डॉ. शिवनन्दन सिन्हा की तीन कविताएं
परिचय
आर० एस० मोर कॉलेज में लेक्चरर हिन्दी के रूप में नौकरी प्रारम्भ कर विनोवा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग ( झारखंड ) से विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग के पद से सेवानिवृत्त।
प्रकाशित रचनाएं
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1. मध्यकालीन हिन्दी साहित्य
2. मगही और खोरठा का भाषा वैज्ञानिक मूल्यांकन
3. विचार और मूल्यांकन
4. रोशनी का समुद्र ( काव्य )
5. पहाड़ पर धूप ( काव्य )
6. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में चार दर्जन से अधिक आलेख एवं पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित।
7. आधे दर्जन से अधिक पुस्तकें सम्पादित।
8. विभिन्न पुस्तकों में भूमिका – लेखन।
पम्प मारती औरत
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शिवनन्दन सिन्हा
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श हर की व्यस्ततम सड़क के किनारे
फुटपाथ पर
देर शाम गए
वे हर रोज़ चले आते
पूरी एक छोटी बस्ती लिए
और डाल देते डेरा सड़क किनारे
आने – जाने वालों की तकलीफ़ से बेफिक्र
वे जुट जाते रोटी -भात बनाने में
उनके साथ पूरा घर – बार रहता
पूरा परिवार भी साथ रहता
पति – पत्नी, बेटे – बेटी सभी
मर्द की भांति औरत भी
बलिष्ठ और गदराई देह वाली
बच्चों को दूध,घी, टॉनिक नहीं मिलते
तब भी प्रकृति ठीक – ठाक रखती
जाड़े में भी सभी
एक गाढ़े की चादर ओढ़ सो जाते
बहुत होता तो एक कम्बल
ऊपर से डाल लेते
वर्षा से बचने के लिए
तंबू तान देते
या फिर
दूकान के छज्जे के नीचे
पानी से बचाव कर लेते
अधिकांश रातें
खुले आकाश के नीचे बीततीं
व्यस्त सड़क पर
रातभर
गाड़ियां चलतीं
गाड़ियों के चलने से
उनकी नींद में अन्तर नहीं पड़ता
दिनभर के थके -मांदे
सो जाते निढाल
प्रातः जब नींद खुलती
सूरज कुछ ऊपर चढ़ चुका होता
सभी दैनिक कार्य में लग जाते
औरतें खाना बनातीं
मर्द पूरे दिन की तैयारी में लग जाते
उनका आखिरी कार्य होता
हवा भरना
बैलूनों को बड़ी आसानी से
फुला लेते, किन्तु
ठेले के चारों पहिये की जांचकर
फिर एक – एक पहिये में हवा भरना
अनिवार्य होता
और कठिन भी
इस कार्य में
मर्द और औरत
दोनों साथ – साथ काम करते
मर्द पम्प के अग्र भाग को सम्भालता
औरत पम्प मारती जाती
पम्प मारती औरत छंद लिखती
संगीत फूटते जाते
ताल और लय का अपूर्व संयोजन होता
पम्प के उतार – चढ़ाव के साथ
औरत की उठती – गिरती देह
एक लय में बजती रहती
श्वेद से तर-बतर उसकी देह
कस्तूरी नाभि बसै का आभास कराती
मधुर लगती
दिन के एक पहर
बीतते न बीतते
पूरी तरह जगह ख़ाली हो जाती
सभी अलग -अलग दिशा में
निकल पड़ते
फेरी लगाते
बैलून लीजिए
खिलौना लीजिए
रोबोट लीजिए
इसी तरह और भी
शाम होते
सभी लौट जाते
उसी स्थान पर
एक छोटी बस्ती के साथ
आत्म सम्मान से लबालब
आत्म गौरव से पूर्ण
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ततॉंरा — वामीरो
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शिवनन्दन सिन्हा

