रेणु की रचनाओं में गाँव की पंचायत भी एक प्रतीक है। ‘मेरीगंज’ के विभिन्न जातियों के पंच एक आसन पर बैठते हैं, यह प्रतीकात्मक रूप से सामाजिक एकता का आभास देता है। किन्तु गाँव के भीतर जातीय विभाजन जस का तस चलता रहता है। पंचायत की राजनीति में जातियाँ अपने-अपने समीकरण बनाती और बिगाड़ती रहती हैं। यही दोहरा स्वरूप– बाहरी स्तर पर एकता और अंदरूनी स्तर पर जातिगत विभाजन– ग्रामीण जीवन की असली तस्वीर है।

लेखक :-विनोद आनंद
रेणु की रचनाओं में गाँव की पंचायत भी एक प्रतीक है। ‘मेरीगंज’ के विभिन्न जातियों के पंच एक आसन पर बैठते हैं, यह प्रतीकात्मक रूप से सामाजिक एकता का आभास देता है। किन्तु गाँव के भीतर जातीय विभाजन जस का तस चलता रहता है। पंचायत की राजनीति में जातियाँ अपने-अपने समीकरण बनाती और बिगाड़ती रहती हैं। यही दोहरा स्वरूप– बाहरी स्तर पर एकता और अंदरूनी स्तर पर जातिगत विभाजन– ग्रामीण जीवन की असली तस्वीर है।
फणीश्वर नाथ रेणु का साहित्य भारतीय ग्रामीण जीवन का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने गाँव के सामान्य जन-जीवन को अपनी संवेदनशील दृष्टि से इस प्रकार अंकित किया है कि उनकी रचनाएँ समाजशास्त्र और साहित्य दोनों के लिए अमूल्य धरोहर बन जाती हैं। जातीय समीकरण, सामाजिक विषमता और लैंगिक असमानता के प्रश्न उनके साहित्य की रीढ़ हैं। जहाँ प्रचलित पितृसत्ता और जातिवाद की जकड़न गाँव की धड़कनों को प्रभावित करती है, वहीं उसमें संघर्षशील चेतना और विद्रोही स्वर भी दिखाई देते हैं।

रेणु ऐसे लेखक रहे जिन्होंने जातिविहीन समाज का स्वप्न देखा। उनकी कृतियों में पात्र अपने सामाजिक अस्तित्व को जातीय बंधनों से परे देखना चाहते हैं। ‘मैला आँचल’ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है, जहाँ यादव, ब्राह्मण, संथाल और भूमिहीन वर्ग के पात्र अपनी-अपनी अस्मिता और संघर्ष के साथ सामने आते हैं। गाँव का यह बहुवर्णीय समाज परस्पर सह-अस्तित्व और टकराव दोनों को जीता है। यथार्थ यह है कि हर व्यक्ति अपनी जातीय पहचान में बँधा हुआ है, फिर भी आमजन यह अनुभव करता है कि असली विभाजन जाति का नहीं, गरीबी और अमीरी का है। यही कारण है कि रेणु अपने पात्रों के मुख से कहलवाते हैं– “गाँव में सिरिफ दो जात हैं। अमीर-गरीब।” यह मात्र संवाद नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ का गहरा उद्घाटन है। धन और जमीन के असमान वितरण ने जातीय समीकरणों को और भी जटिल बना दिया।
‘परती परिकथा’ में रेणु ने गाँव के जटिल जातीय संबंधों और वर्गीय शोषण को बड़े विस्तार से प्रस्तुत किया है। भूमिहीन किसान, मजदूरी करनेवाले दलित समूह अथवा पिछड़े वर्ग की चेतना वहाँ धीरे-धीरे विकसित होती है। यह उपन्यास न केवल सामाजिक विषमता का दस्तावेज है, बल्कि उस समय की राजनीतिक उथल-पुथल और साम्यवादी विचारों को भी प्रतिबिंबित करता है। इसी भूमि पर संथाल विद्रोह और किसान आंदोलनों का जिक्र मिलता है, जिससे परंपरागत सामाजिक ढाँचे के भीतर अस्मिता और प्रतिरोध की क्रियाशीलता सिद्ध होती है।
