मैथिली साहित्य के आधुनिक इतिहास में जगदीश प्रसाद मण्डल एक ऐसे विरल रचनाकार के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने साहित्य के अभिजात्य दुर्ग को ढहाकर उसे सीधे खेत-खलिहानों और आम जनमानस के संघर्षों से जोड़ दिया। ५ जुलाई १९४७ को मधुबनी के बेरमा गाँव में जन्मे मण्डल जी का जीवन स्वयं में एक महाकाव्य है, जहाँ उन्होंने ‘हल’ और ‘हर्फ’ (कलम) के बीच एक अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया। उच्च शिक्षित होने के बावजूद एक सीमांत किसान का जीवन जीने वाले मण्डल जी ने सामंती व्यवस्था और शोषण के विरुद्ध लड़ते हुए १७ बार जेल की यात्रा की, और यही तपता हुआ यथार्थ उनके साहित्य की शक्ति बना।
विनोद आनंद
मै थिली साहित्य के आधुनिक इतिहास में जगदीश प्रसाद मण्डल एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के रूप में उभरकर सामने आए हैं जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से साहित्य की पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर उसे सीधे खेत-खलिहानों और आम जनमानस के संघर्षों से जोड़ दिया है।
उनका व्यक्तित्व और कृतित्व इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एक सच्चा रचनाकार केवल कल्पना के लोक में विचरण नहीं करता, बल्कि वह अपनी मिट्टी की सोंधी गंध और अपने समाज की कड़वी सच्चाइयों को शब्द देने का साहस रखता है।
5 जुलाई 1947 को मधुबनी जिले के बेरमा गाँव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे जगदीश प्रसाद मण्डल का जीवन स्वयं में एक महाकाव्य की तरह रहा है, जहाँ उन्होंने अभावों के बीच भी वैचारिक प्रखरता को कभी कम नहीं होने दिया। पिता दल्लू मण्डल के कबीरपंथी विचारों और माता मकोबती देवी के संस्कारों ने उनके भीतर सामाजिक न्याय और समरसता की जो नींव रखी, वही आगे चलकर उनके विशाल साहित्य का आधार बनी।
शिक्षा के क्षेत्र में राजनीति शास्त्र और हिंदी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के बावजूद उन्होंने कभी खेती से अपना नाता नहीं तोड़ा, बल्कि एक सीमांत किसान के रूप में तीन-चार बीघे जमीन पर पसीना बहाते हुए उन्होंने उस ‘सत्य’ को जीया जिसे बाद में उन्होंने पन्नों पर उतारा।
उनका साहित्यिक सफर भले ही औपचारिक रूप से 2001 के बाद गति पकड़ा और 2008 के आसपास ‘विदेह’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से प्रखर हुआ, लेकिन उनकी वैचारिक तैयारी दशकों के सामाजिक संघर्षों से तपकर कुंदन बनी थी। एक सक्रिय आंदोलनकारी के रूप में उन्होंने सामंती व्यवस्था, जमींदारी के अवशेषों और सूदखोरी के विरुद्ध जो लंबी लड़ाई लड़ी, उसके कारण उन्हें सत्रह बार जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा और पचासों मुकदमों का सामना करना पड़ा। यह संघर्ष उनके लिए केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं थी, बल्कि मिथिला के ग्रामीण समाज की नब्ज टटोलने का एक जरिया थी। यही कारण है कि जब वे लिखना शुरू करते हैं, तो उनके शब्दों में बनावटीपन की जगह यथार्थ की खनक सुनाई देती है। उन्होंने मैथिली साहित्य में उस समय हस्तक्षेप किया जब साहित्य का एक बड़ा हिस्सा अति-बौद्धिकता या केवल सांस्कृतिक गौरवगान में उलझा था।
मण्डल जी ने अपनी रचनाओं के केंद्र में उन वर्गों को रखा जिन्हें मुख्यधारा के साहित्य ने प्रायः हाशिए पर छोड़ दिया था—चाहे वे पासवान हों, केवट हों, राम हों या धानुक। उन्होंने स्पष्ट घोषणा की कि जैसा समाज सबका है, वैसा ही साहित्य भी सबका होना चाहिए।

उनकी कालजयी कृति ‘पंगु’, जिसे 2021 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया, आधुनिक मैथिली उपन्यास विधा में एक मील का पत्थर है। यह उपन्यास केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि आजादी के बाद के ग्रामीण बिहार की कृषि-अर्थव्यवस्था, भूदान आंदोलन की विफलता और किसान के टूटते सपनों का एक प्रामाणिक दस्तावेज है। इसमें नायक देवचरण के माध्यम से उन्होंने उस पीड़ा को स्वर दिया है जहाँ जमीन केवल आजीविका का साधन नहीं बल्कि अस्मिता का प्रश्न बन जाती है। मण्डल जी का रचना-शिल्प अत्यंत सहज और प्रभावी है। वे कठिन से कठिन सामाजिक दर्शन को ‘गामक गप’ की तरह प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उनकी भाषा में ग्रामीण मुहावरों, लोक-कथाओं और स्थानीय ‘फकड़ा’ का जो समावेश मिलता है, वह पाठक को सीधे उस परिवेश में ले जाता है जहाँ कथा घटित हो रही है। उन्होंने करीब 19 उपन्यास, 750 से अधिक कहानियाँ और 500 से अधिक गीतों की रचना कर मैथिली के भंडार को समृद्ध किया। उनकी लघु कथाओं का संग्रह ‘गामक जिनगी’ हो या ‘मौलाइल गाछक फूल’ जैसे उपन्यास, हर जगह वे एक सजग प्रहरी की तरह समाज की विसंगतियों पर चोट करते नजर आते हैं।
मैथिली साहित्य में उनके आगमन को विद्वान एक विभाजक रेखा की तरह देखते हैं। उनसे पूर्व का साहित्य जहाँ अक्सर एक खास वर्ग और संस्कृति के इर्द-गिर्द घूमता था, वहीं मण्डल जी ने साहित्य का जनतंत्रीकरण कर दिया। उन्होंने स्त्री-चेतना पर भी बेबाकी से लिखा। उनके नाटकों में मिथिला की स्त्रियाँ केवल विरह-वेदना में जलने वाली पात्र नहीं हैं, बल्कि वे अपने हक के लिए लड़ने वाली और सामाजिक कुरीतियों को चुनौती देने वाली सशक्त व्यक्तित्व हैं। मण्डल जी की दृष्टि मार्क्सवादी चेतना से अनुप्राणित रही है, लेकिन उनकी विचारधारा कभी भी कला पर हावी नहीं होती; वह पात्रों के संघर्ष और उनकी बातचीत से स्वतः स्फुरित होती है। उन्होंने न केवल स्वयं लिखा, बल्कि ‘सगर राति दीप जरय’ जैसे साहित्यिक मंचों के माध्यम से सैकड़ों नए लेखकों को प्रोत्साहित किया और उन्हें प्रकाशित करने का बीड़ा उठाया। उनकी यह निस्वार्थ सेवा दर्शाती है कि वे केवल एक लेखक नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन के सूत्रधार हैं।
