• Wed. Feb 4th, 2026
साहित्य, संस्कृति, कला

कहानी : अमर प्रेम

Byadmin

Oct 18, 2025
Please share this post

कहानीकार : विनोद आनंद

लेखक परिचय :- विनोद आनंद (विनोद कुमार मंडल)
जन्म 10 जनवरी, 1965
शिक्षा:-स्नातकोत्तर(हिंदी), रांची विश्व विद्यालय,

पिछले चार दशक से साहित्य औऱ पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय, साहित्य के विभिन्न विधाओं में लेखन,विभिन्न संस्थाओं से सम्मान प्राप्त, कई स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन,अंतर्कथा (antarkatha.Com एवं antarkatha.In) एवं streetbuzz के सम्पादक,
Email-antarkatha.avn @gmail.com

सूलपुर गांव की सुबह वैसी ही होती थी जैसी अन्य गांवों की — कहीं बैलों की घंटियाँ, कहीं गोबर–माटी की मिली गंध, कहीं रसोई के धुएँ में उगती पीली किरणें।

पर इस गांव की हवा में कुछ था जो दिखता नहीं था — एक ठंडी खामोशी, जो जाति, भय और परंपरा की सलाखों से बनी थी।

गांव के हर तालाब का एक मालिक था, हर बाग का अपना दावा, और हर टूटी बेंच पर किसी का अधिकार।

कमल टोले की हवेलियाँ ऊँची और चमकीली, तो मड़ई टोले की झोपड़ियाँ धूल और तपन में झुकी हुईं।

वहीं मड़ई टोले में कीचड़ के बीच था, हीरवा मांझी का घर।

पिता खेतिहर मजदूर, मां दूसरों के घर लीपाई पोताई करती। गरीबी उसकी किस्मत थी, मगर उसकी आँखों में एक सपना था—अपनी पहचान बनाने का।

हीरवा का मन पढ़ाई में रमता। फटे पन्नों पर लिखे अक्षर उसे अपनी दूसरी दुनिया लगते।

रात में मां कहती—“अब सो जा, लालटेन के धुएँ से आँख बिगड़ जाएगी।”

हीरवा धीरे से मुस्करा देता—“माँ, जो अक्षर देखेगा वो ही सपना बदल देगा।”

उधर ठाकुर हरिनारायण सिंह की हवेली में रौनक अलग थी। उनका नाम गांव का कानून था। उनकी बेटी, महुआ ठाकुरिन — रूप में सादगी, स्वभाव में मधुरता।

स्कूल की सबसे तेज़ छात्रा, जिसे कढ़ाई और चित्रकला में अद्भुत रूचि थी। बांस की टोकरियों पर जब उसके हाथ चलते, तो लोग कहते—“मालकिन के हाथ में खुद भगवान बसते हैं।

”कहानी शुरू हुई उस दिन जब महुआ की किताब पोखरे में गिर गई। घबराई हुई वह किनारे दौड़ी और देखा कि पानी में हीरवा मछलियाँ पकड़ रहा है।

उसने झट पानी में उतरकर किताब निकाली, फिर मुस्कराते हुए कहा—
“किताब तो मिल गई, अब बस इसके शब्दों को मत डुबाइएगा।”

महुआ के होंठों पर हँसी आई, एक प्यारी, निश्छल हँसी।

उसी पल, दो दुनिया बस एक पल को करीब आ गईं।

धीरे-धीरे मुलाकातें बढ़ीं। अमराई के पेड़ों के नीचे दोनों मिलने लगे। वह जगह उनकी दुनिया बन गई—जहां कोई जात नहीं थी, न ऊँच-नीच।

महुआ उसे ‘हीर’ कहती, और वह उसे ‘मायरी’।

महुआ अक्सर कहती—
“हीर, तोहार बोली में कुछ ऐसा बा, जइसे पवन में भी मुस्कान घुल जाई।”

हीरवा मुस्कराकर जवाब देता—

“तोहार हँसी में तो पूरा सावन उतर आवेला, महुआ।

”गांव की गलियों मे कानाफुसी शुरू हो गयी।

कमलटोले के लोग फुसफुसाने लगे—“नीच जात का छोकरा ठाकुरिन से बोलता है, ये रीत नहीं!”

एक दिन ठाकुर साहब के नौकरों ने अमराई की छाँव में दोनों को बात करते देख लिया। अगले दिन चौपाल में खुसुर–फुसुर शुरू हुई—“मांझी का बेटा ठाकुरिन के संग—अरे ये तो बेज्जती है।

”हीरवा समझ गया कि तूफान आ चुका है।

उस रात उसने महुआ को बुलाया। चाँदनी पोखरे पर बिखरी थी, झींगुरों की आवाज़, और आम के झुरमुट में बस दो परछाइयाँ।

हीरवा बोला—
“महुआ, अब गांव में हमें दम लेना मुश्किल हो गया। जदि तोहार मन होई,त चल चलब कहीं दूर।”

