क्या यह आंदोलन आदिवासी बनाम कुर्मी संघर्ष का रूप लेगा? वर्तमान हालात संकेत दे रहे हैं कि दोनों समुदायों के बीच अविश्वास और तनाव बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर छींटाकशी, तर्क-वितर्क और आक्रोश भरे बयान आगे चलकर हिंसा का रूप ले सकते हैं।इतिहास बताता है कि जब भी समाज जातीय आधार पर बंटा है, नुकसान दोनों पक्षों का हुआ है और फायदा उठाया है बाहरी ताकतों ने।

(विनोद आनंद)
झारखंड की राजनीति अपने जन्म के समय से ही सामाजिक संरचना और जातीय समीकरणों पर आधारित रही है। यहां आदिवासी पहचान, संसाधन और सत्ता के केंद्र में रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गैर-आदिवासी समुदायों ने भी अपने प्रभाव और संख्या बल से राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिश की है। वर्तमान समय में कुर्मी समुदाय द्वारा स्वयं को अनुसूचित जनजाति (एसटी) सूची में शामिल करने की मांग ने झारखंड की राजनीति और समाज दोनों को एक नई दिशा की ओर धकेल दिया है। यह सवाल केवल आरक्षण या कानूनी प्रावधानों का ही नहीं बल्कि सामाजिक ताने-बाने, पहचान और भविष्य की राजनीतिक स्थिरता का भी है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संदर्भ
झारखंड आदिवासी संस्कृति, परंपरा और संसाधनों की भूमि मानी जाती रही है। लंबे संघर्ष और आंदोलन के बाद 2000 में जब बिहार से अलग होकर राज्य का गठन हुआ, तो इसके केंद्र में आदिवासी अस्मिता ही थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि राज्य में आदिवासी जनसंख्या घटकर लगभग 26 प्रतिशत के आसपास रह गई है, जिससे राजनीतिक और सामाजिक सवाल अधिक चुनौतीपूर्ण हो गए हैं। कुर्मी जाति पारंपरिक रूप से कृषक और सामाजिक दृष्टि से प्रभावशाली मानी जाने वाली जाति है। संख्याबल में बड़ी और सामाजिक-आर्थिक रूप से संगठित यह जाति अब अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल होने की मांग कर रही है। इस आंदोलन का तर्क यह है कि कुर्मी परंपरागत रूप से आदिवासी संस्कृति के निकट रहे हैं और कई जगह उनके सामाजिक रीति-रिवाज समान दिखाई देते हैं। वहीं आदिवासी समुदाय का स्पष्ट विरोध इस आधार पर है कि एसटी सूची में यदि कुर्मी को शामिल कर लिया जाता है तो मूल आदिवासियों के आरक्षण और नौकरियों पर प्रत्यक्ष असर पड़ेगा।
आंदोलन बनाम टकराव
पिछले कुछ वर्षों में कुर्मी समाज ने अपनी मांग को लेकर बार-बार सड़क से लेकर संसद तक आवाज बुलंद की है। रेल रोकना, सड़क जाम करना और बड़े स्तर पर आंदोलन करना उनकी रणनीति का हिस्सा रहा है। आम कुर्मी जनता इस मुद्दे पर पूरी तरह एकजुट दिख रही है।दूसरी ओर आदिवासी समाज भी इस आंदोलन को लेकर सजग और गोलबंद हो रहा है। सोशल मीडिया पर दोनों पक्षों की बहस टकराव का रूप लेती जा रही है। आदिवासी समुदाय का मानना है कि कुर्मी को एसटी में शामिल किए जाने से उनके सामाजिक और राजनीतिक अधिकार कमजोर होंगे।
यही कारण है कि गुरुवा, सरना या आदिवासी संगठनों से जुड़े नेता खुलकर विरोध कर रहे हैं।लेकिन आदिवासी समुदाय के निर्वाचित प्रतिनिधि—विधायक और सांसद—इस पूरे मसले पर चुप हैं। इसका मुख्य कारण राजनीतिक गणित और वोट बैंक की राजनीति है। यदि आदिवासी प्रतिनिधि कुर्मी का विरोध करेंगे, तो उन्हें व्यापक इलाके में कुर्मी समाज का समर्थन नहीं मिलेगा। वहीं यदि वे समर्थन में कुछ कहते हैं तो आदिवासी समाज में उनकी पकड़ कमजोर हो जाएगी। यह मौन फिलहाल “राजनीतिक मजबूरी” बन गया है।
राजनीतिक समीकरण और सत्ता का गणित
झारखंड के राजनीतिक इतिहास को देखें तो यहां की सत्ता जातीय समीकरणों और गठबंधनों पर टिकी रही है। झामुमो आदिवासी अस्मिता पर चलकर सत्ता तक पहुंचता है, वहीं भाजपा गैर-आदिवासी और शहरी तबकों को साधकर अपना आधार मजबूत बनाती है। कांग्रेस ने दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है लेकिन निर्णायक भूमिका अक्सर क्षेत्रीय और जातीय आधार वाली सियासत ही निभाती रही है।
