
(विनोद आनंद)
अ मिताभ दा, जिनका आज दिवंगत हो जाना न केवल मुझे बल्कि समस्त गोविन्दपुर को खलता है, आज होते तो 70 वर्ष के होते। उनकी अनुपस्थिति, मात्र एक व्यक्ति का शून्य नहीं, बल्कि सर्जना की वह धारा है, जो कस्बे के हर कोने में बहती थी। गोविन्दपुर की धूल-मिट्टी में जिस प्रकार वे अनुभूति और विचार के बीज बो गए, वह अद्वितीय है। वे केवल लेखक नहीं थे, वे एक सृजनशील योद्धा थे, जिन्होंने नयी पौध तैयार की, जिन पर आज भी उनकी छाया टिकी है।
गाँव और सृजन का रिश्ता
हमारे गाँव-शहरों में कितनी बार कल्पनाशक्ति दम तोड़ देती है, कितने ही लोग प्रतिभावान होते हुए भी अवसर न मिलने के कारण लुप्त हो जाते हैं। लेकिन अमिताभ दा ने इसे सच नहीं होने दिया। उन्होंने न केवल स्वयं लिखा, बल्कि दूसरों के मानस को भी सृजनशील बना दिया, लोगों में कल्पनाशक्ति के जुगनू जगा दिए। कई रातें, जब बाकी दुनिया सो रही होती थी, वे अपने छोटे से पुस्तकालय में युवाओं की मंडली लगाते, रचनाएँ पढ़ते, बहसें करते, प्रेरित करते। उनके साथ हर संवाद एक नयी लकीर खींच देता, हर मुलाकात किसी के मन में ‘कुछ कर दिखाने’ की ललक भर जाती।
गोविन्दपुर का सांस्कृतिक परिवेश
अमिताभ दा की बदौलत गोविन्दपुर धीरे-धीरे एक साहित्यिक तीर्थ में बदलने लगा था। गाँव की चौपाल, पाठशालाएँ, और सामुदायिक मंच, अब साहित्य-संध्या, कविता-पाठ और संवाद-चर्चा के केंद्र बन चुके थे। गाँव के युवा जहां पहले व्यापार या नौकरी की बातें किया करते, अब कविता, कहानी और निबन्ध पर चर्चा करने लगे थे। सांस्कृतिक आयोजनों की शृंखला शुरू हुई, लोककला, रंगमंच, नाटक – सबका पुनरागमन हुआ।
निजी अनुभव: सृजन की साझी जमीन
अमिताभ दा से मेरी पहली मुलाकात साधारण थी, लेकिन उनके शब्दों की ऊष्मा ताजिन्दगी दिल में बस गयी। वे बातचीत में, किताबों की चर्चा में, खुद को कभी ‘आचार्य’ नहीं समझते थे, बल्कि हमेशा ‘साथी’ बनकर चलते। मैंने उनके साथ कई योजनाएँ बनाई थीं – एक साहित्यिक पत्रिका, एक क्षेत्रीय इतिहास की किताब, गोविन्दपुर पर आधारित लोककथाओं की शृंखला – इनमें से अधिकांश अधूरी रह गयीं, उनकी असमय विदाई के कारण। आज जब उनके साथ बिताया हर क्षण याद करता हूँ, तो लगता है मानो किसी वृक्ष की छाया में ठंडक पा रहा हूँ।
सृजन के हौसले और कटु सत्य
सुनने में जितना सुखद लगता है, हकीकत उतनी ही कठिन रही। कई मौकों पर जब अमिताभ दा ने नयी पहलों की बात उठाई, लोगों का उत्साह फीका था। सृजन और इमानदार प्रयास को गाँव में शायद ‘अलग’ समझा गया। जिन योजनाओं पर दिन-रात मेहनत हुई, वे कटाक्ष और उपेक्षा का शिकार हुईं। कुछ लोगों ने तो उनकी रचनाओं की हूबहू नक़ल कर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की – यह बात उन्हें गहरे तक व्यथित करती थी।
पर उन्होंने कभी अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया; उल्टा, अगली बैठक में और जोश से सबको प्रोत्साहित करते।
सामाजिक विरासत और अधूरी क्रांति
यह बड़ा दुर्भाग्य रहा कि जिस रचनात्मक आंदोलन की नींव अमिताभ दा ने रखी थी, वह उनकी विदाई के साथ ठहर-सा गया। विडम्बना यह कि आज हम बस, साल-दर-साल उनकी जयंती, पुण्यतिथि मना कर कर्तव्यबोध से इतिश्री कर लेते हैं। पर जो संकल्प उन्होंने लिया था, उसे आगे बढ़ाने की हिम्मत न दिखा सके। उनकी बातों का मर्म, उनके स्वप्न समय के साथ धुंधले पड़ने लगे। गाँव के बच्चों में काव्य, कहानी या नाटक की बात उठती भी है, तो दुनिया के शोर में, जिम्मेदारियों के बोझ में दब जाती है। सांस्कृतिक केंद्र, जो वे बनाना चाहते थे, अब स्मृतियों में सीमित होकर रह गया।
रचनाकार के अकेलेपन का बोझ
यदि सच कहूं, तो इस विरह और रिक्तता को सबसे ज्यादा मैंने महसूस किया। जब-जब गाँव में रचनात्मक कोई प्रयास शुरू किया, राह में मजाक और असहयोग ही अधिक दिखा। ये अनुभव जिस किसी नवाचारी का होगा, वह समझ सकता है कि किसी भी बदलाव को अपना कहने वाले कम, और उसका मजाक उड़ाने वाले ज्यादा होते हैं। आज भी जब नई पीढ़ी कुछ लिखने, सोचने, रचने की इच्छा जताती है, तो उसका सबसे बड़ा सहारा, मार्गदर्शक – अमिताभ दा का न होना, बहुत अखरता है।
संवाद और संघर्ष की विरासत
