भिखारी ठाकुर का जीवन दर्शन कला को मनोरंजन से ऊपर उठाकर ‘लोक-चेतना’ और ‘समाज सुधार’ के एक शक्तिशाली औजार के रूप में स्थापित करता है। उन्होंने अपनी जड़ों से जुड़कर भोजपुरी भाषा को वह वैश्विक गरिमा दी, जिसकी वह हकदार थी। खड़गपुर की रेल पटरियों पर मजदूरी करते हुए रात भर पदों की रचना करना उनकी असाधारण साधना को दर्शाता है। उनके लिए मानवता की सेवा ही सच्ची भक्ति थी, जिसे उन्होंने ‘बिदेसिया’ और ‘बेटी-वियोग’ जैसे नाटकों के जरिए समाज की कुरीतियों पर प्रहार करके सिद्ध किया। संक्षेप में, वे एक ऐसे ‘अनगढ़ हीरे’ थे जिन्होंने लोक-भाषा के माध्यम से सामाजिक क्रांति की मशाल जलाई।

आलेख :-विनोद आनंद
भा रतीय लोक संस्कृति के विशाल महासागर में भिखारी ठाकुर एक ऐसे अप्रतिम व्यक्तित्व के रूप में उभरते हैं, जिन्होंने अपनी कला को न केवल मनोरंजन का साधन बनाया, बल्कि उसे समाज के पुनरुत्थान का एक सशक्त माध्यम सिद्ध किया। 18 दिसम्बर 1887 को बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर गाँव की माटी से उपजा यह कलाकार अपनी जड़ों से इस कदर जुड़ा था कि उनकी रचनाओं में मिट्टी की सोंधी महक और लोक जीवन की धड़कन स्पष्ट सुनाई देती है। भिखारी ठाकुर का जीवन संघर्षों की एक लंबी गाथा है, जिसमें एक साधारण नाई परिवार में जन्म लेने से लेकर ‘भोजपुरी के शेक्सपियर’ कहलाने तक का सफर शामिल है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा के अभाव ने उनके भीतर के मौलिक कलाकार को दबाया नहीं, बल्कि और अधिक प्रखर बना दिया। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि बचपन अज्ञानता और खेल-कूद में बीता और अक्षर ज्ञान के लिए पाठशाला जाने के बावजूद वे प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण नहीं कर सके, परंतु उनके भीतर लोक संवेदनाओं को समझने की जो अद्भुत क्षमता थी, उसने उन्हें किताबी ज्ञान से कहीं ऊपर ले जाकर खड़ा कर दिया।
उनका जन्मकाल वह युग था जब ब्रिटिश साम्राज्य की छाया पूरब भारत पर गहराई चढ़ रही थी। 1887—वर्ष जब क्वीन विक्टोरिया की जयंती पर साम्राज्यवादी गर्व चरम पर था, किंतु भारत के गाँवों में भुखमरी, पलायन और जातिगत शोषण की काली घटाएँ मंडरा रही थीं। सारण का कुतुबपुर, गंगा के किनारे बसा एक छोटा-सा गाँव, जहाँ नाई समाज की परंपराएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही थीं। भिखारी के पिता नाई थे, जो गाँव की जातिगत संरचना में निचले पायदान पर थे, किंतु उनके घर में लोककथाओं की अमीरी थी। रातें गुजरतीं लोकगीतों में—कजरी की मधुर धुनें, सोहर की आनंदमयी लय, और बिरहा की वीर रस से ओतप्रोत गाथाएँ। बालक भिखारी की आँखें इन धुनों पर ठहरतीं, और उसके हृदय में एक अनजानी बेचैनी जागती।