उ न दिनों ज्यादातर पुरोहित खानदान में विधवा के पुनर्विवाह की मनाही थी। नियमानुसार बुआ को या तो काशी के किसी विधवा आश्रम जाना पड़ता या ताउम्र घर पर ऐसे ही विधवा वेष में रहना था। मेरे दादा जी की मेरे पिता जी और बुआ केवल दो ही संताने थी। इसलिए पिता जी के कहने से बुआ को यहीं रहने दिया।

बलवान सिंह कुंडू ‘सावी ‘
पि ता जी अपने भाग्य पर खूब इठलाते थे। उसका कारण भी था उनके पांचो बेटे और तीन बहुएं सरकारी नौकरी कर रहे थे। हमारे गांव में ओर किसी के बच्चे इतने कामयाब नहीं हुए थे। दोनों बड़े बेटे कॉलेज में प्रोफेसर थे बाकि तीनों सरकारी स्कूल में अध्यापक थे।
वे अपने परिवार को अमृत से भरा कलश मानते थे। गांव में उनका विशेष मान -सम्मान था। परन्तु बुआ को वे मन ही मन एक बूँद विष भी मानते थे।
उसका कारण भी था बुआ बहुओं से कुछ ज्यादा ही टोका -टोकी करती रहती थी। इस कारण बहुएं उन्हें पसंद नहीं करती थी और उसके कारण हमारा परिवार टूट रहा था।
दोनों बड़े भाई एक शहर में रहने लगे थे। एक भाई ने जानबूझकर अपना तबादला शहर के नजदीक करवा कर उसी शहर में रहने लगा था। सबसे छोटा भाई गांव में अलग होकर रहने लगा था।
अब बुआ मेरे साथ रहती थी। वो मेरे पिता जी से बड़ी थी और बड़े होने का फायदा भी उठाती थी। वह मेरी मां और पिता जी पर अपना हुक्म चलाती थी। माँ चुपचाप अपना काम करती रहती और स्वभाववश वो किसी को कुछ नहीं कहती।
उसकी अपनी किसी बात पर कोई राय नहीं होती और वो किसी बात पर किसी से बहस करते मैंने कभी नहीं देखी इसलिए बहुओं को उनसे कोई शिकायत नहीं होती थी।
मेरे दादा जी अपनी थोड़ी सी जमीन पर खेती-बाड़ी के साथ -साथ पुरोहिताई का काम करते थे गांव के लोग उनसे एकादशी, अमावस, बारिश-बादल बारे पूछते रहते। वो सबको अपने जवाब से संतुष्ट कर देते। जब बुआ दस साल की थी तो उनकी शादी कर दी गई थी।
लगभग तेरह-चौदह साल की उम्र में उनका गौना कर दिया। वे अपनी ससुराल में चार-पाँच दिन
रह अपने मायके आ गई। उसी समय मेरे फूफा जी को डाक- तार विभाग में नौकरी मिल गई। उनको मध्य प्रदेश में पहली पोस्टिंग मिली,जो शहर से बहुत दूर जंगली इलाके में थी।वहां उनको गए कुछ महीने ही हुए थे कि मलेरिया होने से बीमार पड़ गए और वहीं स्वर्ग सिधार गए।
उनके एक साथी जो हरियाणा से थे उनके साथ ही कमरे में रहते थे।उन दिनों इतनी दूर और दूरदराज के क्षेत्र से शव को लाना संभव नहीं था,इसलिए उन्होंने उनका वहीं दाह -संस्कार करवा दिया और एक लोटे में अस्थि अवशेष पहुंचा दिए।
बुआ को कुछ दिनों के लिए ससुराल ले जाया गया ताकि कुछ संस्कार करवा उनके पति को मुक्ति मिल सके। उसके बाद बुआ वापस मायके आ गई।
उन दिनों ज्यादातर पुरोहित खानदान में विधवा के पुनर्विवाह की मनाही थी। नियमानुसार बुआ को या तो काशी के किसी विधवा आश्रम जाना पड़ता या ताउम्र घर पर ऐसे ही विधवा वेष में रहना था। मेरे दादा जी की मेरे पिता जी और बुआ केवल दो ही संताने थी। इसलिए पिता जी के कहने से बुआ को यहीं रहने दिया। मेरे दादा जी भी बुआ को अपने पास घर पर ही रखना चाहते थे क्योंकि वे काशी में आश्रम में रहने की तकलीफ जानते थे। इस हादसे के बाद दादा जी पूर्णतः टूट गए थे और बीमार रहने लगे थे। उनका मन पुरोहिताई में बिलकुल नहीं लगता था।
उन्होंने अपने यजमानों के घर जाना लगभग छोड़ दिया था। लगभग दो साल बाद वो चल बसे।
मरने से पहले उन्होंने मेरे पिता जी को कहा-जितने हमारे पास खेत हैं उनमें खूब कमाना परन्तु पुरोहित कर्म के पास बिलकुल नहीं जाना न ही मेरे पौतों को जाने देना। उन्होंने ऐसा क्यों कहा था उसका कारण तो उन्होंने कभी नहीं बताया पर शायद बुआ….।
मरने से पहले उन्होंने मेरे पिता जी को कहा-जितने हमारे पास खेत हैं उनमें खूब कमाना परन्तु पुरोहित कर्म के पास बिलकुल नहीं जाना न ही मेरे पौतों को जाने देना। उन्होंने ऐसा क्यों कहा था उसका कारण तो उन्होंने कभी नहीं बताया पर शायद बुआ….।
उन्होंने पिता जी से ये भी कहा कि वो बुआ को मान सम्मान से रखे। इसी कारण पिता जी और माँ से ऊपर हमारे घर में बुआ का स्थान रहा।
दादा जी के जाने के बाद पिता जी ने खूब खेत कमाए। हमारे पास खेत थोड़े थे इसलिए वे कुछ खेत बंटाई पर ले लेते थे। हम सब भाई पढ़ने के साथ -साथ खेती -बाड़ी और पशु चराने में उनका साथ देते। बुआ घर में बड़ी होने का हम सब पर रौब जमाती। उनके इसी रौब की आदत के कारण बहुओं से नहीं बन पाई।बुआ अब बहुत धार्मिक बन गई थी।
उनका ज्यादा समय भजन कीर्तन सुनने- सुनाने में बीतता। अगर पिता जी उनको कभी कुछ कह भी देते तो वे किसी धार्मिक स्थल पर जाकर रहने की धमकी देती इसलिए पिता जी चुप रह जाते और कई बार बेवजह डांट खाते।
कुछ साल बाद पिता जी वृद्धावस्था में चल बसे। बुआ अब मेरे साथ रहती और उसके कारण मेरी पत्नी और बेटियाँ भी बहुत धार्मिक बन गई थी। अब बुआ की आयु भी नब्बे साल से ऊपर हो चुकी थी। वो बीमार भी रहने लगी थी। बुआ के पास उसकी सारी उम्र की लगभग दस लाख रुपए जमा पूँजी थी।
बुआ गांव की औरतों को ब्याज पर रूपए देती और बाकि पैसा हमारे गांव के बैंक में रखती।
बैंक हमारे घर के बिलकुल पास था इसलिए उसे लेनदेन में असुविधा नहीं होती। अगर बुआ के कभी कुछ पैसे खर्च हो जाते तो वह सारा दिन उदास रहती।

इस बार दीपावली नजदीक थी और बुआ ने हम पांचो भाइयों और हमारी पत्नियों को अपने पास बुला लिया। हमारी पत्नियाँ खुश थी कि बुआ उनको कुछ गहने इत्यादि उपहार में देंगी। परन्तु बुआ ने कहा-अब उसका अंत नजदीक है और वह सारे परिवार से इक्कठे मिलना चाहती थी और अपनी इच्छा बताना चाहती थी।
बुआ ने कहा उसके पास दस लाख रुपए हैं। तुमने इनमें से दो लाख रुपए मेरे भोज पर खर्च करने हैं। कोई भी साधु, ब्राह्मण या गाँवो की बेटी भोज से बगैर दक्षिणा या नेग के खाली न जाए। उसने दो लाख रुपए गांव के मंदिर पर खर्च करने को कहा। बाकि के छह लाख रूपए नजदीक के धार्मिक स्थल की धर्मशाला को देने को कहा। मेरे बड़े भाई ने मेरी तरफ इशारा करके कहा-बुआ क्या इसकी लड़कियों के लिए कुछ……..?
बुआ कुछ नहीं बोली और चुपचाप उठ कर चली गई। फिर मेरे भाई ने कहा-बुआ दानकर्ता में आपका नाम कैसे लिखवाना है। इस पर बुआ ने फ़ौरन कहा-मेरे साथ तुम्हें स्वर्गीय फूफा का नाम और उनके ही गांव का नाम लिखवाना है। विवाह के बाद औरत का सब कुछ अगले के अनुसार होता है, यही धर्म -शास्त्र कहते हैं।
मैं कुछ देर के लिए हमारे देश की संस्कति, पूर्वजों के संस्कार और परम्परा बारे सोचता रहा कि कैसे संस्कार हैं जो इतना त्याग करना सिखाते हैं, इसी कारण प्रभु राम ने……?
लगभग छह महीने बाद बुआ स्वर्ग सिधार गई। हमने सब कुछ बुआ की इच्छा अनुसार किया। कुछ दिन बाद मैं और मेरा बड़ा भाई धर्मशाला में बुआ के छह लाख रुपए दान देने गए।
धर्मशाला में चार- पाँच पहलवान किस्म के व्यक्ति बैठे थे। हमने उन्हें बुआ के नाम का खुदा पत्थर और सारे रुपए दे दिए। वहां के प्रधान ने बताया इतने रुपए में बुआ के नाम से दो कमरे बन जाएंगे। हम वहां से चल पड़े। वापस आते समय मेरे भाई ने बताया कि कई साल से यह पहलवान धर्मशाला पर कब्ज़ा जमाए बैठा है। पहले चुनाव होते थे मगर अबवो भी नहीं होते। बगैर पैसों के यहाँ कोई कमरा नहीं दिया जाता।
खैर हमने तो सब कुछ बुआ की इच्छा अनुसार ही करना था। अपने घर आते समय बस में बैठा मैं सोच रहा था मेरी तीनों लड़कियां सारा दिन बुआ के पास रहती थी। वे उनसे थोड़ा हँसी मज़ाक करती रहती और बुआ का मन बहलाती।
बीमार पड़ने पर बुआ की खूब सेवा करती। उन्होंने बुआ को मां और दादी से ज्यादा प्रेम और सम्मान दिया। उसके जाने के बाद उनका रो- रोकर बुरा हाल था। उनको संभालना मुश्किल हो रहा था परन्तु बुआ ने उनको क्यों कुछ नहीं दिया। धर्म ने बुआ को ऐसा क्या दिया? इतना लम्बा कष्टमय वैधव्य जीवन। जिस शहर में बुआ ने कमरे दान किए थे वहां पहले ही कितने कमरे खाली पड़े थे। शायद बुआ अपना अगला जन्म संवारना चाहती थी जो सारी उम्र इन रुपयों को दान करने के लिए जोड़ती रही।
जिस गांव का नाम बुआ ने लिखवाया था उन्होंने कभी भी उनका हालचाल तक नहीं पूछा। उसके मरने या जीने से उनको कोई मतलब नहीं था। अगर बुआ इन पैसों से गाँव के कुछ गरीब परिवारों की मदद करती तो उनके सर पर छत होती। वे गरीब लोग बुआ के नाम की ख्याति दूर- दूर तक फैला देते। तब वो एक बूँद विष अवश्य ही हमारे गाँव की एक बूँद अमृत बन जाती लेकिन………?