पश्चिम एशिया में गहराता ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय सीमा विवाद नहीं, बल्कि एक वैश्विक त्रासदी का रूप ले चुका है। अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं को ताक पर रखकर की जा रही सैन्य कार्रवाइयों ने पूरी दुनिया को परमाणु विध्वंस के करीब ला दिया है। जहाँ भारत निरंतर संवाद और कूटनीति की वकालत कर रहा है, वहीं प्रमुख पश्चिमी देश अपने स्वार्थों की रक्षा के नाम पर युद्ध की आग को और भड़का रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता के बीच, अमेरिका का यह निरंकुश व्यवहार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के पतन का संकेत है, जिसके परिणाम पूरी मानव सभ्यता के लिए आत्मघाती सिद्ध होंगे।
आ ज दुनिया जिस चौराहे पर खड़ी है, वहां से विनाश की गंध स्पष्ट महसूस की जा रही है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच गहराता युद्ध अब केवल सीमाई झड़प या कूटनीतिक गतिरोध नहीं रह गया है, बल्कि यह उस क्रूर साम्राज्यवादी मानसिकता का चरम है जिसे अमेरिका ने दशकों से अपनी ‘ग्लोबल पुलिसमैन’ की छवि के पीछे छिपा कर रखा था। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की अमेरिका और इजरायल द्वारा संयुक्त ऑपरेशन में हत्या ने उस आग में घी डालने का काम किया है, जो पहले से ही पश्चिम एशिया को झुलसा रही थी।
इस एक कृत्य ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ा दी हैं और यह साबित कर दिया है कि शक्तिशाली राष्ट्रों के लिए संप्रभुता और नैतिकता जैसे शब्द केवल कागजी विलासिता हैं। अमेरिका का इतिहास गवाह है कि उसने अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए दुनिया के न जाने कितने देशों को युद्ध की भट्टी में झोंका है। कभी इराक, कभी लीबिया, कभी अफगानिस्तान और अब ईरान—अमेरिकी विदेश नीति का मुख्य आधार ही ‘सत्ता परिवर्तन’ और ‘संसाधनों पर कब्जा’ रहा है।
हाल ही में जिस तरह एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति के अपहरण की खबरें आईं और पूर्व में जिस तरह से लोकतांत्रिक सरकारों को अस्थिर किया गया, वह अमेरिका की उस दादागिरी का प्रमाण है जो अब पूरी दुनिया के लिए नासूर बन चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भाषा किसी परिपक्व राजनेता की नहीं, बल्कि एक ऐसे अहंकारी शासक की है जो पूरी दुनिया को अपनी जागीर समझता है।
दुनिया आज विनाश के उस मुहाने पर खड़ी है, जहाँ अमेरिकी दादागिरी और उसके निजी स्वार्थ ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों को बंधक बना लिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या और एक संप्रभु देश के राष्ट्रपति का अपहरण कर अमेरिका ने साबित कर दिया है कि वह वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है। संयुक्त राष्ट्र की विफलता और ट्रंप की हठधर्मिता ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की ओर धकेल दिया है। यदि समय रहते वैश्विक शक्तियों ने एकजुट होकर इस साम्राज्यवादी सोच का प्रतिरोध नहीं किया, तो परमाणु युद्ध की आग में न केवल मानवता भस्म होगी, बल्कि अमेरिका का अपना अस्तित्व भी उसकी अति-महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ जाएगा।
ईरान को पूरी तरह खत्म करने की धमकी देना और परमाणु युद्ध की संभावनाओं को हवा देना यह दर्शाता है कि उन्हें मानवता के भविष्य की रत्ती भर भी परवाह नहीं है।
आज जब ईरान ने अपने नेताओं की हत्या के जवाब में गल्फ देशों और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू किए हैं, तो दुनिया विनाश के उस मुहाने पर खड़ी है जहां से वापसी का रास्ता केवल राख और मलबे से होकर गुजरता है। यदि इस युद्ध में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होता है, तो हम एक बार फिर हिरोशिमा और नागासाकी जैसी त्रासदी के गवाह बनेंगे, लेकिन इस बार विनाश का पैमाना कहीं अधिक व्यापक होगा।
विडंबना देखिए कि आज की तारीख में भारत को छोड़कर कोई भी देश खुलकर शांति की अपील नहीं कर रहा है। रूस और चीन ने चिंता तो जताई है, लेकिन अमेरिका के सीधे युद्ध में उतरने से ध्रुवीकरण इतना तीव्र हो गया है कि दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की आहट सुन रही है। ट्रंप की दादागिरी का आलम यह है कि वे अपने पुराने सहयोगियों तक को नहीं बख्श रहे हैं। ब्रिटेन जैसे देश को दी गई धमकी कि उसने अपनी धरती का इस्तेमाल युद्ध के लिए क्यों नहीं करने दिया, यह बताता है कि अमेरिका अब अपने दोस्तों को अपना गुलाम समझने लगा है। वहीं पाकिस्तान जैसे देश, जो अपनी धरती का इस्तेमाल हवाई हमलों के लिए होने दे रहे हैं, वे अपने ही भविष्य के लिए कब्र खोद रहे हैं।
हिरोशिमा और नागासाकी जैसी तबाही की परछाइयां एक बार फिर वैश्विक क्षितिज पर मंडरा रही हैं। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों ने न केवल ईरान को अस्थिर किया है, बल्कि पूरी दुनिया को एक ऐसे युद्ध में झोंक दिया है जिसका अंत केवल सर्वनाश है। अमेरिका का इतिहास गवाह है कि उसने अपनी ‘सत्ता परिवर्तन’ की नीति से कई देशों को बर्बाद किया है, और अब ईरान उसका ताज़ा निशाना है। यह समय चुप रहने का नहीं, बल्कि एकजुट होकर उस ‘ग्लोबल दादागिरी’ को रोकने का है जो शांति के बजाय बारूद की गंध फैला रही है। यदि अभी अमन स्थापित नहीं हुआ, तो आने वाला भविष्य केवल मलबे का ढेर होगा।
ईरान के भीतर खामेनेई की मौत ने वहां के जनमानस और सैन्य नेतृत्व को इतना आक्रोशित कर दिया है कि अब यह लड़ाई केवल सेनाओं के बीच नहीं, बल्कि विचारधाराओं और अस्तित्व की जंग बन गई है। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन का यह कहना कि वे अपने हितों की रक्षा के लिए कदम उठाएंगे, केवल आग में तेल डालने जैसा है क्योंकि इससे युद्ध का दायरा सिमटने के बजाय बढ़ेगा ही।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की प्रासंगिकता पर खड़ा होता है। जिस संस्था का निर्माण ही युद्धों को रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन कराने के लिए हुआ था, वह आज एक पंगु और मूकदर्शक इकाई बनकर रह गई है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की अवैध हरकतों और अंतरराष्ट्रीय संधियों के उल्लंघन पर लगाम लगाने में पूरी तरह विफल रहा है। जब तक विश्व की यह सर्वोच्च संस्था शक्तिशाली देशों की कठपुतली बनी रहेगी, तब तक छोटे और विकासशील देशों की संप्रभुता इसी तरह दांव पर लगती रहेगी।
पश्चिम एशिया की अस्थिरता का असर केवल वहां तक सीमित नहीं रहेगा। हिज़्बुल्लाह का मैदान में उतरना और लंबी दूरी की मिसाइलों का सक्रिय होना इजरायल के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। अगर ईरान ने अपनी रक्षा के लिए परमाणु डिटरेंस का रास्ता चुना, तो इसके लिए जिम्मेदार केवल ईरान नहीं, बल्कि वे देश होंगे जिन्होंने उसे दीवार से सटा दिया है। अमेरिका अगर यह सोच रहा है कि वह सात समंदर पार बैठकर इस तबाही से सुरक्षित रहेगा, तो यह उसकी भारी भूल है। आज की वैश्वीकृत दुनिया में आर्थिक तबाही, शरणार्थी संकट और साइबर हमलों से कोई भी देश अछूता नहीं रह सकता। अमेरिका की अति-महत्वाकांक्षा उसके अपने अस्तित्व को भी ले डूबेगी।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह संतुलित रुख अपनाते हुए बातचीत और कूटनीति पर जोर दिया है, वही आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। लेकिन क्या दुनिया के अन्य देश जागेंगे? क्या वे अमेरिका की इस नंगी दादागिरी के खिलाफ एक स्वर में खड़े होंगे? समय आ गया है कि दुनिया के सभी राष्ट्र एकजुट होकर इस विस्तारवादी और विनाशकारी नीति का प्रतिरोध करें। अमन और शांति की स्थापना के लिए अमेरिका को उसकी सीमाओं और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करना सिखाना होगा। यदि आज चुप रहे, तो कल का इतिहास हमें एक ऐसे युग के रूप में याद रखेगा जिसने अपनी आंखों के सामने मानवता को शर्मसार होते देखा और कुछ नहीं किया। यह युद्ध किसी की जीत नहीं लाएगा, बल्कि यह केवल मानवता की हार और एक ऐसे विनाश का प्रतीक बनेगा जिससे उभरने में सदियां लग जाएंगी। अतः वैश्विक समुदाय को अविलंब हस्तक्षेप कर इस पागलपन को रोकना चाहिए, वरना तबाही के इस मंजर में न तो विजेता बचेगा और न ही कोई गवाह।