• Mon. Feb 23rd, 2026
साहित्य, संस्कृति, कला

शहीद रामफल मंडल पर केंद्रित विनोद आनंद की कविताएं

Byadmin

Feb 22, 2026
Please share this post

कवि परिचय :-

विनोद आनंद

     ( विनोद कुमार मंडल )

शिक्षा :- एम ए (हिंदी )रांची विश्व विद्यालय, रांची

पिछले चार दशक से पत्रकारिता, औऱ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय, विभिन्न सामजिक संस्थाओं द्वारा साहित्य औऱ पत्रकारिता के लिए सम्मानित,

संप्रति :-सम्पादक अंतर्कथा
पता :-रतनपुर, पो:-गोविंदपुर धनबाद, झारखं

कविता :-1

शहीदी तराना: अमर नायक रामफल मंडल 

​(यह कविता उस क्षण को समर्पित है जब रामफल मंडल फांसी के फंदे को चूमते हैं)

बाजपट्टी की मिट्टी से जो,
इंकलाब की उठी पुकार,
फरसा लेकर निकल पड़ा वो,
करने को रिपु का संहार।

लोह-श्रृंखला जकड़ न पायी,
उस बागी की रूह को,
सत्य की खातिर जिसने वार दिया,
अपनी खुशियों की खुश्बू को।

​तीन बार उस निर्भय मुख से,
सत्य की ज्वाला फूटी थी,
“पहल चोट है मेरी साहेब!”
न्याय की हस्ती टूटी थी।

वकील खड़े थे विस्मित होकर,
जज का माथा चकराया,
फांसी का वो काला फंदा,
उस वीर को रत्ती न डराया।

​जियें हजारों साल वो योद्धा,
जो सच पर मरना जानते,
मौत को भी जो अपनी दुल्हन,

हंसकर वरणा जानते।

रामफल तुम अमर रहोगे,
जब तक गंगा की धारा है,
आजाद देश की हर एक सांस में,
नाम सिर्फ तुम्हारा है।

कविता :-2

अमर बलिदानी: रामफल मंडल

मधुरापुर की माटी का था ,
रामफल अनुपम लाल,
गोकुल मंडल का वह बेटा,
था वह भारत माँ की ढाल !

बाज़पट्टी की धरती पूछे,
मेरा लाल कहाँ खो गया?
वतन की खातिर लड़ने वाला,
तिरंगे की गोद में सो गया।

झुकना जिसे स्वीकार नहीं था,
वह इंकलाब की ज्वाला था,
उन्नीस बरस का वह बालक,
भारत माँ का रखवाला था।

गांधी के एक आह्वान पर,
वह रणक्षेत्र में कूद गया,
मिटाने बेड़ियाँ गुलामी की,
वह लहू के सागर में डूब गया।

न मोह रहा घर-आँगन का,
न पत्नी-परिवार की ममता थी,
मुक्ति का स्वप्न सजाए आँखों में,
वो मौत से जाकर जूझ गया।

बाज़पट्टी के चौक पर, जब
वह सिंह सा दहाड़ उठा,
अफ़सर का सर काट कर उसने,
फिरंगी का गुरूर पछाड़ दिया।

पेश हुआ जब वह अदालत में,
चेहरे पर न कोई शिकन थी,
किए अपने कृत्यों पर,
न रत्ती भर भी जलन थी।

जज ने पूछा,”क्यों ली जान,
किस बात की थी ये खता?”
उसने न किया बचाव,
बस सिर झुकाए खड़ा रहा।

खड़े थे वकील ढाल बनकर,
“झूठ कहो” ये कहते थे,
बच निकलने का एक ही रास्ता,
कान में वो ये भरते थे।

पर वह था सत्य का राही
झूठ न बोलने की कसम खाई
सच स्वीकार कर अपनी जुबानी,
देश के ख़ातिर शहादत लिखवाई

कांपी कलम जब ‘हाँ’ बोला,
सन्नाटा वो कड़क उठा,
फाँसी के उस फंदे में भी,
आज़ादी का नूर दिखा।