ततॉंरा ——- सुंदर, सुशील, धैर्यवान और परिश्रमी
दिनभर का
मन और शरीर का थका
संध्या में
समुद्र तट पर जा बैठा
सिंदूरी सूरज
अपनी सभी किरणों के साथ
समुद्र की देह में समा रहा था
ततॉंरा स्वयं को विलीनकर
उसी सौंदर्य को पी रहा था
कि पास कहीं
एक सुरीली आवाज
पूरे परिवेश को
भींगो रही थी
ततॉंरा भींग रहा था
किन्तु उसे
उस सुरीली आवाज की तलाश थी
ततॉंरा की आंखें
लगातार उसे ढूंढ रही थीं
कि ततॉंरा को
दूर किन्तु पास
एक लड़की
गाती दीखी
वह गाती जा रही थी
साथ – साथ
लहरों से खेल रही थी
अकस्मात् एक बड़ी लहर आई
लड़की को भींगो गई
गीत के तार टूट गए
ततॉंरा बोल उठा
ऐ लड़की गाओ
लड़की चुप थी
ततॉंरा बोल रहा था — गाओ – गाओ
लड़की क्रोधित थी
उसके समाज में
अंजान लड़के को
बात करने का अधिकार नहीं था
लड़की ने क्रोधित मुद्रा में ही पूछा
ऐ लड़के
तुम्हारा क्या नाम है
लड़का बोले जा रहा था
ऐ लड़की गाओ
रुक क्यों गई
लड़की ने पुनः पूछा
ऐ लड़के
तुम्हारा क्या नाम है
लड़का उसके सौन्दर्य में भींग रहा था बेसुध
बोल रहा था —–
ऐ लड़की गाओ
रुक क्यों गई
लड़की बोल उठी
‘ मैं नाम पूछ रही हूं
और तुम गाने की बात कर रहे हो ‘
लड़का पास होकर भी
कुछ सुन नहीं पा रहा था
उसके भीतर तक गीत कहीं
समा गया था
लड़के को जब चेतना आई
बोला —- ततॉंरा,
और तुम्हारा नाम
लड़की ने कहा —-
वामीरो
ततॉंरा ने प्रस्ताव रख दिया —-
कल इसी समय यहीं मिलूंगा
लड़की ने न में उत्तर देते हुए कहा —-
दूसरे गांव के लड़के से मिलना
पूर्णतः प्रतिबंधित है
दूसरे दिन ततॉंरा प्रतीक्षारत था
एक एक पल
पहाड़ बन रहा था
कि वामीरो प्रकट हुई
दोनों के भीतर
कुछ बह रहा था
दोनों का मिलना
अप्रकट नहीं रहा
परिजन से समाज तक
विरोधी हो गए
दोनों को क्रोध झेलना पड़ा
ततॉंरा ने कमर से बंधी
लकड़ी की तलवार खींच
क्रोध में
जमीन में दे मारी
जमीन दो टुकड़े में बॅंट गई
ततॉंरा जमीन के जिस भाग में था
वह समुद्र में डूबता चला गया
ततॉंरा के मुख से निकलती आवाज
वा मी रो
समुद्र की गहराई में डूबती चली गई
ततॉंरा और वामीरो की प्रेम कहानी
अंदमान द्वीप में
आज भी तैर रही है
समुद्र की हर लहर से
आवाज आती है
वा मी रो
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हिंदी की जाया
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शिवनन्दन सिन्हा
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प्राकृत की पुत्री हिंदी
देववाणी की गोद पली
विश्व भाषा के शब्दों से
अपनी हिंदी श्रृंगारित हुई
विभिन्न भाषियों के बीच
सम्पर्क की भाषा हिन्दी
बहुभाषी देश है भारत
एकता का सूत्र देती हिंदी
राष्ट्रीय एकता की भाषा हिन्दी
भारतीयता की पहचान हिन्दी
हिन्दी दिवस का इंतजार नहीं हो
हर दिन हिन्दी का उत्सव हो
हिन्दी हमारी संस्कृति है
हर दिन हिन्दी सम्मानित हो
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
बोली समझी जाती हिन्दी
सात समुद्र के पार भी
फल – फूल रही अपनी हिन्दी
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