दीपावली पर विशेष
मिट्टी का घरौंदा
कवयित्री :- नुसरत प्रवीण

बहुत याद आता है ,
वह मिट्टी का घरौंदा ,
वह बचपन की दिवाली ,
पटाखे ,फुलझड़ियां व वेली का पौधा।।
खेतों से जाकर, मिट्टी का लाना ,
कोमल हस्त से गूंध कर घरौंदा बनाना।।
घरौंदा निर्माण के लिए ,
प्राकृतिक से ही सामग्रियां जुटाना ।।
ना इतनी ताम-झाम थी,
न थी इतनी महंगाई ।।
ना कभी माॅ से शिकायत की,
ना पैसों की गुहार लगाई ।।
हमारी छोटी-छोटी आशाएं भी,
प्राकृतिक ने ही निभाई ।।
जिन सामग्रियों की होती आवश्यकता
हमने वो प्राकृतिक से ही पाई ।।
प्राकृतिक ही उस वक्त हमारे मित्र थे,
जो हम मासूमों पर खूब लूटाते थे, अपना खजाना ।।
मिट्टी, फूल ,पत्तियां ,बेल व
तिनका तिनका चुनकर ।।
बड़ा ही मन मोहक,
वह घरौंदा बनाना ।।
चांद गुल्लक में रखे पैसों से अपना मुराद पाना ,
दीपावली के रंग-बिरंगे मिट्टी के खिलौने का लाना ।।
मात्र 20- 25 पैसे से ही लाल पीले कई रंगों का लाना ,
इंद्रधनुष के जैसे ही ,घरौंदे को चमकाना ,
जब दियें की रोशनी से जगमगा उठता पूरा जमाना ,
तो चुपके से पड़ोसियों के जलते दियों को चुराना , उन दियों से अपने घरौंदे को जगमगाना ,
जगमगाते देख अपने घरौंदे को खूब इतराना ।।
जैसे बहुत बड़ी उपलब्धि पा ली
हो ,
यह सोचकर मंद -मंद मुस्काना ।
सखियों व पड़ोसियों के घर से,
भारी थाल पूवे ,पकवान का आना ।।
वह दौर भी क्या खूब था ,
न मन में कोई छल था ,ना कोई रुसवाई ।।
एकता के साथ मिलकर हमने ,ईद और दीपावली है मनाई ।।
कवयित्री
प्रखंड- गोविंदपुर जिला -धनबाद झारखंड