जगदीश प्रसाद मण्डल का मानना है कि साहित्य तभी सार्थक है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में बदलाव का कारक बने। उनके गीतों में जहाँ एक ओर मिट्टी का मोह है, वहीं दूसरी ओर व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी। ‘अकास गंगा’ और ‘इन्द्रधनुषी अकाश’ जैसे कविता संग्रहों में उनकी संवेदनशीलता के विभिन्न आयाम देखने को मिलते हैं। उनकी उपलब्धियाँ केवल पुरस्कारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी असली उपलब्धि वह विश्वास है जो उन्होंने आम मैथिल पाठकों के मन में जगाया है। आज जब ग्रामीण संस्कृति और कृषि संकट पर विमर्श वैश्विक स्तर पर हो रहा है, तब मण्डल जी की रचनाएँ एक प्रकाश स्तंभ की तरह मार्ग प्रशस्त करती हैं। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर ही कोई रचनाकार वैश्विक ऊँचाइयों को छू सकता है। उनका जीवन और उनका साहित्य दोनों ही इस सत्य को उद्घाटित करते हैं कि कलम तभी शक्तिशाली होती है जब उसकी स्याही में जन-संघर्ष का पसीना घुला हो। अंततः, जगदीश प्रसाद मण्डल मैथिली साहित्य के वह बरगद हैं जिसकी छाया में मिथिला का यथार्थ सुरक्षित है और जिसकी जड़ें उस मिट्टी में इतनी गहरी हैं जहाँ से उखड़ना नामुमकिन है। उनका कृतित्व आने वाली कई पीढ़ियों के लिए न केवल शोध का विषय रहेगा, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा भी बना रहेगा।
जीवन बृत
जगदीश प्रसाद मण्डल का जीवन वृत्त केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उस ग्रामीण संघर्ष की महागाथा है, जिसे अक्सर मुख्यधारा के इतिहास में हाशिए पर रख दिया गया है। 5 जुलाई 1947 को, जब देश अपनी आजादी की दहलीज पर खड़ा था, बिहार के मधुबनी जिले के लखनौर प्रखंड स्थित बेरमा गाँव में एक ऐसे बालक का जन्म हुआ, जिसे नियति ने ‘हल’ और ‘हर्फ’ दोनों का उत्तराधिकार सौंपा था।
उनके पिता दल्लू मण्डल और माता मकोबती देवी एक साधारण किसान परिवार से थे, किंतु उनके विचार साधारण नहीं थे। पिता कबीरपंथी विचारधारा के अनुयायी थे, जिसका गहरा प्रभाव बालक जगदीश के मानस पटल पर अंकित हुआ। कबीर की वह निर्भीकता, जो व्यवस्था की आँखों में आँखें डालकर सच कहने का साहस देती है, मण्डल जी के स्वभाव का स्थायी हिस्सा बन गई। यही कारण था कि बचपन से ही उन्होंने समाज में व्याप्त ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव को केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसे चुनौती देने का संकल्प भी लिया। उनके घर का वातावरण सादगी और नैतिकता से ओतप्रोत था, जहाँ कबीर के दोहे केवल गाए नहीं जाते थे, बल्कि जीवन की कसौटी के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे।इसी कबीरपंथी चेतना ने उनके भीतर सामाजिक न्याय के प्रति उस संवेदनशीलता को जन्म दिया, जो आगे चलकर उनके विपुल साहित्य का प्राणतत्व बनी।
उनकी शिक्षा-दीक्षा की यात्रा भी किसी संघर्ष से कम नहीं थी। उन्होंने हिंदी और राजनीति शास्त्र जैसे विषयों में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की, जो उस दौर के ग्रामीण परिवेश में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। एम.ए. करने के बाद उनके पास शहरी चमक-धमक और सफेदपोश नौकरियों के तमाम अवसर थे, किंतु उन्होंने एक ऐसा मार्ग चुना जो काँटों भरा था। उन्होंने कलम पकड़ने से पहले मिट्टी को पकड़ा और खेती को ही अपनी मुख्य पहचान बनाने का साहसिक निर्णय लिया। यह निर्णय केवल जीविकोपार्जन का नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक वैचारिक संकल्प था। मात्र तीन-चार बीघे की पैतृक भूमि पर उन्होंने कड़ी धूप और बरसात में पसीना बहाकर सब्जी उत्पादन का कार्य किया। एक उच्च शिक्षित व्यक्ति का इस तरह मिट्टी से जुड़कर किसानी करना उस सामंती समाज में एक मौन क्रांति की तरह था, जहाँ शारीरिक श्रम को अक्सर हेय दृष्टि से देखा जाता था। उनके लिए खेती केवल पेट भरने का साधन नहीं थी, बल्कि वह एक प्रयोगशाला थी जहाँ वे समाज के सबसे निचले तबके के दुखों, सरकारी तंत्र की उदासीनता और प्रकृति के साथ मनुष्य के आदिम संघर्ष को साक्षात अनुभव कर रहे थे। परिवार का भरण-पोषण इसी अल्प भूमि से करते हुए उन्होंने कभी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया और इसी आर्थिक तंगी ने उन्हें वह दृष्टि दी, जो बाद में उनके कथा-साहित्य में ‘यथार्थवाद’ बनकर उभरी।