अमिताभ दा हमेशा तर्क-वितर्क, बहस और संवाद के लिए तैयार रहते। वे मानते थे कि अच्छे विचारों को जितना खोला, उतना ही वह पनपता है। गाँव के आम लोगों को वे पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करते, बच्चों में कविता-कहानी लिखने की स्पर्धा जागृत करते। उनकी सभाओं में हर किसी का स्वागत था – चाहे कोई किसान, मजदूर, विद्यार्थी या महिला। साहित्य और रचनात्मकता को उन्होंने आमजन के लिए सुलभ बना दिया। उसकी सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि कई बंजर खेतों में सृजन की लहर उठने लगी – गाँव के कई युवा आज भी इसी वजह से विभिन्न क्षेत्रों में सृजनात्मक सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं।
सामाजिक कुरीतियों और रचनात्मक चुनौती का द्वंद्व
अमिताभ दा सिर्फ साहित्यकार नहीं, समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों के विरुद्ध भी आवाज उठाते। बाल विवाह, दहेज प्रथा, अशिक्षा – इन सभी मुद्दों पर उन्होंने लेख, कविताएँ और जनजागरण अभियान चलाए। गाँव के धर्मनिरपेक्ष और समावेशी वातावरण के लिए संघर्ष किया। उनके संग्रह में कई ऐसी रचनाएँ हैं, जो आज भी गाँव के मुहावरों और लोकगीतों में जीवित हैं। उनका जाना, सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि विचारों का सिलसिला थम जाना है।
भविष्य की राह: हमारी जिम्मेदारी
आज जब उनकी पुण्यतिथि, जयंती मनायी जाती है, दिल में सवाल उठता है – क्या हम उन सपनों, उस जुनून और उस प्रयत्न को जारी रख पा रहे हैं? या अब सब कुछ औपचारिकताओं का हिस्सा भर रह गया है? उनकी अधूरी योजनाओं पर आगे बढ़ना समय की मांग है। हमें चाहिए कि गोविन्दपुर को फिर से सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बनाएं, उनकी स्मृति में वार्षिक साहित्यिक कार्यक्रम, रचनात्मक प्रतियोगिताएं, और युवा लेखकों के लिए कार्यशाला आयोजित करें। उनकी पुस्तकों, पत्रों और निजी डायरी को संजो कर नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्त्रोत बनाएं।लेखनी की अमिट छापअमिताभ दा की सबसे बड़ी खासियत थी – भाषा का संस्कार और विचार का तेज। उनका लिखना केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि विचार, संवेदना और सामाजिक परिवर्तन का प्रयत्न था। उन्होंने कविता, कहानी और निबन्ध के माध्यम से गोविन्दपुर को भारत के कथाचित्र में स्थान दिलाया। क्षेत्रीय बोली, लोकसंस्कृति, मिथकों और वर्तमान समय के द्वंद्व को उन्होंने अपनी भाषा में इस तरह बुना कि वह आज भी नया लगता है।व्यक्तिगत कष्ट और आत्मसंघर्ष सृजन की यात्रा में अकेले पड़े व्यक्ति का दर्द कोई नहीं समझता। अमिताभ दा के साथ संवाद करने से ज्ञात हुआ कि वे भी भीतर से अनेक बार टूटे, निराश हुए – लेकिन हर बार नए संकल्प के साथ ज़मीन पर संघर्ष किया। कई बार जब योजनाएं अधूरी रह गयीं, तो रात-दिन मेहनत करने के बाद भी परिणाम शून्य मिला। फिर भी उनकी मुस्कान, दूसरों को सहयोग देने का भाव, हर किसी के लिए प्रेरणा रहा। वे खुद को कभी ‘श्रेष्ठ’ नहीं मानते थे, बल्कि अपने आसपास के हर व्यक्ति में सृजनशीलता का बीज देखना चाहते थे। यही विनम्रता, यही त्याग उन्हें भीड़ में अलग पहचान देता है।
श्रद्धांजलि और संकल्प
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि अमिताभ दा को सदगति मिले, उनकी आत्मा को शांति मिले। लेकिन साथ ही यह भी प्रण हो कि उनकी स्मृति को औपचारिकता या रस्म अदायगी तक सीमित न रखें। अगले वर्षों में, हर बार पुण्यतिथि या जयंती पर, यदि एक नयी रचनात्मक पहल या एक युवा रचनाकार तैयार हो सके – तो यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। गाँव की नई पीढ़ी में रचनात्मकता का दीप जलाना ही उनके अधूरे कार्य को आगे बढ़ाना होगा। तभी उनका जाना व्यर्थ नहीं जाएगा, तभी हमारा कर्तव्य भी सम्पूर्ण होगा।अमिताभ दा का न होना, केवल एक व्यक्ति की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि वह रिक्त स्थान है, जिसे केवल सृजन, संघर्ष और सहयोग की नयी राहें ही भर सकती हैं। यह लेख उसी संकल्प, उसी श्रद्धा और उसी स्मृति को समर्पित है।ईश्वर से यही प्रार्थना है – “हे सृजन के देवता, अमिताभ दा को अपनी शरण में स्थान दें और हमें इतना सामर्थ्य दें कि उनके अधूरे स्वप्न को साकार कर सकें।”