कविता
॓ ॓ मेरे हमसफर ॔ ॔
– नुसरत प्रवीण
मेरे जीने का, अंदाज़ हो तुम,
बेपनाह मोहब्बत की आगाज़ हो तुम।।
जो बीत गई सो, बात गई,
मेरे जीवन का फलसफा, आज हो तुम ।।
तुम्हें पाकर ,जग पाया ,
पूछो ना कोई, राज हो तुम ।।
मजमा हो, या तन्हाई,
रहते खड़े मेरे ,साथ हो तुम ।।
दीदार से दिल को ,मिलती ठंडक,
मीठी कशक व, साज हो तुम ।।
रौनक हुई तुमसे, दोनों जहां ,
बेशक सर के ,ताज हो तुम ।।
मेरी काबिलियत के, शहज़ादे,
पंख मैं ,परवाज हो तुम ।।
जब ना पाऊं , विचलित हो जाऊं ,
मेरी धड़कनों के, इलाज हो तुम ।।
रग -रग में हो,ऐसे बसें,
मनके मंदिर में विराज हो तुम ।।
संग -संग करू ,आकाश में विचरण ,
मैं गौरैया व ,बाज हो तुम ।।
हमसफर पा कर, तुम्हें धन्य हुई,
क्यों इतने, खास हो तुम ।।
क्या खूब रिश्ता , बनाया खुदा ने ,
मैं नुसरत ,व मिराज हो तुम ।।
नुसरत प्रवीण (सहायक शिक्षिका ) उत्क्रमित उच्च विद्यालय बरियों उर्दू, प्रखंड -गोविंदपुर
जिला- धनबाद( झारखंड )

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