मण्डल जी का व्यक्तित्व संघर्ष की जिस भट्टी में तपा, उसका सबसे प्रखर अध्याय उनकी विद्रोही चेतना और आंदोलनकारी जीवन है। साठ और सत्तर के दशक में जब उत्तर बिहार का इलाका जमींदारी के अवशेषों, महाजनी शोषण और सूदखोरी के चंगुल में फंसा हुआ था, तब जगदीश प्रसाद मण्डल एक प्रखर जन-नेता के रूप में उभरे। उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा का गहन अध्ययन किया और उसे केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर धरातल पर उतारा। सामंती ताकतों और दबंगों के विरुद्ध उनकी लड़ाई इतनी तीव्र थी कि उन्हें व्यवस्था के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा। अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने कचहरियों के चक्कर लगाने और जेल की काल कोठरियों में व्यतीत किया। सत्रह बार जेल यात्रा और लगभग पचपन मुकदमों का सामना करना किसी भी सामान्य व्यक्ति को तोड़ सकता था, लेकिन मण्डल जी के लिए ये अनुभव किसी विश्वविद्यालय की डिग्री से भी अधिक मूल्यवान साबित हुए। जेल की सलाखों के पीछे उन्होंने उन अपराधियों, विद्रोहियों और शोषितों के मनोविज्ञान को समझा, जो बाद में उनके उपन्यासों के अमर पात्र बने। सन 2005 तक वे कानूनी लड़ाइयों में उलझे रहे, लेकिन उनके भीतर का रचनाकार इन आपदाओं को अनुभवों की पूँजी में बदलता रहा। वे अक्सर कहते हैं कि उनके साहित्य की ‘कच्ची सामग्री’ उन्हीं मुकदमों, पुलिस की लाठियों और जेल की दीवारों से उपजी है।
1965-67 के दौरान कामरेड भोगेंद्र झा और रबीन्द्र नारायण मिश्र जैसे व्यक्तित्वों के संपर्क ने उनकी राजनीतिक समझ को और अधिक परिपक्व किया। उन्होंने न केवल मिथिलांचल बल्कि पूर्वोत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक की व्यापक यात्राएँ कीं। त्रिपुरा के जंगलों से लेकर मुंबई की झुग्गी-बस्तियों तक के उनके प्रवास ने उनकी संवेदना को केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय फलक प्रदान किया। इन यात्राओं ने उन्हें सिखाया कि गरीबी और शोषण की भाषा हर जगह एक जैसी होती है। उनकी पत्नी रामसखी देवी ने उनके इस संघर्षपूर्ण जीवन में एक छाया की तरह साथ दिया। जब मण्डल जी जेल में होते या आंदोलनों में सक्रिय होते, तब घर और खेती की जिम्मेदारी संभालना किसी चुनौती से कम नहीं था। उनके तीन पुत्रों में से एक ने किसानी को अपनाया, दूसरे ने व्यवसाय और तीसरे ने उच्च शिक्षा के माध्यम से अकादमिक क्षेत्र में पहचान बनाई, जो मण्डल जी के परिवार में श्रम और शिक्षा के संतुलन को दर्शाता है। जगदीश प्रसाद मण्डल का जीवन एक खुली किताब की तरह है, जिसमें हर पन्ना संघर्ष, ईमानदारी और लोक-कल्याण की स्याही से लिखा गया है। उनका व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि श्रेष्ठ सृजन केवल एकांत के कमरों में नहीं, बल्कि जन-संघर्षों के कोलाहल और मिट्टी की धूल के बीच से भी जन्म ले सकता है। आज भी वे अपनी सादगी और वैचारिक दृढ़ता के साथ एक ऐसे वटवृक्ष की तरह खड़े हैं, जिसकी जड़ें मिथिला की गहरी संस्कृति में धंसी हैं और जिसकी टहनियाँ सामाजिक न्याय के आकाश को छूने के लिए लालायित हैं।
साहित्यिक योगदान
जगदीश प्रसाद मण्डल का साहित्यिक योगदान मैथिली साहित्य में एक महासमुद्र की तरह विस्तृत और गहन है। भले ही उनका सक्रिय लेखन काल 2001 के बाद से प्रखर हुआ हो, लेकिन उन्होंने परिमाण और गुणवत्ता दोनों में अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किए हैं। मात्र दो दशकों से भी कम समय में उन्होंने मैथिली की विभिन्न विधाओं को समृद्ध किया है, जिसमें उपन्यास, कथा, काव्य, नाटक और अन्य रूप शामिल हैं।
उनकी रचनाएँ ग्रामीण जीवन की सच्ची तस्वीर पेश करती हैं, जहाँ किसानों की पीड़ा, सामाजिक अन्याय, स्त्री-चेतना और परिवर्तन की आकांक्षा जीवंत हो उठती है।
उनके उपन्यासों की संख्या 19 से अधिक है, जिनमें ‘पंगु’ सबसे चर्चित है, जिसके लिए उन्हें 2021 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। ‘पंगु’ में कृषि जीवन की पीढ़ीगत संघर्ष, जमीन की छीना-झपटी और नव-खेती के संकल्प को मार्मिक ढंग से उकेरा गया है। अन्य प्रमुख उपन्यासों में ‘मौलाइल गाछक फूल’, ‘उत्थान-पतन’, ‘जिनगीक जीत’, ‘जीवन-मरण’, ‘नै धारैए’, ‘बड़की बहिन’, ‘ठूठ गाछ’, ‘इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं’, ‘लहसन’, ‘आमक गाछी’, ‘शुचिता’, ‘मोड़पर’, ‘संकल्प’, ‘अंतिम क्षण’ और ‘कुण्ठा’ शामिल हैं। ये उपन्यास सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों, परिवारिक द्वंद्व और जीवन-संघर्ष को यथार्थवादी शैली में प्रस्तुत करते हैं, जहाँ पात्र जीवंत लगते हैं और संवाद ग्रामीण बोली की सहजता से भरे होते हैं।
कथा साहित्य में उनकी उपलब्धि और भी विस्मयकारी है। 750 से अधिक कहानियाँ उन्होंने लिखी हैं, जो ग्रामीण जीवन के हर पहलू को छूती हैं—खेती-बाड़ी की चुनौतियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, स्त्री-पुरुष संबंध, जातिगत भेदभाव और आर्थिक शोषण। संग्रह जैसे ‘गामक जिनगी’ (जिसके लिए 2011 में टैगोर लिटरेचर अवार्ड मिला), ‘तरेगन’, ‘बजन्ता-बुझंता’, ‘शंभूदास’, ‘उलबा चाउर’, ‘अर्द्धांगिनी’, ‘सतभैंया पोखैर’, ‘गामक शकल-सूरत’, ‘लजबिजी’, ‘समरथाइक भूत’, ‘अप्पन-बीरान’ और कई अन्य में ग्रामीण संस्कृति की सोंधी गंध और जीवन की कठोर वास्तविकता बसी है। उनकी कहानियाँ संक्षिप्त होते हुए भी गहन प्रभाव छोड़ती हैं, क्योंकि वे अनुभव-आधारित हैं और पाठक को सीधे ग्रामीण मिथिला की धरती पर ले जाती हैं।
काव्य क्षेत्र में 500 से अधिक गीत-काव्य और कविताएँ उनकी देन हैं। संग्रह जैसे ‘इन्द्रधनुषी अकाश’, ‘राति-दिन’, ‘तीन जेठ एगारहम माझ’, ‘सरिता’, ‘गीतांजलि’, ‘सुखाएल पोखरिक जाइठ’, ‘सतबेध’, ‘चुनौती’, ‘रहसा चौरी’, ‘कामधेनु’, ‘मन मथन’ और ‘अकास गंगा’ में भावनाओं की गहराई, सामाजिक जागरण और जीवन-दर्शन का सुंदर संगम है। उनकी कविताएँ लयबद्ध हैं, लोक-भाषा से ओतप्रोत और विचारों से परिपक्व।
नाटक और एकांकी में दर्जन भर रचनाएँ हैं, जैसे ‘मिथिलाक बेटी’, ‘कम्प्रोमाइज’, ‘झमेलिया बिआह’, ‘रत्नाकर डकैत’, ‘स्वयंवर’, ‘पंचवटी’, ‘कल्याणी’, ‘सतमाए’, ‘समझौता’, ‘तामक तमघैल’ और ‘बीरांगना’। इनमें स्त्री-चेतना, सामाजिक द्वंद्व और लोक-संस्कृति का जीवंत चित्रण है। बाल साहित्य में ‘तरेगन’ और ‘नै धारैए’ जैसी रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।
इसके अलावा, ‘सगर राति दीप जरय’ साहित्यिक मंच के माध्यम से उन्होंने सैकड़ों नए लेखकों को प्रोत्साहित किया, कथा-गोष्ठियाँ आयोजित कीं और मैथिली साहित्य को लोकप्रिय बनाया। उनकी रचनाएँ मात्र सृजन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम हैं, जो मिथिला की मिट्टी से निकलीं और मैथिली को नई ऊँचाई प्रदान करती हैं। उनका योगदान मैथिली साहित्य के यथार्थवादी युग का आधार स्तंभ है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
शिल्प औऱ वस्तु
जगदीश प्रसाद मण्डल का रचना-शिल्प मैथिली साहित्य के इतिहास में एक ऐसी मौलिक क्रांति है, जिसने कला के पारंपरिक प्रतिमानों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। उनके शिल्प की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह किसी भी प्रकार के कृत्रिम सौंदर्य या शास्त्रीय आडंबर का मोहताज नहीं है, बल्कि वह उस सहजता और खुरदरेपन से उपजा है जो केवल वास्तविक जीवन के अनुभवों में ही संभव है। जब हम मण्डल जी की रचना प्रक्रिया का विश्लेषण करते हैं, तो पाते हैं कि उनका यथार्थवाद कोरी कल्पना या केवल सहानुभूति की उपज नहीं है, बल्कि वह एक भोगा हुआ यथार्थ है जो उनके अपने पसीने और संघर्षों से सिंचित है। उनकी कहानियों और उपन्यासों का विस्तार किसी काल्पनिक लोक में न होकर उन खलिहानों, चौपालों, कचहरियों और जेल की कोठरियों में होता है, जहाँ जीवन अपनी नग्नता और क्रूरता के साथ मौजूद है। मार्क्सवादी चेतना उनके शिल्प की अंतर्धारा की तरह बहती है, जो शोषक और शोषित के बीच के सूक्ष्म द्वंद्व को बड़ी बारीकी से रेखांकित करती है। वे केवल गरीबी का चित्रण नहीं करते, बल्कि उन कारणों की शिनाख्त करते हैं जो एक मनुष्य को पंगु बनाने पर तुले हुए हैं। उनका यथार्थवाद इतना प्रखर है कि वह पाठक को सुकून देने के बजाय उसे बेचैन करता है और समाज की उन विसंगतियों की ओर उंगली उठाता है जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
मण्डल जी के रचना-शिल्प का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उनकी भाषाई सरलता और लोक-भाषा का अद्भुत प्रयोग है। उन्होंने मैथिली साहित्य को उस ‘पंडिताऊ’ और दार्शनिक शब्दावली के बोझ से मुक्त कराया, जो एक लंबे समय तक इसे आम जनता की पहुँच से दूर रखे हुए थी। उनकी भाषा वह नहीं है जो महलों या शास्त्रीय गोष्ठियों में बोली जाती है, बल्कि वह भाषा है जो मिथिला के खेतों में काम करते हुए किसान, हाट-बाजार में सौदा करते मजदूर और चूल्हे-चौके में व्यस्त स्त्रियाँ बोलती हैं। उनके गद्य में ‘फकड़ा’ यानी लोक-मुहावरों का ऐसा सटीक और नैसर्गिक प्रयोग मिलता है, जो वर्णन में एक विशेष प्रकार की जान फूँक देता है। ये मुहावरे केवल सजावट के लिए नहीं आते, बल्कि वे मिथिला की लोक-संस्कृति, उसकी बुद्धिमत्ता और उसके व्यंग्य की धार को प्रस्तुत करते हैं। संवादों का सृजन करते समय मण्डल जी अत्यंत सचेत रहते हैं; उनके पात्र अपनी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के अनुरूप ही भाषा का चयन करते हैं। जब कोई जमींदार बोलता है, तो उसकी भाषा में सत्ता का अहंकार झलकता है, और जब कोई पीड़ित किसान अपनी व्यथा कहता है, तो उसकी वाणी में मिट्टी की सोंधी गंध और संघर्ष की थरथराहट होती है। यही भाषाई सरलता पाठक और लेखक के बीच के फासले को समाप्त कर देती है और पाठक को ऐसा महसूस होता है जैसे वह कोई किताब नहीं पढ़ रहा, बल्कि अपने ही गाँव के किसी बुजुर्ग के पास बैठकर उसकी आपबीती सुन रहा है।
पात्रों के चित्रण में जगदीश प्रसाद मण्डल की विशेषज्ञता बेजोड़ है। उनके द्वारा गढ़े गए पात्र कागजों पर खिंची लकीरें मात्र नहीं हैं, बल्कि वे हाड़-मांस के जीते-जागते मनुष्य हैं जो अपनी नियति, समाज और व्यवस्था से लगातार लोहा ले रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, उनके बहुचर्चित उपन्यास ‘पंगु’ का नायक देवचरण कोई अलौकिक नायक नहीं है, बल्कि वह उस हर किसान का प्रतिनिधि है जो बदलते समय की चुनौतियों और कृषि संकट के बीच अपनी अस्मिता बचाने के लिए छटपटा रहा है। मण्डल जी अपने पात्रों के अंतर्मन की गहराइयों को उकेरने के लिए मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का सहारा लेते हैं, जिससे उनके पात्र अत्यंत विश्वसनीय बन जाते हैं। वे पात्रों की कमजोरियों, उनकी छोटी-छोटी खुशियों और उनके गहरे दुखों को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत करते हैं। उनके पात्र अक्सर ऐसे लोग होते हैं जिन्हें समाज में ‘अदृश्य’ मान लिया गया है, लेकिन मण्डल जी की लेखनी उन्हें केंद्र में लाकर खड़ा कर देती है। इन पात्रों का संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं होता, बल्कि वह एक व्यापक सामाजिक बदलाव की छटपटाहट को प्रदर्शित करता है।