देखकर उस बालक का दम,
वकील दास भी रोए थे,
न थे उसकी आँखों में आँसू
वे आजादी के सपने बोए थे।

भादो की वह सुबह सलोनी,
भागलपुर की वह दीवार,
देख रही थी एक वीर का,
मौत से पावन साक्षात्कार।

जल्लाद के भी हाथ कांप गए,
देख के उसका भोलापन,
पर हँसकर उसने चूम लिया,
फंदा जैसे हो फूलों का अर्पण।

त्याग दिया सर्वस्व देश पर,
वो वीर बड़ा मतवाला था,
हिला दिया अंग्रेजी शासन,
वो इंकलाब का उजाला था।

बाज़पट्टी का वह सूरज,
अब गगन में सदा चमकेगा,
जब तक बहती गंगा मैया,
तबतक नाम तुम्हारा महकेगा।

कोटि-कोटि नमन तुम्हें,
हे भारत माँ के वीर सपूत,
रामफल तुम अमर हो गए,
बनकर आज़ादी के दूत।

कविता :-3

गीत : माटी कर मान (झारखंड गौरव)

                 (मुखड़ा)

प्रकृति ने हाथों से अपने, यह चमन सँवारा है,
झरनों के सुर-ताल में बसता, झारखंड हमारा है।
शिबू सोरेन, विनोद बाबू ने, संघर्षों की अलख जगाई,
वीरों के बलिदान से हमने, अपनी अलग पहचान है पाई।
हो… जय जोहार, जय झारखंड! यह नारा सबसे प्यारा है,
प्रकृति की गोदी में बसता, झारखंड हमारा है।

(अंतरा – 1: शहादत और स्वाभिमान)

बिरसा, सिदो-कान्हू ने अपने, लहू से माटी सींची है,
अन्याय के आगे वीरों ने, धनुष की डोरी खींची है।
हम भोले हैं, सीधे हैं, पर जंगल पर अधिकार हमारा,
वन-पर्वत की रक्षा करना, धर्म और संस्कार हमारा।
जिसने किया सम्मान हमारा, वह प्राणों से प्यारा है,
झरनों के सुर-ताल में बसता, झारखंड हमारा है।

​(अंतरा – 2: नदियाँ और प्राकृतिक छटा)

झंकृत होती माटी यहाँ की, पावन स्वर्णरेखा की धार,
पहाड़-पठार और वादियों में, झलके कुदरत का श्रृंगार।
कल-कल करती नदियाँ जैसे, धरती पर अमृत की वर्षा,
हरी-भरी हर डाल यहाँ की, मन में भरती हर्ष और हर्षा।
स्वर्ग सरीखा सुंदर अपना, यह कोना जग सारा है,
झरनों के सुर-ताल में बसता, झारखंड हमारा है।

​(अंतरा – 3: खनिज और उद्योग)

कोयला, लोहा, तांबा यहाँ, भारत का मजबूत खंभा,
खनिजों के इस वैभव को, देख करे सब जग अचम्भा।
अपनी धरती का सीना चीर, देश को हमने ऊर्जा दी,
टाटा, अंबानी, अडानी को भी, प्रेम-समर्पण की पूँजी दी।
उद्योगों का आधार हमीं, श्रम ही जीवन सारा है,
झरनों के सुर-ताल में बसता, झारखंड हमारा है।

(अंतरा – 4: वर्तमान और भाईचारा)

हेमंत सोरेन के कार्यों से, अब न्याय की नई बयार चली,
कल्याणकारी योजनाओं से, खुशियों की हर राह खिली।
बाहर से जो आए बसे, उन पर भी यह दिल उदार है,
आपसी भाईचारा और प्रेम ही, यहाँ की पावन सार है।
क्षमता और प्रतिभा से अपनी, भारत का मान उभारा है,
झरनों के सुर-ताल में बसता, झारखंड हमारा है।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *