- विनोद आनंद ( विनोद कुमार मंडल ) शिक्षा :- एम ए (हिंदी )रांची विश्व विद्यालय, रांची पिछले चार दशक से पत्रकारिता, औऱ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय,…

राजेश्वरी बाजपेई की तीन कविताएं

सर्दियों का ठहाका *************** हाय सर्दी की यह ठंड या प्रकृति का है सभी को दंड? हंसी-खुशी प्यार से सब इसे कहते “गुलाबी ठंड” थोड़ी रहम का बने यदि मापदंड…

संस्मरण : मिट्टी से दूर, आत्मा के पास

गांव की संस्कृति से दूर, शहर की भीड़ में खो जाने की पीड़ा – यह सिर्फ मेरी नहीं, लाखों युवाओं की व्यथा है। सोचता हूं – क्या किसी दिन ऐसा…

किताबों के जंगल में एक खिड़की

हिंदी की दुनिया— जहाँ एक बूढ़ा कवि हाथ जोड़े खड़ा है मुख्यमंत्री के सिंहासन पर बैठे फ़ासीवादी पुरोहित के आगे। तीस लाख का चेक, छत्तीसगढ़ की मिट्टी से रिसता रक्त,…