यदि कुर्मी आंदोलन और आदिवासी विरोध आमने-सामने आ गया, तो इसका असर आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में स्पष्ट दिखेगा।
आदिवासी समाज अपनी अस्मिता के मुद्दे पर और अधिक गोलबंद होकर झामुमो की ओर झुक सकता है।वहीं कुर्मी समाज राजनीतिक दबाव बढ़ाकर अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करना चाहेगा।भाजपा और कांग्रेस जैसे दल इस टूट को अपने-अपने लाभ में बदलने की रणनीति बना सकते हैं।
केंद्र की भूमिका और संवैधानिक प्रश्न
किसी भी जाति या समुदाय को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। राज्य सरकार केवल अनुशंसा कर सकती है। अतः यह सवाल राजनीतिक रूप से चाहे झारखंड का प्रतीत हो, लेकिन अंततः फ़ैसला दिल्ली में होना है।
केंद्र सरकार पर इस आंदोलन का दबाव कितना पड़ेगा, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन एक तथ्य स्पष्ट है कि यह मांग यदि स्वीकार की जाती है तो न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश में सामाजिक न्याय और आरक्षण नीति को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। क्योंकि फिर अन्य राज्य भी अपनी-अपनी जातियों को एसटी सूची में शामिल करने की मांग तेज करेंगे।
टकराव का खतरा और सामाजिक सौहार्द
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह आंदोलन आदिवासी बनाम कुर्मी संघर्ष का रूप लेगा? वर्तमान हालात संकेत दे रहे हैं कि दोनों समुदायों के बीच अविश्वास और तनाव बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर छींटाकशी, तर्क-वितर्क और आक्रोश भरे बयान आगे चलकर हिंसा का रूप ले सकते हैं।इतिहास बताता है कि जब भी समाज जातीय आधार पर बंटा है, नुकसान दोनों पक्षों का हुआ है और फायदा उठाया है बाहरी ताकतों ने।
अतः सरकार को शुरू से ही इस पर लगाम लगाने के उपाय करने होंगे। केवल प्रशासनिक कड़ाई काफी नहीं होगी, बल्कि सामाजिक संगठनों, प्रबुद्ध वर्ग और दोनों समुदायों के नेताओं को संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी।
आंदोलन की उचित दिशा
किसी भी समाज को अपनी समस्याओं और मांगों के लिए सरकार से गुहार लगाने का मूल अधिकार संविधान ने दिया है। लेकिन आंदोलन की राह संयमित और लोकतांत्रिक होनी चाहिए। रेल रोकने या देशव्यापी जाम जैसी गतिविधियां आम जनता को परेशान करती हैं, जिससे आंदोलन के प्रति सहानुभूति के बजाय आक्रोश पैदा होता है।इसके अलावा आंदोलन में हमेशा यह खतरा रहता है कि कुछ अवसरवादी तत्व हिंसक गतिविधियों को हवा दे देंगे, जिससे आंदोलन बदनाम होगा। इस स्थिति से बचना आवश्यक है। कुर्मी समाज को चाहिए कि वह अपने प्रबुद्धजनों की एक टीम बनाकर शांतिपूर्ण और रणनीतिक तरीके से अपनी मांग आगे बढ़ाए।
अंत मे कहना चाहूंगा कि झारखंड की राजनीति आज एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है। कुर्मी बनाम आदिवासी की खींचतान यदि बढ़ गई तो यह राज्य की असली पहचान—सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक विविधता—को कमजोर कर देगी। दोनों ही समुदाय यहां के मूलवासी माने जाते हैं, अतः उनका संघर्ष अंततः उनके भविष्य को ही संकट में डालेगा।केंद्र और राज्य सरकार को चाहिए कि वे इस मामले में संवेदनशीलता और गंभीरता दिखाते हुए किसी तरह के सामाजिक टकराव की संभावना को रोकें। वहीं दोनों समुदायों के नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे सोशल मीडिया या सड़क पर बयानबाजी करने की बजाय संवाद और आपसी समझदारी को बढ़ाने पर जोर दें।
किसी समाज की असली ताकत उसकी आपसी एकजुटता और शांति में होती है, न कि संघर्ष और टकराव में। इसलिए यह आन्दोलन आदिवासी बनाम कुर्मी की लड़ाई न बनकर, अपने अधिकारों की संविधानसम्मत लड़ाई के रूप में आगे बढ़े, यही समय की मांग है।