रेणु के साहित्य में स्त्री पात्र भी महत्वपूर्ण हैं। उनके यहाँ स्त्री न केवल शोषित और दमित स्थिति में है, बल्कि विद्रोह और आत्मसंघर्ष की शक्ति के साथ भी उभरती है। ‘मैला आँचल’ की फुलिया और रमपियरिया अपने समय की ग्रामीण स्त्री के लघु और विशाल दोनों धरातलों का प्रतिनिधित्व करती हैं। फुलिया समाज की उपेक्षा और पितृसत्तात्मक आदेशों से आहत है, पर भीतर से विद्रोही भी है। रमपियरिया खेत-खलिहान के कामों में भागीदारी निभाती है, पर पुरुष प्रधान समाज में उसके श्रम का मूल्यांकन न्यूनतम है। इन पात्रों में हम देखते हैं कि स्त्री अपने निर्णय लेने का प्रयत्न करती है, पर उसका अस्तित्व प्रायः पुरुष चयन के अधीन रहता है।
लैंगिक असमानता का यथार्थ रेणु ने बिना किसी अलंकरण के व्यक्त किया। ग्रामीण स्त्री पंचायत और गाँव की राजनीति में लगभग अनुपस्थित है। विकास योजनाओं और सार्वजनिक निर्णयों से उनका सीधा सरोकार नहीं जुड़ पाता। लेकिन इसके पीछे वे पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हैं। अपने छोटे-छोटे प्रतिरोधों से वे पितृसत्ता को चुनौती देती हैं। यह चुनौती कभी घरेलू निर्णायकता के स्तर पर दिखती है, तो कभी वैवाहिक संबंधों के चयन में। रेणु इन स्त्रियों की अस्मिता को आदर्शवादी दृष्टि से नहीं, बल्कि यथार्थवादी ग्रामीण अनुभवों से उजागर करते हैं।
रेणु की रचनाओं में गाँव की पंचायत भी एक प्रतीक है। ‘मेरीगंज’ के विभिन्न जातियों के पंच एक आसन पर बैठते हैं, यह प्रतीकात्मक रूप से सामाजिक एकता का आभास देता है। किन्तु गाँव के भीतर जातीय विभाजन जस का तस चलता रहता है। पंचायत की राजनीति में जातियाँ अपने-अपने समीकरण बनाती और बिगाड़ती रहती हैं। यही दोहरा स्वरूप– बाहरी स्तर पर एकता और अंदरूनी स्तर पर जातिगत विभाजन– ग्रामीण जीवन की असली तस्वीर है।
इन सबके बीच रेणु जातीय अस्मिता और सामाजिक संघर्ष को स्वर देते हैं। पिछड़े वर्ग की चेतना, आदिवासी अस्मिता और दलित संघर्ष के सशक्त प्रसंग उनके साहित्य को समाजवादी धरातल से जोड़ते हैं। उनका समाज दृष्टिकोण आदर्शवादी होते हुए भी पूर्णतः यथार्थ में निहित है। वे मानवीय संवेदनाओं के बाज़ार में जाति और लिंग के भेद को प्रश्नांकित करते हैं और अपनी कथा-यात्रा के माध्यम से ऐसे भविष्य का सपना रचते हैं जहाँ असली पहचान मानवता की हो।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि फणीश्वर नाथ रेणु का साहित्य जातीय असमानता और लैंगिक विषमता का गहन और यथार्थपरक वृत्तांत है। उनके पात्र केवल कथा के हिस्से नहीं हैं, बल्कि उस जीवित समाज के दर्पण हैं, जिसकी धड़कनों को उन्होंने शब्दों में ढाला। रेणु का यह योगदान केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को परिष्कृत करने वाला है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था।