प्रारंभिक जीवन संघर्षों की लंबी गाथा था। शिक्षा का अभाव—वह पाठशाला गया, किंतु अक्षर ज्ञान अधूरा रहा। स्वयं उन्होंने कहा था, “बचपन अज्ञानता और खेल-कूद में बीता।” किंतु यह अज्ञानता किताबी थी, न कि हृदय की। लोक संवेदनाएँ उनके भीतर प्रबल हो रही थीं—गाँव की औरतों का विरह, मजदूरों का शोषण, कन्या-विक्रय की क्रूरता। ये सब उनके रक्त में घुलते चले गए। कल्पना कीजिए उस बालक को, जो नाई की दुकान पर बैठे-बैठे ग्रामीणों की बातें सुनता, विवादों का साक्षी बनता, और मन ही मन एक नाटक रचता। यह था भिखारी का जीवन दर्शन का बीज—लोक से उद्भव, लोक के लिए समर्पण। वे कहते थे, “मिट्टी से उठा हूँ, मिट्टी को ही लौटाऊँगा, किंतु बीच में अपनी आवाज़ छोड़ जाऊँगा।
“कोलकाता की आग में तपकर: कलाकार का सूत्रपात
भिखारी ठाकुर के रचनात्मक जीवन का असली सूत्रपात कोलकाता और खड़गपुर प्रवास के दौरान हुआ। 20वीं सदी के प्रारंभ में, जब भोजपुरिया युवा भुखमरी से बचने को कलकत्ता (कोलकाता) की फैक्टरियों की ओर लपकते थे, भिखारी भी उस प्रवाह में बह गए। जीविकोपार्जन के लिए मजदूरी, नाई का काम—ये सब उनके जीवन के कड़वे सच थे।
कलकत्ता की चमक-दमक, जहाँ ब्रिटिश साहबों के महल खड़े थे, किंतु गलियों में भारतीय मजदूरों की सिसकियाँ गूँजतीं। यहीं रामलीलाओं ने उन्हें छुआ। रामलीला का मंच—जहाँ राम का वनवास, सीता का अपहरण, रावण का संहार नाटकीय रूप लेता।भिखारी ने इसमें स्वयं को पहचाना। वे राम बने, लक्ष्मण बने, किंतु अंतर्मन में सोचते, “यह रामलीला तो राजा-रानी की कहानी है, मेरे गाँव की बेटी का वियोग कहाँ?
“वापसी पर हाथ में रामायण की स्मृतियाँ नहीं, बल्कि एक संकल्प था। उन्होंने भोजपुरी को माध्यम चुना—वह भाषा जो गाँवों की धमनियों में बहती थी, किंतु साहित्य की दृष्टि में उपेक्षित। कैथी लिपि में रचनाएँ लिखीं—उस लिपि जो भोजपुरी की आत्मा थी। गाँव के साथियों के साथ ‘नाच मंडली’ की स्थापना की। यह मंडली केवल नाच-गाना नहीं, एक चलायमान पाठशाला थी। गाँव-गाँव जाते, तंबू गाड़ते, और नाटकों से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते। सहजता से ग्रामीण विसंगतियाँ पिरोईं—जैसे कोई कारीगर सूत बुनता हो।
समाजशास्त्रियों के लिए आज भी शोध का विषय है यह कला।
भिखारी ठाकुर के लिए कला केवल मंच पर प्रदर्शन करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि वह समाज को बदलने का एक सशक्त औजार थी। उनकी मंडली जब मंच पर उतरती थी, तो उनके संवाद सीधे जनता की नब्ज पर चोट करते थे। उदाहरण के लिए, जब उनके नाटकों में कोई पात्र कहता, – “ए बाबू, परदेस जा के भूल गेल बा, गाम के माटी भूल गेल बा!” तो यह केवल एक लाइन नहीं होती थी, बल्कि उन लाखों प्रवासी मजदूरों के लिए एक आईना होता था जो अपनी जड़ों और परिवार को पीछे छोड़ गए थे। यह संवाद उस दर्द को बयां करता था जिसे समाज अक्सर अनदेखा कर देता था।
