
जीवन परिचय :कहानीकार :-विनोद आनंद
शिक्षा :एम.ए. (हिंदी )रांची वि. वि.
साहित्य के विभिन्न विधाओं में लेखन
सम्मान :-विभिन्न संस्थाओं से साहित्य औऱ पत्रकारिता के लिए सम्मानित
संप्रति :-सम्पादक अंतर्कथा, एवं streetbuzz
पता :-रतनपुर, पो. गोविंदपुर, धनबाद, झारखण्ड, 828109

कहानीकार :- विनोद आनंद
घर के नीचे भीड़ नहीं थी, बस निर्जीव सन्नाटा पसरा था। मकान के बरामदे में एक देह पड़ी थी — ठंडी और स्थिर, मानो लंबे दुखों से थककर नींद में डूब गई हो। वही कमली थी। वह कमली, जिसने कभी इसी घर के हर कोने को सहेजा था, जो दीवारों पर संतरे की गंध रचती रही, और जिसने अपने बच्चों की किलकारियों से इस आँगन को जीवन दिया था।
पर आज वही मकान मौन था। न रोने की आवाज़, न किसी की भीगी पलकों का निशान। सभी अपने-अपने कमरों में गुमसुम थे — ऐसे जैसे किसी बला के टलने का राहत हो।
चेहरे पर शांति थी, पर वह करुण शांति नहीं थी; वह थी स्वार्थ की ठंडी छाया।
बाहर, चमरू — बांस की टथरी बाँध रहा था। पास में शराब की तीखी गंध तैर रही थी। उसकी आँखें लाल थीं, जीभ लड़खड़ा रही थी। वह बेतहाशा बक रहा था,औऱ कमली के बेटा को गाली दे रहा था, अपने माँ के बारे में कह रहा था “जब मेरी माँ बीमार हुई थी, कितना खर्च किया था हमने! लेकिन इसका बेटा कौन-सा फ़र्ज़ निभाया?”
शब्दों के बीच अपशब्दों की बौछार थी — मां की नहीं, किस्मत की। पास में उसका बेटा, यानी कमली का बेटा, नशे में चहलकदमी कर रहा था, ठोकरें खा रहा था, जैसे जिंदगी से कोई लेना-देना न हो।दो-चार औरतें रास्ते से गुजरीं। एक ने बुदबुदाया, “बेचारी चली गई, अच्छा हुआ— बहुत दुख में थी, किसी ने देखा तक नहीं।” दूसरी ने सहमति में सिर हिलाया। और फिर सब अपने-अपने रास्ते निकल गईं।
मृत्युपूर्व इतने लोगों के बीच भी कमली अकेली थी — हमेशा की तरह…
कमली के जीवन की डोर कोई अचानक नहीं टूटी थी। कई महीनों से वह बीमारी के बोझ से हार रही थी। डॉक्टरों ने साफ कहा था — “ब्रेन हेमरेज है, जल्दी बड़े शहर के अस्पताल ले जाइए।
” मगर जब बेटा घर लौटा, उसकी पत्नी ने आँख और स्वर — दोनों में तिरस्कार भरकर कहा,-
“अब इसका क्या इलाज करना है? जी ली अपनी ज़िंदगी। हम क्यों परेशान हों? खर्चा, भाग-दौड़, ड्यूटी— ये सब कौन करेगा?”
बेटा चुपचाप खड़ा था। उसकी आवाज़ में प्रतिरोध नहीं था। भीतर कहीं वह जानता था कि पत्नी की राय ही घर का फैसला है।
माँ के लिए वह असहाय था — या शायद अब संवेदना उसकी स्मृति से मिट चुकी थी।डॉक्टरों की चेतावनी अनसुनी करके उन्होंने कमली को अस्पताल से छुट्टी दिला दी।
घर में एक पाइप के जरिए लिक्विड भोजन उसके पेट में उतरने लगा। बेटा तरह-तरह के घरेलू प्रयोग करने लगा — नीम, करेले, और जाने क्या-क्या जूस मिलाकर उसी पाइप से पिला देता। उसे यह तक समझ नहीं थी कि माँ का शुगर स्तर कितना गिर चुका है। धीरे-धीरे शरीर पर घाव उभरने लगे।
बेडशोर — वही घाव जिसने उसके मांस और आत्मा दोनों को चीर दिया।
देखभाल का नाम मिट चुका था, अब बस प्रतीक्षा शेष थी — मृत्यु की प्रतीक्षा।
कमली के शरीर का आधा हिस्सा पैरालाइज्ड था, पर दिमाग अब भी जिंदा था। उसकी आँखों में अब भी शब्द थे, आवाज़ अब भी बंदी नहीं हुई थी— फर्क बस ये था कि अब कोई सुनता नहीं था।
हर आने-जाने वाले का हाथ वह अपने कांपते उँगलियों से कसकर पकड़ लेती — जैसे कह रही हो, “मुझे अस्पताल ले चलो… मुझे बचा लो!”
उसकी आँखों में मृत्यु का भय नहीं था, बल्कि अपने बच्चों की निष्ठुरता का आतंक था।
कमली जानती थी— अब वह बोझ बन चुकी है। बेटा बस तनिक-सा आराम चाहता था, और बहू उसे अपने स्वच्छंद जीवन में अवरोध के रूप में देखती थी।
वह बहू खुले खयालों की थी, अपने मित्रों के साथ घूमना-फिरना उसे अच्छा लगता था। नजरें उसके लिए खटकने लगी थीं। बेटा तो पहले ही दुनिया से बेखबर था— भांग और गांजा में डूबा हुआ, अपनी कर्तव्यहीन मस्ती में खोया।
इसलिए कमली का होना या न होना, दोनों ही उसके लिए बराबर का था।अतीत जो पीछा करता रहा मृत्यु-शय्या पर पड़े-पड़े कमली का मन अतीत में लौट जाता।
वह छोटे से गाँव की रेत में अपने बचपन का चेहरा देखती— कंधे पर मिट्टी का घड़ा उठाए, नदी किनारे जाती, और लौटते वक्त अपने पिता की थकी आंखों में मुस्कान भर लाती।
फिर वह याद करती अपने जवान पति का चेहरा — वही जिसने शहर आकर पहली बार सरकारी नौकरी पाई थी।
तब कमली का संसार कितना प्यारा था— छोटा-सा किराये का घर, दो बेटे, एक बेटी, और सपनों से भरे दिन।
दिन बीतते गए, बच्चे बड़े हुए, जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं।
जब पति की तबीयत बिगड़ी, तो कमली ने दो वक्त की रोटी बचाकर उपचार कराया। और जब पति की मृत्यु हुई, उसने अपने बड़े बेटे को वही नौकरी दिलाई, यह सोचकर कि उसके उजले दिनों में अब माँ के लिए भी थोड़ा उजाला बचेगा।
लेकिन वही बेटा बाद में उसके अंधेरे का कारण बन गया।कमली की यादों में अपने छोटे बेटे का चेहरा भी तैरता था— और बहू?
वह तो शायद कोई धुंधली तस्वीर थी— जिसे पहचानने की कोशिश में उसकी आखों से जलन होने लगती थी। आखिरी दिन किसी लंबी प्रतीक्षा की तरह थे।
घर में एक भारी मौन रहता। बहू जहां-तहां घूम आती, घर के बच्चे सड़कों पर भटकता, और कमली— अपने बिस्तर पर अकेली।
कभी-कभी दरवाजे के परदे हिलते तो वह सोचती, कोई आया है— पर फिर हवा थम जाती।
आख़िरी दिन उसकी सूखी जीभ पर प्यास थी। वह चाहती थी कोई एक बूँद पानी दे दे, बस एक बार, ताकि मृत्यु थोड़ी आसान हो जाए।
लेकिन उस दिन घर वीरान था। सूरज पश्चिम में ढल रहा था। कमरे में धूप की एक पतली किरण उसके चेहरे पर पड़ी और वहीं ठिठक गई।
कमली की साँसें धीमी पड़ने लगीं। होंठ हिले— जाने किसे पुकारा— “बेटा…” शायद यही शब्द निकला होगा। लेकिन उसके पास अंतिम शब्द सुनने के लिए कोई नहीं था।
फिर सब कुछ शांत हो गया।
घड़ी की सुइयाँ चलती रहीं, पर जिंदगी रुक गई।छः घंटे बाद किसी ने दरवाज़ा खोला तो कमरे में एक अजीब गंध थी — मृत्यु और उदासी की मिली-जुली गंध।
लगे हाथ किसी ने कहा, “लगता है खत्म हो गई।”
फिर खबर फैली — और लोग जुटने लगे।भ्रम का दुखअब वही लोग, जो कभी पूछने नहीं आए, कमली के मरने पर आंसुओं की मुद्रा में खड़े थे।
किसी के होंठ पर बनावटी सहानुभूति थी— “बेचारी, बहुत दुख सहे।”
किसी ने कहा— “सबके अपने कर्म होते हैं।”
पर कोई यह नहीं सोच पाया कि कमली का अपराध क्या था।
माँ होना?
अपने बच्चों से उम्मीद करना? या बूढ़ी हो जाना? उसका बेटा अब भी मदहोश था, लाचार हँसी हँसता हुआ।
बहू ने चुपचाप , मानो समाज का धर्म निभाना उसका अंतिम कर्म हो।
शवयात्रा निकली — पड़ोसी साथ थे, पर किसी की आँख नम नहीं थी।
कमली की देह लकड़ी पर रखी गई। आग ने धीरे-धीरे सब निगल लिया — शरीर भी, अपमान भी, और वह ममता भी जो मरने के बाद भी शायद बुझी नहीं थी।
आवाज जो धुएं में घुल गई जब धुएं ने आसमान को छुआ, किसी को ध्यान नहीं रहा कि उस राख में एक माँ की करुणा जलकर राख हो गई।
कमली शायद किसी और लोक में यह दृश्य देख रही होगी— वही लोग जो जीते जी उसे अनदेखा करते रहे, अब मुखाग्नि देने को कतार में खड़े हैं।
पर उसे अब कोई ग़िला नहीं था। न शिकायत, न रोष।
बस एक मनोकामना थी— कभी तो मनुष्य अपने भीतर की संवेदना को पहचान सके।कमली की कहानी वहीं खत्म हुई, पर उसका प्रश्न बाकी रह गया—
क्या वास्तव में माँ केवल तब तक माँ रहती है जब तक वह उपयोगी है?
क्या प्यार किसी पुण्य की तरह भुनाया जा सकता है?
धुंधलके में जब उसकी चिता की लपटें शांत हुईं, आसमान में एक हल्की हवा दौड़ी।
शायद यह वही बूँद थी जो वह अंतिम समय में मांग रही थी। प्यास अब खत्म हो चुकी थी— और कमली भी।