मैं छोटे-छोटे फूल चुन चुन कर बाउंड्री पर लगाती, कभी आम के पत्ते तो कभी गेंदा के गुछे। घरौंदे के द्वार पर तिनकों और रंगीन कागज से ‘स्वागतम्’ लिखती। सूख जाने पर रंगों से उसे सजाते समय मन में अजीब-सी तृप्ति छा जाती — जैसे किसी ने मुझे दुनिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी हो।

नुसरत प्रवीण,
शिक्षिका, प्रखंड गोविंदपुर, जिला धनबाद,
दीपों का यह पर्व जब धीरे-धीरे नजदीक आता है, तो मन अपने आप पुरानी पगडंडियों की ओर लौट जाता है — उन दिनों की ओर, जब दीपावली केवल पटाखों और चमकदार झालरों का त्यौहार नहीं, बल्कि मिट्टी की सोंधी खुशबू में रची-बसी आत्मीय परंपरा थी।
उन दिनों दीपावली का अर्थ था — अपने हाथों से दुनिया को सजाने का उत्सव, मिट्टी में सृजन की कला, और मन में उजियारा भरने का भाव।तब गांव में दीपावली से पहले घर-आंगन में खूब सफाई होती, दीवारों पर गोबर से लिपाई होती और ओसारे में अल्पनाएं खिल उठतीं। शाम ढलते ही बच्चे उत्साह से घरौंदे बनाने में जुट जाते। मुझे अब भी याद है — फुआ मिट्टी लातीं, उसे पानी में भिगोकर मुलायम बनातीं और अपने कोमल हाथों से ईंटों की तरह आकार देकर छोटा-सा घरौंदा गढ़तीं।
उसकी सीढ़ियां, बारामदा, छत की छोटी-सी बालकनी — सब कुछ बिल्कुल असली घर जैसा। मैं हौले-हौले उनके पास बैठकर मिट्टी गूंथती, कभी दीवार सीधी न बने तो उदास हो जाती। फुआ मुस्कराकर कहतीं — “घर बनाना मिट्टी सँभालने जैसा है, दोनों में धैर्य चाहिए।”जब घरौंदा खड़ा हो जाता, तो उसकी बाउंड्री वॉल बनाने की जिम्मेदारी मेरी होती।
मैं छोटे-छोटे फूल चुन चुन कर बाउंड्री पर लगाती, कभी आम के पत्ते तो कभी गेंदा के गुछे। घरौंदे के द्वार पर तिनकों और रंगीन कागज से ‘स्वागतम्’ लिखती। सूख जाने पर रंगों से उसे सजाते समय मन में अजीब-सी तृप्ति छा जाती — जैसे किसी ने मुझे दुनिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी हो।दीपावली से ठीक पहले का बाजार भी एक उत्सव होता। मां, फुआ, और हम सब सहेलियां धूल भरे मेले में निकल पड़ते। सबके हाथों में बारीक घुंघराले बालों जैसे बंधन मिट्टी के खिलौनों के थैले।
वहां तवा, चूल्हा, सिलबट्टी, बेलन, बाल्टी, और छोटे-छोटे घड़े सजाए रहते — सब मिट्टी के बने हुए, सब जीवन से भरे हुए। इन खिलौनों को देखकर हम कल्पनालोक में खो जाते। हर दीपावली पर एक मिट्टी की लक्ष्मी मूर्ति भी जरूर ली जाती — जिनके हाथों में मिट्टी के दिए होते, जो सच्चे अर्थों में ‘प्रकाश की देवी’ लगतीं।दिन ढलते ही गांव जगमगाने लगता।
घर-घर दीपों की माला सी झिलमिला उठती। छत, दीवारें, बरामदे, यहां तक कि पेड़-पौधे भी उजाले में नहाने लगते। दादी हर बच्चे के माथे और पैरों पर काला टीका लगाना नहीं भूलतीं — “नजर न लगे हमारे बच्चों को,” वे कहतीं। चाचा जी सबको लेकर गली-गली घूमने निकलते। कहीं बच्चे फुलझड़ियां जलाते, कहीं बूढ़े जुआ खेलते, कहीं मिठाइयों की थालियां सजी रहतीं।
मुझे याद है चाचा ने एक बार मुझे भी पांच रुपये देकर खेलने को कहा। बाल मन में रोमांच भर गया था — मैंने इक्का की मांग की और संयोग से जीत गई। वह खुशी वैसी ही थी जैसी किसी बच्चे को पहली बार दीप जलाने पर महसूस होती है, छोटी होते हुए भी मन को बहुत बड़ी लगती थी।
गांव की दीपावली का दृश्य उस समय कुछ और ही होता था। हर घर से उठती मिट्टी की महक, तेल के दीए की लौ में थरथराती परछाइयां, और हवा में घुलती गुझिया, अनरसा, और खाजा की खुशबू। पड़ोसी एक-दूसरे के घर पकवान लेकर आते। कोई गुड़ की मिठाई देता, कोई सेव भूंजकर लाता। सब मिल-बैठकर खाते, खिलखिलाते, और देर रात तक दीपों की रोशनी में बातें करते। हम बच्चों के लिए तो यह पूरी रात एक उत्सव बन जाती, जैसे चांदनी खुद धरती पर उतर आई हो।
अगले दिन सुबह हम सब सहेलियां जल्दी उठकर मोहल्ले का चक्कर लगाते। जहां-जहां अधजले पटाखे मिलते, उन्हें इकट्ठा करते। उनके बारूद को कागज पर निकालकर दोबारा जलाने का हमारा शौक कभी पुराना नहीं पड़ा। वही छोटी-छोटी खुशियां हमारे भीतर जीवन का असली अर्थ भर देती थीं। दीपावली इतनी जल्दी बीत जाती कि एहसास भी नहीं होता — बस दीपों की लौ बुझने के बाद मिट्टी के घरौंदे की आकृति दीवार के पास कुछ दिन तक वैसे ही सजी रहती, मानो हर साल लौट आने का वादा कर गई हो।पर अब दृश्य बदल गया है।
अब न वह मिट्टी की सोंधी सुगंध है, न फुआ का घरौंदा, न दादी का टीका, न चाचा की मुस्कान। चारों ओर चमकदार बल्ब हैं, लेकिन मिट्टी की ऊष्मा कहीं खो गई है। बच्चे अब मोबाइल की स्क्रीन पर दीपावली मनाते हैं, और घरौंदे की जगह प्लास्टिक के मोल्डेड घर आ गए हैं। उस सादगी का, उस आत्मीय मिलन का, और उस मिट्टी से जुड़ी संवेदना का अब कोई विकल्प नहीं।कभी-कभी सोचा करती हूं, क्या दीपावली अब केवल रोशनी का पर्व रह गया है? या फिर वो रिश्ता था जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ता था — मिट्टी, घर, परिवार और पड़ोस के साथ? शायद असल दीपावली तो उसी मिट्टी में थी, जो हमारे हाथों से आकार लेकर उजालों में बदल जाती थी।
वही मिट्टी हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन गई है, जो अब सुकून देती है, पर साथ ही मन को भिगो भी जाती है।आज जब मैं अपने विद्यार्थियों को दीपावली का अर्थ समझाती हूं, तो बताती हूं कि प्रतीक केवल दीप नहीं है — असल दीपावली तब होती है जब कोई बच्चा अपने हाथों से मिट्टी का घर बनाता है, उसमें लक्ष्मी का दिया जलाता है, और उस प्रकाश में अपने रिश्तों, अपने गांव, अपनी स्मृतियों का सौंदर्य देखता है।हो सकता है, आधुनिक समय की चकाचौंध में अब मिट्टी के घरौंदे नजर न आते हों, पर वे अब भी दिलों में बसे हैं — उस बचपन की मुस्कान में, उस फुआ के हाथों की कारीगरी में, और उन दीयों की लौ में, जो हर साल याद दिलाती है कि उजाला असल में वहीं जन्म लेता है — मिट्टी की गोद में।