भिखारी ठाकुर का जीवन दर्शन इसी संघर्ष और अनुभव की भट्टी में तपकर कुंदन बना था। उनका मानना था कि समाज में असली क्रांति किताबी भाषा से नहीं, बल्कि ‘लोक भाषा‘ से आएगी, जिसे आम आदमी समझ सके और महसूस कर सके। उनका यह अटूट विश्वास था कि कला का असली उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि व्यवस्था और सोच में परिवर्तन लाना है।
उनके जीवन का वह दौर उनके संघर्ष की पराकाष्ठा को दर्शाता है जब वे खड़गपुर की रेल पटरियों पर एक साधारण मजदूर के रूप में काम करते थे। ज़रा सोचिए, एक व्यक्ति जो दिन भर कड़ी धूप में पसीना बहाता है और शारीरिक रूप से पूरी तरह थक जाता है, वह अपनी रातों की नींद त्यागकर भोजपुरी पदों की रचना कर रहा है। वह मजदूर जिसे दुनिया केवल पटरियाँ बिछाते हुए देख रही थी, वास्तव में वह भोजपुरी साहित्य और संस्कृति की एक नई पटरी तैयार कर रहा था।
यही उनकी साधना और तपस्या थी जिसने उन्हें एक साधारण मजदूर से उठाकर ‘भोजपुरी का शेक्सपियर‘ बना दिया। उन्होंने भोजपुरी को वह सम्मान और गरिमा दिलाई, जिसकी वह हकदार थी। उनका रचना संसार उस पसीने और तप का परिणाम है, जो उन्होंने समाज को जगाने के लिए बहाया था। उनकी यह विरासत हमें सिखाती है कि यदि उद्देश्य पवित्र हो और भाषा अपनी मिट्टी की हो, तो एक कलाकार पूरे समाज की दिशा बदल सकता है।
रचना संसार की गहराइयाँ: बिदेसिया की त्रासदी
भिखारी ठाकुर का रचना संसार इतना विशाल है कि उनकी 29 प्रकाशित कृतियाँ और अनगिनत अप्रकाशित रचनाएँ मिलकर भोजपुरी समाज का एक संपूर्ण इतिहास रचती हैं। उनके साहित्य की सबसे गहरी और मार्मिक अभिव्यक्ति ‘बिदेसिया’ (1918) में देखने को मिलती है। यह महज एक नाटक नहीं, बल्कि उस दौर के भोजपुरी समाज के पलायन और उससे उपजी त्रासदी का एक जीवंत दस्तावेज़ है। 1910 से 1920 के दशक में जब लाखों मजदूर गरीबी के कारण कलकत्ता की कोयला खदानों और चाय बागानों में काम करने जाते थे, तब पीछे छूटे परिवारों का जो हाल होता था, भिखारी ठाकुर ने उसे अपनी कला के माध्यम से अमर कर दिया।
’बिदेसिया’ की कहानी एक ऐसे पति की है जो परदेस चला जाता है और पीछे अपनी विरहिणी पत्नी को छोड़ जाता है। जब नायक कहता है, “गाम के चंदा मा, तहरा बिना रात अँधेरा बा,” तो यह पंक्ति आज भी हर उस प्रवासी मजदूर के दिल को चीर देती है जो अपने घर से दूर है। भिखारी ठाकुर ने मानवीय भावनाओं को इतने सूक्ष्म तरीके से बुना कि उनके नाटकों को देखकर दर्शक फुट-फुटकर रो पड़ते थे। लोग मीलों पैदल चलकर इसे देखने आते थे क्योंकि मंच पर वे किसी काल्पनिक पात्र को नहीं, बल्कि अपनी ही व्यथा को देख रहे होते थे।
इस नाटक की एक और बड़ी विशेषता थी ‘लॉर्डा’ का पात्र, जो एक विरहिणी पत्नी की आँखों के आँसू और उसके मन के विद्रोह को दर्शाता है। दिलचस्प बात यह है कि भिखारी ठाकुर स्वयं स्त्री का वेश धारण कर यह भूमिका निभाते थे। एक पुरुष के शरीर में स्त्री की आत्मा को इस तरह जीवंत करना किसी चमत्कार से कम नहीं था। यह लिंग-परिवर्तन पितृसत्तात्मक समाज पर एक गहरा व्यंग्य था, जिसने समाज की चेतना को झकझोरा। हालांकि इस नाटक से पलायन पूरी तरह नहीं रुका, लेकिन इसने प्रवासियों के भीतर घर लौटने की एक तड़प और समाज में एक नई जागृति पैदा की। आज भी बिहार और झारखंड के प्रवासी मजदूर बिदेसिया के गीतों में अपनी यादें तलाशते हैं।