महुआ ने उसकी हथेलियाँ थाम लीं—
“हीर, हम भाग के कहाँ जाएँ? हमरा मन तहरा लगे बंध गइल बा। जदि समाज सजा देत है, त ऊ भी कबूल बा। मगर एक बात याद रखी—हमरा नाम जबो लेब, सिर झुका के नहि, आँख उठा के लेब।

”अगले दिन गांव में आग फैल गई। ठाकुर साहब के लोग लाठी लेकर मड़ई टोले पहुँचे। पंचायत बैठी, ताने, अपमान, गालियाँ—सब एक साथ बरसे।

ठाकुर गरजे—

“हमरी बेटी नीच जात में नाम करे, ई असभ्यता ना चली। हीरवा आज से गांव से बाहर होवे के चाही।”

हीरवा चुप रहा। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे — बस महुआ की तस्वीर थी।महुआ को भीतर कैद कर दिया गया।

रात भर वह रोती रही। फिर अपने कमरे में पाँच दीप जलाए — एक अपने पिता के लिए, एक अपनी मां के लिए, एक इस मिट्टी के लिए, एक अपने प्रेम के लिए और एक अपनी आत्मा के लिए।

वह दीपों की लौ में लिखती रही—
“हीर, जब कोई माला के दाने टूट जाते हैं, तो लोग नयी माला गूँथ लेते हैं। पर जो प्रेम टूट जाए, उसे कोई जोड़ नहीं पाता। अगर तुझे जीवन मिले, तो मेरा नाम पूजा में लेना, क्योंकि वहीं सच्चाई बसी होगी।

”सुबह तक गांव से हीरवा गायब था। कहा गया कि वह दिल्ली की ओर गया मजदूरी करने। लोगों ने साल-दर-साल उसका नाम भूलने की कोशिश की। मगर महुआ के लिए समय रुका रहा। उसकी आँखें अब भी चौखट पर टिकी रहतीं। कभी किसी आम के पत्ते को देखकर बुदबुदाती—“हीर… तू आवे कि ना?”

लोग कहते, “पगली ठाकुरिन हो गई है।” पर उसकी पागलपन में प्रेम की गूंज थी, पश्चाताप नहीं। बारह साल बीते।

बरसात की पहली शाम में गांव के पोखर पर एक अजनबी लौटा। झोले में पुरानी किताबें, कंधे पर बांस की डलिया।

हीरवा।

उसने पोखरे के पास आकर मिट्टी को छुआ और फुसफुसाया—
“मायरी, अब हम आ गइल बानी।

”ठाकुर साहब बूढ़े हो चुके थे। हवेली की दीवारें सीलन से गिर चुकी थीं, और महुआ अब बस निस्तेज होकर उम्र की ढलान पर पहुँच चुकी थी।

उस रात अमराई में हवा कुछ धीमी चली।

हीरवा उसी गाछ के नीचे बैठा, जहां कभी दोनों ने एक-दूसरे का नाम लिखा था। अचानक हवेली की ओर से दीप की हल्की झिलमिल दिखी।

वह उठा, चार कदम चला — और देखा कि हवेली की खिड़की में महुआ खड़ी है। सफेद साड़ी में, पतली, मगर आँखों में वही उजाला।दोनों की आँखें मिलीं। न कोई शब्द, न कोई आह।

बस एक लंबी साँस कि जैसे बरसों का इंतजार उसी एक पल में पूरा हो गया।

महुआ की उँगलियाँ हवा में हिलीं

—‘हीर’।

हीरवा ने होंठों से जवाब दिया—‘मायरी’।

अगली सुबह गांव वालों ने देखा—पोखरे के किनारे दो जोड़ के कदमों के निशान धुँध में घुलते जा रहे हैं। ठाकुर साहब की हवेली के पिछवाड़े एक दीप जलता रह गया — वही पाँचवाँ दीप, जो बरसों पहले प्रेम के नाम जलाया गया था।

कहते हैं, आज भी जब रसूलपुर की अमराई में कोई जोड़ा बैठता है, तो पत्तों से हवा गुजरती है और कानों में कोई मधुर आवाज़ फुसफुसाती है—
“हीरवा… महुआ…

”गांव का ढर्रा वही रहा, मगर उसकी माटी अब भी उस प्रेम की खुशबू से भीग जाती है — हर सावन की पहली फुहार के साथ।

“अमराई के नीम के नीचे,
हीरवा-महुआ की प्रेम कहनी,
धूप छाँव के बीच बची,
माटी में बसी वो गंध पुरानी।

कुचली खेत में हलचल न सही,
पर दिल के खेत में फसल लहलहा रही,
ठाकुर के साये से डर के नहीं,
प्रेम की लौ आज भी बुझा नहीं।

पंच दीपक जले थे उस रात,
पाँचों दिशाओं में प्यार बिखरा
अधरों के गीत छुपा कर रखा,
मौन होकर भी जो बोलता था।

सदियों से चलती ये कहानी,
रसूलपुर की माटी की ये रवानी,
कभी टूटे ना ये बंधन,
हीरवा-महुआ का अमर प्रेम कहानी।”

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *