
सर्दियों का ठहाका
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हाय सर्दी की यह ठंड या प्रकृति का है सभी को दंड?
हंसी-खुशी प्यार से सब इसे कहते “गुलाबी ठंड”
थोड़ी रहम का बने यदि मापदंड
कैसे तन को सुर्ख हवा से बचाऊँ,
मन का कैसे धैर्य बढ़ाऊँ?
ठंड वेपीर सुबह उठने ना देती,
रात में भी यह रौद्र रूप ले लेती
बूढ़े, वयस्क, जवान,
बस एक ही बात कहते –
“यह ठंड बेरहम, बर्फ जैसा कहर बरसाती!”
छुप-छुप सूरज भी आंख मिचोंनी करता,
बदरी सँग गठजोड़ चलाता।
एक ही आस, सूर्य देव प्यारे,
आइये आंगन में पाँव पसारे…
2

कर्मठ नारी
कहते हैं नारी,
लाचारी है,
दुनिया के अल्फाजों को कानों में बोझ लिए,
सुनते आ रही बेचारी है,
पर धर्म, देश संस्कृति पर जब-जब आँच आई,
तब शौर्य बल से,
पुरुषों को विजय दिलाई,
रुकती नहीं, थकती नहीं,
टूटती नहीं संघर्षों से,
हौसले खुद बुलंद किये, रण में विजय पाई,
हाँ मैं नारी हूँ,
पर नहीं लाचारी हूँ,
ना ही बेचारी हूँ,
आ जाऊं अपने पर,
तो बन जाती,
लक्ष्मी दुर्गा काली है,
इतिहास है साक्षी,
सदा पुरुषों की बनी सारथी रही,
नजर से नजरिया बदली,
दर्पण से दर्शन बनी,
बेटी से माता बनी,
कभी सीता बनकर तपी,
कर्म से कर्तब्य पथ पर चलीं,
गर्व से कहती हुँ,
मैं नारी हूँ,
स्वाभिमान से सदा हुंकार भरती,
हाँ मैं नारी हूँ…
3

प्रकृति की है अद्भुत रचना
कहीं गिरना,
तो है कहीं उठना,
प्रकृति सुख दुख से संनिहित है,
ना किसी को है देती,
ना ही किसी से लेती,
जिसका रहा भाव जैसा,
सदा अर्पण करती है वैसा, प्रकृति को समझोगे अनमोल,
तब स्वयं के कर्मों से देती तौल,
अरे मानव करले खुद की पहचान,
यदि बड़ा तेरा अभिमान,
तो मान नहीं पाएगा,
होगा प्यारे वही,
जो श्री राम को भाएगा,
प्रकृति के हैं खेल निराले,
कहींहोता जन्मों का पहर,
तो कहीं दिखता मौतों का ढेर,
कभी प्रकृति की कायनात
अद्भुत छटा विखेरती है,
यदि रूठ जाए प्रकृति का कहर,
फिर उंगली दांतो के बीचों बीच होती है..
राजेश्वरी बाजपेयी
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
राजेश्वरी बाजपेयी
जबलपुर
8718066709