हिंदी साहित्य और जन आंदोलनों की प्रखर आवाज रमणिका गुप्ता का 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया, दिल्ली के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली.इसके साथ हीं साहित्य और समाज सेवा के एक युग का अंत हो गया. पटियाला के संभ्रांत परिवार में जन्मी रमणिका जी ने धनबाद की कोयला खदानों को अपनी कर्मभूमि बनाया और ता उम्र शोषितों, आदिवासियों एवं मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ी. ‘युद्धरत आम आदमी’ जैसी पत्रिका की संपादक और ‘आपहुदरी’ जैसी बेबाक आत्मकथा की लेखिका के रूप में उन्होंने हाशिए के समाज को मुख्यधारा में खड़ा किया. पानी की रानी’ के नाम से विख्यात इस जुझारू व्यक्तित्व ने राजनीति और कलम, दोनों के माध्यम से सामाजिक विषमता पर कड़ा प्रहार किया.उनका जाना भारतीय चेतना के लिए अपूरणीय क्षति है.

(विनोद आनंद )
भा रतीय वाङ्मय और सामाजिक आंदोलनों के आकाश में रमणिका गुप्ता एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र की तरह रहीं, जिन्होंने अपनी वैचारिक आभा से न केवल साहित्य की गलियों को आलोकित किया, बल्कि झारखंड की कोयला खदानों के अंधेरों में दबे मजदूरों की आवाज को भी एक मुकम्मल पहचान दी। 22 अप्रैल 1930 को पंजाब की पटियाला रियासत के एक संभ्रांत बेदी कुल में जन्मी रमणिका जी का व्यक्तित्व बचपन से ही उन तमाम बेड़ियों को तोड़ने के लिए व्याकुल था, जो किसी भी रूप में अन्याय या शोषण का पर्याय थीं। उनके भीतर का विद्रोही स्वर तब और प्रखर हुआ जब देश स्वतंत्रता के मुहाने पर खड़ा था और युवा रमणिका आई.एन.ए. के समर्थन में कॉलेज में हड़ताल करा रही थीं। यह उनके जीवन की वह पहली बड़ी आहट थी, जिसने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे महलों की सुख-सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि सड़कों के संघर्ष के लिए बनी हैं। उनकी वैचारिक दृढ़ता का प्रमाण तभी मिल गया था जब उन्होंने 14 वर्ष की अल्पायु में खादी धारण कर ली और विभाजन की त्रासदी के दौरान दंगाइयों के बीच निडर होकर उन लड़कियों की खोज की, जिन्हें व्यवस्था के रक्षकों ने ही छिपा रखा था। उनके इसी बागी तेवर ने उन्हें पटियाला से दूर अंबाला भेजा, जहाँ उन्होंने जाति और कुल की सीमाओं को लांघते हुए वेद प्रकाश गुप्ता से अंतरजातीय विवाह कर अपने क्रांतिकारी जीवन की औपचारिक शुरुआत की।
रमणिका गुप्ता के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 1960 में तब शुरू हुआ, जब वे अपने पति के साथ धनबाद पहुँचीं। यह वह दौर था जब कोयलांचल में माफियाराज और सामंती शोषण अपने चरम पर था। धनबाद की काली मिट्टी और वहाँ के मजदूरों के पसीने ने रमणिका जी के भीतर छिपे सामाजिक कार्यकर्ता को पूरी तरह सक्रिय कर दिया। उन्होंने महसूस किया कि लेखन केवल पन्नों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे खदानों की गहराई तक उतरना होगा। उन्होंने धनबाद को केवल अपना निवास स्थान नहीं, बल्कि अपनी कर्मभूमि बना लिया। यहाँ उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के माध्यम से राजनीति में कदम रखा और जल्द ही मजदूरों, आदिवासियों और विस्थापितों की सबसे मुखर आवाज बन गईं। 1965 में जब उनके पति का तबादला कानपुर हुआ, तब रमणिका जी ने एक अत्यंत साहसी निर्णय लिया। उन्होंने अपने परिवार के साथ जाने के बजाय धनबाद में रुककर अपने कार्यक्षेत्र को विस्तार देने का फैसला किया। यह एक स्त्री के लिए उस दौर में न केवल चुनौतीपूर्ण था, बल्कि पितृसत्तात्मक समाज के मुंह पर एक करारा तमाचा भी था। उन्होंने यहाँ महिलाओं के लिए बालवाड़ी और प्रशिक्षण केंद्र खोले, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकें।
कोयलांचल के जनमानस में वे ‘पानी की रानी’ के रूप में विख्यात हुईं, क्योंकि उन्होंने मांडू और गोमिया जैसे क्षेत्रों में पानी के अधिकार के लिए ऐतिहासिक लड़ाइयां लड़ीं। उनका संघर्ष केवल जल तक सीमित नहीं था; उन्होंने ‘जल-जंगल-जमीन’ के उस नारे को असल धरातल पर उतारा, जो आज भी झारखंड के अस्मिता की पहचान है।
हजारीबाग के जंगलों में आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए उन्होंने ‘घूस नहीं अब घूसा देंगे’ का नारा बुलंद किया, जिसने सत्ता और माफिया के गठजोड़ को हिलाकर रख दिया। टाटा और राजा जैसे शक्तिशाली समूहों के विरुद्ध मोर्चा खोलते हुए उन्होंने मजदूरों के बच्चों के लिए स्कूलों का निर्माण कराया और ठेकेदारी प्रथा के विरुद्ध जानलेवा हमलों की परवाह किए बिना डटी रहीं। उनके शरीर पर लगे लाठियों के 21 घाव और टूटी हुई कालरबोन उनके संघर्ष के जीवित प्रमाण थे। वे मानती थीं कि जब तक मजदूर अपना नाम, काम और वेतन लिखकर मांगना नहीं सीखेगा, तब तक उसका शोषण बंद नहीं होगा।
केदला खदानों के राष्ट्रीयकरण के लिए सवा साल तक चली हड़ताल उनके नेतृत्व की पराकाष्ठा थी, जिसके परिणामस्वरूप हजारों मजदूरों को सरकारी नौकरी और अधिकार मिले।
राजनीतिक रूप से वे बिहार विधान परिषद की सदस्य और बाद में लोकदल से विधायक भी रहीं, लेकिन उनकी आत्मा सदैव कम्युनिस्ट विचारधारा और वामपंथी आंदोलनों में ही रमी रही। उन्होंने महसूस किया कि संसदीय राजनीति से बड़ा संघर्ष विस्थापितों के न्याय का है। 1980 के दशक में उन्होंने विस्थापितों के हक में सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी और ‘चूल्हा प्रति एक नौकरी’ की मांग मनवाई, जिससे कोल इंडिया की नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन आया। उनके लिए राजनीति सत्ता पाने का माध्यम नहीं, बल्कि शोषितों को गरिमा दिलाने का औजार थी।
इसी सक्रियता के बीच उनका साहित्यिक सृजन भी निरंतर चलता रहा। उनकी संपादित पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में हाशिए के समाज की सबसे सशक्त आवाज बनी। उन्होंने दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श को केवल किताबी बहसों से निकालकर उसे आंदोलनों के साथ जोड़ा। उनकी आत्मकथा ‘हादसे’ और ‘आपहुदरी’ केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि एक युग का दस्तावेज हैं, जो एक स्त्री के बेबाक सच और उसके संघर्षों की गाथा कहती हैं।
रमणिका जी का धनबाद से नाता केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आत्मिक था। उन्होंने इस मिट्टी के दुख-दर्द को अपनी कविताओं में पिरोया और अपनी लेखनी को तलवार बनाया। वे अक्सर कहती थीं कि वे भी तुम्हारे संग चलेंगी, और वास्तव में वे समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तब तक चलीं जब तक उनकी सांसों ने साथ दिया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उन्होंने भारतीय मजदूरों और दलितों का प्रतिनिधित्व किया, चाहे वह बर्लिन हो, मैक्सिको हो या क्यूबा। वे उम्र के आठवें दशक में भी वैसी ही ओजस्वी और निर्भीक थीं, जैसी पटियाला के कॉलेज में थीं। उन्होंने ‘बहु जुठाई’ जैसी कुरीतियों और जातीय भेदभाव के खिलाफ जो आग जलाई, वह आज भी झारखंड के चेतना में जीवित है। 26 मार्च 2019 को नई दिल्ली के एक अस्पताल में जब इस जुझारू व्यक्तित्व ने अंतिम सांस ली, तो केवल एक साहित्यकार का अंत नहीं हुआ, बल्कि एक पूरे युग की विद्रोही आवाज खामोश हो गई। उनकी मृत्यु के बाद धनबाद और पूरा झारखंड आज भी उन्हें अपनी उन गलियों और खदानों में ढूंढता है, जहाँ उन्होंने अन्याय के विरुद्ध ‘घूसा’ तानना सिखाया था। रमणिका गुप्ता आज हमारे बीच सशरीर नहीं हैं, लेकिन उनका सार्थक जीवन और उनके द्वारा रचित साहित्य आने वाली पीढ़ियों को हमेशा यह याद दिलाता रहेगा कि एक मनुष्य यदि ठान ले, तो वह व्यवस्था की दीवारों को ढहाकर समता का नया सूरज उगा सकता है।