पलायन के साथ-साथ भिखारी ठाकुर ने समाज की अन्य क्रूर प्रथाओं पर भी कड़ा प्रहार किया। 1922 में रचित नाटक ‘बेटी-वियोग’ (या बेटी-बेचवा) इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। उस समय गरीबी के कारण कम उम्र की लड़कियों को बूढ़े पुरुषों के हाथों बेचने की कुप्रथा प्रचलित थी। भिखारी ठाकुर ने इस कन्या-विक्रय के विरुद्ध आवाज़ उठाई। नाटक की नायिका का विद्रोह समाज के लिए एक चेतावनी था। जब वह कहती है, “माय के कोख से जन्मल बेटी, बाजार में बिके के नहि!”, तो यह संवाद पत्थर जैसे दिलों को भी पिघला देता था।
भिखारी ठाकुर की मंडली जिस भी गाँव में यह नाटक खेलती थी, वहां बेमेल विवाहों के खिलाफ चर्चा शुरू हो जाती थी। कहा जाता है कि उनके नाटकों के प्रभाव से कई गाँवों में वृद्धों के साथ बेटियों के विवाह रोक दिए गए। उन्होंने अपनी कला को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक सुधार का हथियार बनाया। कजरी और बिरहा जैसी लोक विधाओं का उपयोग उन्होंने विरह दिखाने और विद्रोह जगाने के लिए किया। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो उनके नाटक स्त्री-शोषण के विरुद्ध एक ऐसा प्रलेखन हैं, जो आज भी हमें अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों की याद दिलाते हैं।
‘गबर -घिचोर: पितृसत्ता की जड़ताएँ’
भिखारी ठाकुर द्वारा 1930 के आसपास रचित नाटक ‘गबर-घिचोर’ उनकी दूरदर्शी सोच का एक उत्कृष्ट प्रमाण है। यह नाटक न केवल एक कहानी है, बल्कि पितृसत्तात्मक समाज की उन गहरी जड़ताओं और रूढ़ियों पर सीधा प्रहार है, जो सदियों से मानवीय संवेदनाओं को दबाती रही हैं। इस नाटक के केंद्र में ‘गबर-घिचोर’ नाम का एक पात्र है, जो महज एक व्यक्ति नहीं बल्कि मानवीय लालच और स्वार्थ का प्रतीक बनकर उभरता है। भिखारी ठाकुर ने इसके माध्यम से यह दिखाने की निडर कोशिश की है कि कैसे संपत्ति और हवस के चक्कर में पिता-पुत्र और पति-पत्नी जैसे पवित्र संबंधों की मर्यादा भी दांव पर लग जाती है।
नाटक के दौरान भिखारी ठाकुर का एक संवाद अत्यंत प्रभावशाली है जहाँ वे कहते हैं, “घर के चोर सभे सबसे खतरनाक बा।” यह पंक्ति आज के दौर के भ्रष्टाचार और नैतिक पतन पर पूरी तरह सटीक बैठती है। यह इशारा करती है कि जब विश्वासपात्र या अपने ही लोग गद्दारी करने लगें, तो वह समाज और परिवार के लिए सबसे घातक स्थिति होती है। आज की प्रशासनिक व्यवस्था हो या पारिवारिक ढांचा, अपनों द्वारा किया गया भ्रष्टाचार ही सबसे अधिक नुकसान पहुँचाता है।
भिखारी ठाकुर की कलाकारी की खास बात यह थी कि वे गंभीर से गंभीर विषय को भी हास्य और व्यंग्य की चाशनी में डुबोकर पेश करते थे। ‘गबर-घिचोर’ में भी उन्होंने हास्य का सहारा लेकर समाज की कड़वी सच्चाई को परोसा है। दर्शक जब इन दृश्यों को देखते हैं, तो वे खिलखिलाकर हँसते तो हैं, लेकिन साथ ही वे अपने भीतर झाँकने और समाज की विसंगतियों पर सोचने को मजबूर भी हो जाते हैं। यह नाटक साबित करता है कि मनोरंजन तभी सार्थक है जब वह समाज को आईना दिखाने का साहस रखता हो।
आध्यात्मिक आयाम:भक्ति का लोक स्वरूप
भिखारी ठाकुर का व्यक्तित्व एक सामाजिक क्रांतिकारी और परम उपासक का अनूठा संगम था। उनकी भक्ति कबीर और रैदास की उस महान परंपरा का हिस्सा थी जहाँ ईश्वर को किसी बाहरी आडंबर या दिखावे में नहीं, बल्कि मनुष्य की निस्वार्थ सेवा में खोजा जाता था। ‘गंगा स्नान’, ‘भिखारी भजनमाला’ और ‘राम नाम माला’ जैसी उनकी कृतियों में यह सरल और निष्कपट भक्ति स्पष्ट रूप से झलकती है। उन्होंने लोक भजनों के माध्यम से साधारण जनता को यह समझाया कि संसार के दुखों से पार पाने का रास्ता ईश्वर के नाम और सादगी में छिपा है।
उनकी लेखन शैली बहुत प्रभावशाली थी क्योंकि वे गद्य और पद्य का ऐसा मेल करते थे कि संवाद स्वयं काव्यात्मक हो जाते थे। भिखारी ठाकुर ने लोक संस्कृति की रग को पहचानते हुए कजरी, सोहर, चैता और बिरहा जैसी विधाओं का बहुत ही कुशलता से प्रयोग किया। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने जन्म के समय गाए जाने वाले ‘सोहर’ का उपयोग मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि संस्कार देने के लिए किया, जिसमें वे नवजात शिशु को नशा न करने और अपनी मिट्टी का मान रखने की सीख देते थे।
उनकी रचनाओं में उठाए गए मुद्दे आज भी हमारे समाज के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ‘विधवा-विलाप’ में उन्होंने विधवाओं की दयनीय स्थिति पर गहरा दुख व्यक्त किया, ‘भाई-विरोध’ में पारिवारिक कलह के दर्द को दिखाया और ‘कलियुग प्रेम’ के माध्यम से बढ़ती नशाखोरी पर कड़ा प्रहार किया। उनके लिखे नाटक, भजन और काव्य सहित कुल 29 रचनाएँ भोजपुरी साहित्य की अनमोल निधि हैं। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि लोग उनकी मंडलियों के कार्यक्रम देखने के लिए मीलों पैदल चलकर पहुँचते थे।
यही कारण है कि राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें ‘अनगढ़ हीरा’ की उपाधि दी और जगदीश चंद्र माथुर ने उनके काम की तुलना आधुनिक विश्व रंगमंच से की। जिस प्रकार शेक्सपियर ने अंग्रेजी साहित्य को नई ऊंचाइयां दीं, उसी प्रकार भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी को एक अंतरराष्ट्रीय गरिमा प्रदान की। भले ही 10 जुलाई 1971 को उनका देहावसान हो गया, लेकिन उनकी जगाई हुई चेतना आज भी भोजपुरी सिनेमा, लोक नाटकों और धनबाद जैसे सक्रिय सांस्कृतिक क्षेत्रों में जीवित है। वे एक ऐसी सांस्कृतिक धरोहर हैं जो हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने की निरंतर प्रेरणा देते हैं।