वे अपनी नियति के सामने घुटने नहीं टेकते, बल्कि पंगु बना दी गई व्यवस्था के बीच भी अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखने का प्रयास करते हैं।
मण्डल जी का शिल्प परिवेश के सजीव चित्रण पर भी विशेष बल देता है। वे जब किसी गाँव के दृश्य का वर्णन करते हैं, तो पाठक को धूल भरी पगडंडियाँ, जलकुंभी से भरे पोखर और फूस के छप्परों से निकलता धुआँ साफ दिखाई देने लगता है। यह दृश्य-बिंब की शक्ति उनके गहन निरीक्षण और अपनी मिट्टी के प्रति अगाध प्रेम का परिणाम है। उनके उपन्यासों का ढांचा अक्सर एक व्यापक फलक पर फैला होता है, जहाँ कई पीढ़ियों की कहानियाँ एक-दूसरे में गुंथी होती हैं। यह शिल्पगत विस्तार उन्हें समाज की बदलती हुई आर्थिक और सामाजिक संरचना को समग्रता में दिखाने का अवसर प्रदान करता है। उनकी रचनाओं में समय का संदर्भ बहुत महत्वपूर्ण है; वे बीतते हुए समय और बदलती हुई राजनीति के प्रभावों को पात्रों के माध्यम से बहुत ही कलात्मक ढंग से व्यक्त करते हैं। वे उपदेशक की मुद्रा में आने के बजाय कथा को स्वतः स्फूर्त ढंग से बढ़ने देते हैं, जिससे पाठक स्वयं ही उन निष्कर्षों तक पहुँच जाता है जहाँ लेखक उसे ले जाना चाहता है।
उनके शिल्प की एक और विशेषता यह है कि वे ‘लोक’ के तत्वों को आधुनिक ‘क्रांतिकारी’ विचारों के साथ मिला देते हैं। जहाँ एक ओर वे पारंपरिक लोक-गीतों और संस्कारों का संदर्भ देते हैं, वहीं दूसरी ओर वे सामंतवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ पर तीखा प्रहार भी करते हैं। यह संगम उनके साहित्य को एक अनोखी शक्ति देता है, जो न केवल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है बल्कि राजनीतिक रूप से भी अत्यंत सचेत है। उनकी रचनाओं में जो व्यंग्य है, वह बहुत ही गहरा और मारक है, लेकिन उसमें कड़वाहट के बजाय सुधार की एक अंतर्निहित इच्छा दिखाई देती है। मण्डल जी का शिल्प असल में उस किसान की तरह है जो पहले भूमि को तैयार करता है, फिर बीज बोता है और फिर फसल की रखवाली करता है। उनकी हर रचना एक सुविचारित वैचारिक फसल की तरह है, जिसे उन्होंने अपने अनुभवों की खाद और भाषा के पानी से सींचा है। संक्षेप में कहा जाए तो, जगदीश प्रसाद मण्डल का रचना-शिल्प मैथिली साहित्य को उसकी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान है, जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा सौंदर्य है और यथार्थ ही सबसे बड़ा सत्य है। उनकी यह शैली आने वाली पीढ़ियों के लेखकों के लिए एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करती है, जहाँ साहित्य केवल मनोरंजन का साधन न रहकर सामाजिक चेतना और परिवर्तन का एक सशक्त हथियार बन जाता है।
उनके कुछ प्रमुख पुस्तक का समीक्षात्मक अध्ययन
जगदीश प्रसाद मण्डल की कृतियों का अनुशीलन करते समय सबसे पहले उनकी कालजयी रचना ‘पंगु’ हमारे सामने एक महाकाव्यात्मक विस्तार के साथ उपस्थित होती है। यह उपन्यास मैथिली गद्य के इतिहास में एक वैचारिक प्रस्थान बिंदु है, जिसे यदि हम आधुनिक युग का ‘मैला आँचल’ कहें, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मण्डल जी ने इस कृति में जिस सूक्ष्मता से मिथिला के ग्रामीण समाज की नसों को टटोला है, वह शोध का विषय है। उपन्यास की कथावस्तु केवल एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित न रहकर संपूर्ण किसानी समाज के उत्थान और पतन की गाथा बन जाती है। यहाँ भूदान आंदोलन की उन विसंगतियों को नग्न रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ कागजों पर तो जमीन का बँटवारा हुआ, किंतु वास्तविक अधिकार आज भी हाशिए के लोगों से कोसों दूर हैं। लेखक ने अत्यंत साहस के साथ यह दिखाया है कि कैसे आदर्शवादी आंदोलनों को सत्ता और सामंतवाद के गठजोड़ ने निगल लिया। देवचरण और हरिचरण जैसे पात्रों के माध्यम से लेखक ने कृषि के मशीनीकरण और आधुनिक खेती के उन छलावापूर्ण वादों का विश्लेषण किया है, जो छोटे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय कर्ज के दुष्चक्र में धकेल देते हैं। यह उपन्यास एक गंभीर समाजशास्त्रीय दस्तावेज है, जो बताता है कि कैसे नई आर्थिक नीतियों ने गाँव की पारम्परिक आत्मनिर्भरता को ‘पंगु’ बना दिया है। इसमें भूमि सुधारों की विफलता, सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और कॉरपोरेट खेती के बढ़ते खतरों के बीच एक सीमांत किसान के अस्तित्व की जद्दोजहद को जिस निष्पक्षता से उकेरा गया है, उसी कारण इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार जैसा सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ। लेखक की दृष्टि यहाँ एक भविष्यवक्ता की तरह है, जो चेतावनी देती है कि यदि मिट्टी और मनुष्य का रिश्ता इसी तरह बाजार के हवाले रहा, तो पूरी सभ्यता ही पंगु हो जाएगी।
उनकी अगली महत्वपूर्ण कृति ‘गामक जिनगी’ है, जो मैथिली कथा-साहित्य में यथार्थवाद की एक नई परिभाषा गढ़ती है। चौदह कहानियों का यह संग्रह केवल ग्रामीण चित्रण नहीं, बल्कि वैश्वीकरण के दौर में सिसकते गाँवों का एक एक्सरे है। इन कहानियों में मण्डल जी ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि किस प्रकार सूचना क्रांति और बाजारवाद ने गामक जिनगी (गाँव के जीवन) के बुनियादी ढाँचे को हिलाकर रख दिया है। टैगोर लिटरेचर अवार्ड से सम्मानित यह संग्रह इस बात का प्रमाण है कि लेखक की पकड़ सूक्ष्म संवेदनाओं पर कितनी गहरी है। यहाँ कहानियाँ केवल घटनाओं का विवरण नहीं हैं, बल्कि वे उस जीवटता की तलाश हैं जो तमाम अभावों और शहरीकरण के दबाव के बावजूद गाँव के भीतर कहीं जीवित है। ‘समय से पहले चेत किसान’ जैसी कहानियाँ कृषि-चेतना का एक घोषणापत्र प्रतीत होती हैं, जो किसान को केवल हल चलाने वाला नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के प्रति सजग एक नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं। मण्डल जी ने इन कहानियों में ‘फकड़ा’ और लोक-संवादों का ऐसा ताना-बना बुना है कि पाठक को महसूस होता है जैसे वह गाँव की किसी बरगद की छाँव में बैठकर उन पात्रों के साथ सुख-दुख साझा कर रहा है। यह संग्रह इस मिथक को तोड़ता है कि ग्रामीण जीवन केवल पिछड़ापन है; बल्कि यह दिखाता है कि गाँव के पास वह जिजीविषा है जो महानगरों के यांत्रिक जीवन में लुप्त हो चुकी है।
मण्डल जी के नाट्य साहित्य और स्त्री-चेतना की बात करें, तो ‘मिथिलाक बेटी’ और ‘वीरांगना’ जैसे नाटक मैथिली रंगमंच को एक नई दिशा प्रदान करते हैं। इन नाटकों के माध्यम से लेखक ने मिथिला के उस रूढ़िवादी ढाँचे पर कड़ा प्रहार किया है, जिसने सदियों से स्त्रियों को केवल त्याग और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति बनाकर चारदीवारी में कैद रखा था। मण्डल जी की स्त्रियाँ ‘कोहबर’ की दीवारों से बाहर निकलकर सामाजिक न्याय और स्वावलंबन की बात करती हैं। इन नाटकों में शिक्षा को केवल साक्षरता के रूप में नहीं, बल्कि चेतना के हथियार के रूप में चित्रित किया गया है।
‘कल्याणी’ और ‘बीरांगना’ जैसी कृतियों में वे पितृसत्तात्मक समाज की उन मान्यताओं को चुनौती देते हैं जो स्त्री की अस्मिता को पुरुष की अधीनता में परिभाषित करती हैं। यहाँ स्त्री पात्र केवल विलाप नहीं करते, बल्कि वे अपनी संपत्ति के अधिकार, अपनी शिक्षा और अपने स्वतंत्र अस्तित्व के लिए तर्क करती हैं और लड़ती हैं। मण्डल जी ने नाटकों के माध्यम से यह संदेश दिया है कि समाज का समग्र विकास तभी संभव है जब आधी आबादी आर्थिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र हो। उनके नाटकों में लोक-संस्कृति के तत्वों का उपयोग मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश को गहरे तक पहुँचाने के लिए किया गया है।
उनकी अन्य रचनाएँ जैसे ‘उत्थान-पतन’, ‘जिनगीक जीत’ और ‘नै धारैए’ भी अपने वैचारिक तेवर के लिए उल्लेखनीय हैं। ‘नै धारैए’ विशेष रूप से बाल मन और किशोर चेतना को केंद्र में रखकर लिखा गया उपन्यास है, जिसे विदेह बाल साहित्य पुरस्कार मिला। इसमें उन्होंने बच्चों की आँखों से दुनिया को देखने की कोशिश की है और यह बताने का प्रयास किया है कि सामाजिक बुराइयों का सबसे गहरा असर कोमल मनों पर पड़ता है। मण्डल जी की कविताओं और गीतों का संग्रह, जैसे ‘इन्द्रधनुषी अकाश’ और ‘अकास गंगा’, उनके काव्य-शिल्प की परिपक्वता को दर्शाता है।
उनके गीतों में वह लयात्मकता है जो सीधे माटी से जुड़ती है। वे केवल प्रकृति का वर्णन नहीं करते, बल्कि प्रकृति के साथ मनुष्य के बदलते संबंधों और पर्यावरण के संकट को भी स्वर देते हैं। उनके शोधपरक लेख और निबंध संग्रह ‘पयस्विनी’ साहित्य और समाज के अंतर्संबंधों की गहरी पड़ताल करते हैं। वे साहित्य को केवल कला की कसौटी पर नहीं, बल्कि लोक-कल्याण की कसौटी पर कसते हैं। जगदीश प्रसाद मण्डल की पूरी रचना-यात्रा का यदि विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि वे एक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने ‘लोक’ को ‘शास्त्र’ के बराबर खड़ा कर दिया है। उनकी हर कृति एक शोध प्रबंध की तरह है जो आने वाली पीढ़ियों को मिथिला के यथार्थ, उसकी समस्याओं और उसकी अदम्य इच्छाशक्ति से परिचित कराती रहेगी। उनकी लेखनी ने मैथिली को केवल भाषा नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में स्थापित किया है।
सम्मान औऱ उपलब्धि
जगदीश प्रसाद मण्डल की साहित्यिक यात्रा केवल शब्दों का संचयन नहीं, बल्कि एक कठिन साधना का प्रतिफल है, जिसे समय-समय पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर मिली विविध स्वीकृतियों और सम्मानों ने प्रमाणित किया है। किसी भी रचनाकार के लिए पुरस्कार केवल धातु का एक टुकड़ा या प्रशस्ति पत्र नहीं होते, बल्कि वे उस समाज की ओर से दी गई कृतज्ञता की अभिव्यक्ति होते हैं, जिसकी पीड़ा को लेखक ने अपनी स्याही से स्वर दिया है। मण्डल जी के संदर्भ में ये सम्मान और उपलब्धियाँ इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं क्योंकि उन्होंने अपना अधिकांश जीवन एक गुमनाम किसान और आंदोलनों के सिपाही के रूप में बिताया। उनकी साधना को मिली ‘वैश्विक पहचान’ असल में उस माटी के यथार्थ की पहचान है, जिसे उन्होंने मैथिली साहित्य के केंद्र में स्थापित किया।
उनकी उपलब्धियों के शिखर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (2021) का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। यह सम्मान उन्हें उनके कालजयी उपन्यास ‘पंगु’ के लिए प्रदान किया गया। साहित्य अकादमी का यह पुरस्कार मिलना केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह मैथिली के उस ‘यथार्थवादी युग’ पर मुहर थी, जिसके प्रणेता मण्डल जी माने जाते हैं। ‘पंगु’ के माध्यम से उन्होंने जिस तरह से कृषि संस्कृति के ह्रास और सीमांत किसानों के अस्तित्व पर मंडराते खतरों को वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाया, उसने चयन समिति को गहराई से प्रभावित किया। यह पुरस्कार इस बात का प्रतीक है कि यदि आंचलिकता और स्थानीय समस्याओं को ईमानदारी से बुना जाए, तो वे अपनी सीमाओं को लांघकर सार्वभौमिक सत्य बन जाती हैं। इस सम्मान ने मण्डल जी को समकालीन भारतीय साहित्य के शीर्ष रचनाकारों की श्रेणी में खड़ा कर दिया और मैथिली उपन्यास विधा को एक नई ऊंचाई प्रदान की।
इससे पूर्व, वर्ष 2011 में उन्हें प्राप्त टैगोर लिटरेचर अवार्ड उनके साहित्यिक जीवन का एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ। यह पुरस्कार उन्हें उनके कथा संग्रह ‘गामक जिनगी’ और मैथिली साहित्य में उनके समग्र अतुलनीय योगदान के लिए दिया गया था। रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर स्थापित यह सम्मान मिलना इस बात का संकेत था कि मण्डल जी की रचनाओं में वही मानवीय संवेदना और लोक-कल्याण की भावना है, जो टैगोर के साहित्य का मूल आधार रही है। ‘गामक जिनगी’ के माध्यम से उन्होंने गाँव की बदलती सामाजिक-आर्थिक परतों को जिस कुशलता से उकेरा, उसने भारतीय साहित्य के आलोचकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस पुरस्कार ने यह सिद्ध किया कि एक किसान की झोपड़ी से निकला हुआ अनुभव विश्व स्तरीय साहित्य की कसौटी पर खरा उतर सकता है।
मैथिली साहित्य के डिजिटल और आधुनिक उत्थान में ‘विदेह’ पत्रिका और मंच का बड़ा योगदान रहा है, और मण्डल जी को प्राप्त विदेह सम्मान (2011) उनके इसी आधुनिक जुड़ाव को दर्शाता है।
उन्होंने न केवल प्रौढ़ साहित्य में अपनी धाक जमाई, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए भी विपुल लेखन किया, जिसके कारण उन्हें विदेह बाल साहित्य पुरस्कार से भी नवाजा गया। यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण है कि वे एक ओर ‘पंगु’ जैसे गंभीर और जटिल उपन्यास लिख रहे थे, तो दूसरी ओर ‘तरेगन’ और ‘नै धारैए’ जैसी रचनाओं के माध्यम से बच्चों के कोमल मन में सामाजिक चेतना के बीज बो रहे थे। बाल साहित्य के प्रति उनका यह समर्पण भविष्य की पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और संस्कृति से जोड़ने की एक दूरगामी सोच का हिस्सा है।
मण्डल जी के व्यक्तित्व पर बाबा नागार्जुन ‘यात्री’ का गहरा प्रभाव रहा है, और इसीलिए उन्हें वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ सम्मान (2016) मिलना एक भावुक और सार्थक उपलब्धि रही। बाबा नागार्जुन की तरह ही मण्डल जी ने भी जन-सरोकारों और प्रगतिशील विचारधारा को अपना मार्गदर्शक बनाया। यह सम्मान उन्हें मिथिला और मैथिली के सर्वांगीण विकास में उनके सक्रिय योगदान के लिए दिया गया। इसके बाद, वर्ष 2020 में उन्हें यात्री चेतना पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनके निरंतर बहते सृजन-प्रवाह की स्वीकारोक्ति थी। ये पुरस्कार इस बात की तस्दीक करते हैं कि मण्डल जी ने यात्री जी की उस परंपरा को जीवित रखा है, जहाँ साहित्य केवल ड्राइंग रूम की शोभा नहीं, बल्कि जन-आंदोलनों की मशाल बनता है।
इन प्रमुख पुरस्कारों के अतिरिक्त, उन्हें वैदेही सम्मान (2012), कौशिकी साहित्य सम्मान (2015), कौमुदी सम्मान (2017) और स्व. बाबू साहेब चौधरी सम्मान (2018) जैसे अनेक क्षेत्रीय और संस्थागत सम्मानों से विभूषित किया गया। ये सम्मान केवल उनके लेखन के लिए ही नहीं, बल्कि ‘सगर राति दीप जरय’ जैसे मंचों के माध्यम से सैकड़ों नए लेखकों को तैयार करने और मैथिली को ‘पंडिताऊ’ चंगुल से निकालकर जनसामान्य की भाषा बनाने के उनके भगीरथ प्रयास के लिए भी दिए गए। मण्डल जी की उपलब्धियों का विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि उन्होंने कभी पुरस्कारों के लिए नहीं लिखा, बल्कि उनके ईमानदार लेखन ने पुरस्कारों को अपनी ओर आकर्षित किया।
वे स्वयं इन सम्मानों को अपनी मेहनत का नहीं, बल्कि उस किसान समाज का सम्मान मानते हैं जिसकी आवाज़ बनकर वे आज विश्व पटल पर खड़े हैं। उनकी ये उपलब्धियाँ आज के युवा मैथिली लेखकों के लिए एक प्रकाश स्तंभ की तरह हैं, जो यह सिखाती हैं कि यदि आपकी जड़ों में सच्चाई है, तो आपकी शाखाएं पूरे आसमान को छूने की क्षमता रखती हैं। मण्डल जी की वैश्विक पहचान दरअसल उस ‘श्रम’ और ‘संस्कृति’ की जीत है, जिसे उन्होंने अपने रक्त और पसीने से सींचा है।
साहित्य का जनतंत्रीकरण
जगदीश प्रसाद मण्डल का मैथिली साहित्य में पदार्पण केवल एक लेखक का आगमन नहीं था, बल्कि यह एक पूरे युग का वैचारिक प्रस्थान था, जिसने साहित्य के ‘जनतंत्रीकरण’ की नींव रखी। साहित्य का जनतंत्रीकरण केवल शब्दों को सरल बना देना नहीं है, बल्कि यह उस सत्ता संरचना को चुनौती देना है जो सदियों से यह तय करती आई थी कि साहित्य क्या होगा, किसके लिए होगा और किसके द्वारा लिखा जाएगा। मण्डल जी ने अपनी प्रसिद्ध उद्घोषणा—”जहिना समाज सबहक, तहिना साहित्यो सबहक” (जैसा समाज सबका है, वैसा ही साहित्य भी सबका है)—के माध्यम से मैथिली साहित्य की उस जड़ता को तोड़ दिया, जो इसे एक विशिष्ट वर्ग, जाति या पाण्डित्य के घेरे में कैद किए हुए थी। उन्होंने साहित्य को ड्राइंग रूम की मखमली सोफों और बौद्धिक विलासिता की चर्चाओं से बाहर निकालकर सीधे खेत की मेढ़, खलिहानों की धूल और मजदूरों की बस्तियों तक पहुँचा दिया। उनका यह योगदान मैथिली के इतिहास में वैसा ही है जैसा हिंदी में प्रेमचंद या नागार्जुन का रहा है, जिन्होंने अभिजात्यवाद के दुर्ग को ढहाकर ‘आम आदमी’ को साहित्य का नायक बनाया।
