हिंदी की दुनिया—
जहाँ एक बूढ़ा कवि
हाथ जोड़े खड़ा है
मुख्यमंत्री के सिंहासन पर बैठे
फ़ासीवादी पुरोहित के आगे।
तीस लाख का चेक,
छत्तीसगढ़ की मिट्टी से रिसता रक्त,
सलवा जुडुम की राख में
आदिवासी गाँवों की हड्डियाँ,
और बीच में
साहित्य का उत्सव-भोज।
कितनी सहजता से
पुस्तकों की गिनती
लाशों की गिनती पर भारी पड़ जाती है।
छियासी हज़ार प्रतियाँ बिकना
इतिहास का चमत्कार है,
पर छियासी हज़ार आत्माएँ
जंगलों में भटकती रही हों
तो उसका ज़िक्र क्यों हो?
हिंदी को कहा गया—
‘दुहाजू की बीबी’।
गरीबी, फटेहालपन,
निराला की उदासी उसका श्रृंगार।
लेखक वही
जो भूख से पीड़ित मरियल-सा दिखे,
जिन्हें मंच पर बुलाकर
सम्मानित करने से पहले
भोजन खिलाना न पड़े।
पर आज—
जब एक लेखक
रॉयल्टी के पर्वत पर खड़ा है,
उसकी किताब
गोदान से, राग दरबारी से,
गुनाहों के देवता से
तेज़ दौड़ रही है,
तब हिंदी की आँखें चौंधिया गई हैं।
बिक चुकी प्रतियों का हिसाब
बाज़ार की तकनीक है
या समाज का चमत्कार?
कौन-से पाठक हैं
जो रोज़ पाँच सौ किताबें खरीदते हैं?
क्या सचमुच
इतनी भूखी है यह ज़ुबान
कि शब्दों की थालियाँ
इस वेग से खाली होती जा रही हैं?
सवाल दर सवाल
आरोप दर आरोप।
ईर्ष्या की बिच्छू-दुनिया
डंक मारने को तैयार।
जैसे साहित्य
कोई तपस्वी गुफ़ा हो
जहाँ भूख पवित्र है
और लोकप्रियता अपवित्र।
लेकिन—
यह दृश्य भी अद्भुत है—
एक हिंदी लेखक
धन, पुरस्कार और पाठकों से
उत्सवमूर्ति बनता हुआ।
यह क्षण
सिर्फ़ आलोचना का नहीं,
उत्सव का भी होना चाहिए।
पर हिंदी की परंपरा
ईर्ष्या के शिलालेख में लिखी गई है—
यहाँ ख़ुशी को
हमेशा संदेह से देखा जाता है।
किताबों के जंगल में
एक खिड़की खुली है—
उस खिड़की से झाँक रहा है
बाज़ार,
प्रकाशक,
और पाठक का नया चेहरा।
क्या यह खिड़की
आदिवासियों की जली हुई झोपड़ियों तक खुलती है?
क्या यह खिड़की
उन खेतों तक जाती है
जहाँ कॉर्पोरेट का बुलडोज़र चलता है?
या यह खिड़की
सिर्फ़ दिल्ली के ड्राइंगरूमों तक सीमित है,
जहाँ किताबें
सजावट का हिस्सा हैं?
मैं विनोद कुमार शुक्ल को
असाधारण कहूँ या साधारण,
यह मेरा अधिकार है।
पर छियासी हज़ार प्रतियाँ बिकना—
यह घटना
इतिहास में दर्ज हो चुकी है।
यहाँ तक कि आलोचना भी
अब बाज़ार का हिस्सा हो गई है।
सवाल बचा रह जाता है—
क्या साहित्य
पाठकों की गिनती में है
या आदिवासियों की चीख़ में?
क्या हिंदी का उत्सव
लेखक की रॉयल्टी है
या जनता की भागीदारी?
खिड़की खुल चुकी है—
अब देखना है
कि हवा कहाँ से आती है:
जंगल की राख से
या राजधानी की छत से।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
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