बहुत याद आता है,
80 के दशक का वो गांव।।
वह मासूमियत भरा बचपन,
दुर्गा मां के प्रांगण
व पीपल का छांव ।।
विद्यालय के सखियों के साथ घूमने, खेलने जाना ,
दुर्गा मां के मंडप में था ,अपना आशियाना ।।
मंडप पर जब होती थी भजन कीर्तन की गूंज,
सरपट दौड़ी जाती थी, हम सखियों की फौज ।।
झांझर, नाल बजाने की होती थी मौज,
शहनाइयों की धुन से मंदिर परिसर जाती थी गूंज ।।
पूजा समाप्ति के बाद होती थी, प्रसाद वितरण की होड़,
छीना- झपटी में सखियां माथा लेती थी फोड़ ।।
जाति -धर्म से हटकर थे ,हम मासूमों की सोच,
इंसानियत की थी जिंदा ,मिसाले मिलकर रहते थे ,
हर धर्म के लोग ।।
जब गांव में दशहरे का
त्योहार आता ,
तो हम सखियों चेहरा मानो ,फूलों सा खिल जाता ।।
रातों में भाग कर
रामलीला देखने जाना ,
राम, लक्ष्मण, सीता की महिमा देख मंद मंद मुस्काना।।
दुर्गा पूजा का त्योहार
मिलजुल कर मनाना ,
विसर्जन के दिन खूब मिलकर रंग गुलाल उड़ाना ।।
क्या खूब थे वो दिन ,
क्या खूब था वो जमाना ,
मासूमियत भरा बचपन, दुर्गा मां के प्रांगण का आशियाना ।।
सच माँ बहुत याद आता है,
वो आपके दर का
गुजरा जमाना ।।
नुसरत प्रवीण ( शिक्षिका )
प्रखंड गोविंदपुर
जिला धनबाद ,
(झारखंड)
🙏🙏🙏