साहित्य के इस जनतंत्रीकरण का सबसे पहला और प्रभावी पक्ष ‘विषय-वस्तु का विस्तार’ है। मण्डल जी से पूर्व मैथिली साहित्य का एक बड़ा हिस्सा या तो विद्यापति की शृंगारिक परंपरा का अनुसरण कर रहा था या फिर वह केवल मध्यवर्गीय समस्याओं और सांस्कृतिक गौरवगान तक सीमित था। मण्डल जी ने साहस के साथ उन पात्रों को मुख्यधारा में खड़ा किया, जिन्हें समाज ने ‘अदृश्य’ कर दिया था। उन्होंने पासवान, केवट, राम, धानुक और महतो जैसे समुदायों के जीवन-संघर्ष, उनकी लोक-बुद्धि और उनकी त्रासदियों को उपन्यास और कहानियों का केंद्र बनाया। जब एक खेतिहर मजदूर या एक दलित स्त्री मण्डल जी की रचनाओं में अपनी पूरी गरिमा और तर्कशक्ति के साथ बोलती है, तब असल में साहित्य का जनतंत्रीकरण घटित होता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि श्रेष्ठ साहित्य वही है जो हाशिए पर खड़े व्यक्ति की आँखों में आत्मसम्मान की चमक पैदा कर सके और उसके दिल में अपनी स्थिति को बदलने की आग जला सके। उनका साहित्य केवल सहानुभूति का साहित्य नहीं है, बल्कि वह ‘सह-अनुभूति’ और ‘साझा संघर्ष’ का साहित्य है।
इस जनतंत्रीकरण का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम ‘भाषाई लोकतंत्रीकरण’ है। सदियों से मैथिली के मानक रूप और उसकी व्याकरणिक शुद्धता के नाम पर एक ऐसी दीवार खड़ी की गई थी, जिससे आम ग्रामीण खुद को साहित्य से कटा हुआ महसूस करता था। मण्डल जी ने इस भाषाई अभिजात्यवाद पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने गँवई बोलियों, ठेठ मुहावरों (फकड़ा) और लोक-संवादों को वह सम्मान दिलाया, जो अब तक केवल संस्कृतनिष्ठ शब्दावली को प्राप्त था। उनकी भाषा में वह खुरदरापन है जो हल चलाते किसान की हथेलियों में होता है। उन्होंने मैथिली को ‘पंडिताऊ’ चंगुल से मुक्त कराकर उसे लोक-भाषा के उस धरातल पर ला खड़ा किया, जहाँ एक अनपढ़ किसान भी अपनी बात को साहित्य की कसौटी पर परख सकता है। यह भाषाई बदलाव ही था जिसने मैथिली साहित्य को व्यापक जनमानस तक पहुँचाया और इसे सही मायने में ‘जनता की भाषा’ बनाया। जब पाठक अपनी ही बोली को पुस्तक के पन्नों पर धड़कते हुए देखता है, तब उसका साहित्य पर विश्वास और गहरा हो जाता है।
मण्डल जी का जनतंत्रीकरण केवल उनके लेखन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने ‘संस्थान’ के स्तर पर भी इसे लागू किया। “सगर राति दीप जरय” जैसे साहित्यिक आंदोलनों और मंचों के माध्यम से उन्होंने उस ‘गेटकीपिंग’ को खत्म किया, जो नए और पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाले लेखकों को साहित्य के क्षेत्र में आने से रोकती थी। उन्होंने रहुआ-संग्राम और बेरमा जैसे सुदूर गाँवों में कथा गोष्ठियाँ आयोजित कीं, जिससे यह संदेश गया कि साहित्य सृजन के लिए किसी महानगर या बड़े प्रकाशन संस्थान की कृपा की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने स्वयं सैकड़ों नवोदित लेखकों की पुस्तकों का लोकार्पण किया और उन्हें प्रोत्साहित किया। यह एक प्रकार का ‘साहित्यिक समाजवाद’ था, जहाँ उन्होंने संसाधनों और मंचों का बँटवारा उन लोगों के साथ किया, जिनके पास प्रतिभा तो थी लेकिन अवसर नहीं थे। उन्होंने नए लेखकों को सिखाया कि अपनी मिट्टी की गंध को शब्दों में ढालना ही सबसे बड़ी कला है।
उनके इस योगदान का एक और महत्वपूर्ण पहलू ‘स्त्री और सर्वहारा की आवाज़’ को संवैधानिक स्थान देना है। मण्डल जी ने अपनी रचनाओं में जिस तरह की स्त्री-चेतना को स्वर दिया, वह किसी थोपे हुए नारीवाद का हिस्सा नहीं है।
उनके नाटकों और उपन्यासों की स्त्रियाँ आर्थिक रूप से सक्रिय हैं और अपने अधिकारों के लिए पंचायत से लेकर कचहरी तक लड़ने का माद्दा रखती हैं। यह जनतंत्रीकरण का ही हिस्सा है कि समाज का वह वर्ग जो उत्पादन की प्रक्रिया में सबसे आगे है (किसान और मजदूर), वह साहित्य की प्रक्रिया में भी सबसे आगे होना चाहिए। मण्डल जी ने साहित्य को ‘सुधारवाद’ के चश्मे से नहीं, बल्कि ‘अधिकारवाद’ के चश्मे से देखा।
उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती हैं कि साहित्य केवल अतीत की जुगाली या भविष्य की कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि वह वर्तमान के अन्यायों के विरुद्ध एक निरंतर जारी रहने वाला हस्तक्षेप है।
जगदीश प्रसाद मण्डल का ‘जनतंत्रीकरण’ का यह मॉडल मैथिली साहित्य को एक नई संजीवनी प्रदान करता है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि साहित्य की खिड़कियाँ हर तरफ से खुली रहें ताकि उसमें हर वर्ग की हवा आ सके। उनके लिए ‘लोक’ और ‘शास्त्र’ के बीच कोई दीवार नहीं थी। उन्होंने ‘हल’ चलाने वाले हाथ को ‘कलम’ थमाई और कलम चलाने वाले को हल की अहमियत समझाई। “जहिना समाज सबहक, तहिना साहित्यो सबहक” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक दार्शनिक अधिष्ठान है, जिसने मैथिली साहित्य को अधिक मानवीय, अधिक समावेशी और अधिक साहसी बनाया है। मण्डल जी की यह विरासत आने वाले समय में भी उन तमाम रचनाकारों के लिए प्रकाश-स्तंभ बनी रहेगी, जो साहित्य को समाज के अंतिम व्यक्ति की मुक्ति का साधन बनाना चाहते हैं। उन्होंने साहित्य को महलों की चारदीवारी से निकालकर खेतों की व्यापकता प्रदान की है, और यही उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि है।