प्रतीक्षा गाँगुली नाथ ने ‘शब्द-साधना’ को एक जीवंत आंदोलन का रूप दिया है। उनकी रचनाओं में जीवन के विविध रंग, सामाजिक विसंगतियाँ और मानवीय संवेदनाओं का गहरा पुट मिलता है। एक बहुमुखी प्रतिभा के रूप में उन्होंने आधुनिक तकनीक और कला के विविध आयामों को स्वयं में समाहित किया है। आज उनका ‘शिवोहम प्रकाशन’ गुणवत्ता और शुचिता का पर्याय बन चुका है। अपनी पेशेवर व्यस्तताओं के बावजूद उनका यह सृजनात्मक संघर्ष उन सभी नवोदित रचनाकारों के लिए एक सार्थक मंच है, जो अपनी मौलिकता को पुस्तकाकार देना चाहते हैं।
आलेख :- विनोद आनंद
आज के इस नितांत भौतिकवादी युग में, जहाँ मनुष्य की सफलता का पैमाना केवल उसकी सुख-सुविधाओं और बैंक बैलेंस से मापा जाता है, संवेदनाओं का धरातल धीरे-धीरे दरक रहा है। चकाचौंध भरी इस अंधी दौड़ में लोग जुगत और जुगाड़ के उस दलदल में फंसे हैं, जहाँ ‘अर्थ’ ही परम सत्य बन बैठा है।
ऐसे शुष्क और मरुस्थली परिवेश में सृजनात्मकता की मंदाकिनी को प्रवाहित रखना किसी भगीरथ प्रयत्न से कम नहीं है। इसी कठिन डगर पर संकल्प के पाँव जमाकर खड़ी हैं प्रतीक्षा गाँगुली नाथ , जो आज के समय में साहित्य लेखन और एक विराट सृजनात्मक आंदोलन का जीवंत प्रतीक बनकर उभरी हैं।
मूल रूप से बिहार की उर्वर मिट्टी की सुवास लेकर कोलकाता की सांस्कृतिक आबोहवा में रची-बसी प्रतीक्षा ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि हृदय में अटूट लगन हो, तो बैंकिंग जैसे अति-व्यस्त और अनुशासित पेशेवर जीवन के बीच भी शब्दों की खेती की जा सकती है।
उनका व्यक्तित्व एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक ओर वित्तीय जगत की तार्किकता है और दूसरी ओर साहित्य की तरलता, और उन्होंने इन दोनों के मध्य जो सेतु बनाया है, वह अद्भुत है।

प्रतीक्षा के साहित्यिक सफर का सबसे प्रेरणादायी पक्ष ‘शिवोहम प्रकाशन’ की स्थापना है। यह मात्र एक व्यावसायिक उद्यम नहीं, बल्कि उन अनगिनत नवोदित रचनाकारों के सपनों का आशियाना है, जिनकी रचनाएँ संसाधनों के अभाव में धूल फाँकने को मजबूर थीं। अक्सर देखा जाता है कि बड़े प्रकाशन संस्थान स्थापित नामों के पीछे भागते हैं, जिससे नई प्रतिभाएँ कुंठित हो जाती हैं।
किंतु प्रतीक्षा गाँगुली नाथ ने इस परिपाटी को चुनौती दी। हाल ही में हुई एक अनौपचारिक दूरभाष वार्ता के दौरान, जब उन्होंने एक साझा काव्य संकलन के लिए रचनाओं का आह्वान किया, तो उनके शब्दों में वही सरोकार झलका जो एक सच्चे साहित्य-मनीषी में होना चाहिए।
उन्होंने बड़े ही पारदर्शी भाव से स्पष्ट किया कि शिवोहम प्रकाशन का ध्येय मुनाफे की अंधी दौड़ नहीं, बल्कि एक ऐसी सुलभ व्यवस्था का निर्माण करना है जहाँ हर कलमकार, चाहे वह कितना ही नया क्यों न हो, अपनी कृतियों को सम्मानजनक तरीके से पुस्तकाकार दे सके। उन्होंने प्रकाशन की लागत को इतना वाजिब रखा है कि एक साधारण परिवेश का लेखक भी अपनी मेधा को दुनिया के सामने लाने का साहस कर सके।
यह संवेदनशीलता ही उन्हें एक प्रकाशक से ऊपर उठाकर एक साहित्यिक संरक्षक की श्रेणी में खड़ा करती है।
प्रतीक्षा गाँगुली नाथ की अपनी लेखनी भी उतनी ही प्रखर और सक्रिय है। उनकी दर्जनों पुस्तकें न केवल प्रकाशित हो चुकी हैं, बल्कि अमेजन और किंडल जैसे वैश्विक पटलों पर पाठकों की सराहना बटोर रही हैं। उनकी रचनाओं में जीवन के विविध रंग, सामाजिक विसंगतियाँ और मानवीय संवेदनाओं का गहरा पुट मिलता है। एक बहुमुखी प्रतिभा के रूप में वे केवल कागज-कलम तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने आधुनिक तकनीक और कला के अन्य आयामों को भी स्वयं में समाहित किया है।
कंप्यूटर की गहरी समझ, ग्राफिक डिजाइनिंग में निपुणता और संगीत व गायन के प्रति उनका गहरा अनुराग उनके व्यक्तित्व को एक संपूर्ण कलाकार का विस्तार देता है। यही कारण है कि उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकें न केवल पठनीय होती हैं, बल्कि अपनी साज-सज्जा और तकनीकी शुद्धता में भी अद्वितीय होती हैं। बैंकिंग क्षेत्र के कड़े अनुशासन ने उनकी कार्यशैली में वह सुघड़ता भर दी है, जो आज के समय में विरल है।
उनका जीवन दर्शन इस सत्य को प्रतिध्वनित करता है कि कभी-कभी नियति हमें उन रास्तों पर ले जाती है जिन्हें हमने प्रारंभ में शायद स्वयं के लिए चुना भी न हो, किंतु वही रास्ते अंततः हमारी वैश्विक पहचान बन जाते हैं। लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में उनका पदार्पण भी कुछ ऐसे ही आकस्मिक मोड़ों से होकर गुजरा, पर आज वे इस क्षेत्र की एक अपरिहार्य धुरी बन चुकी हैं। पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करते हुए, एक गृहणी, एक अधिकारी और एक साहित्यकार की भूमिकाओं के बीच जो संतुलन उन्होंने साधा है, वह नई पीढ़ी की महिलाओं और युवाओं के लिए एक मशाल के समान है।
वे केवल पुस्तकें नहीं छाप रहीं, बल्कि वे उन लेखकों के आत्मविश्वास को भी नया जीवन दे रही हैं जो उपेक्षा के डर से अपनी डायरियाँ बंद कर चुके थे। आज प्रतीक्षा नाथ गाँगुली का नाम एक ऐसे विश्वास का पर्याय बन गया है, जहाँ नवांकुरों को मार्गदर्शन मिलता है, अनुभवी लेखकों को सम्मान मिलता है और साहित्य जगत को एक नई ऊर्जा। उनकी यह साधना साहित्य के आकाश में उस नक्षत्र की तरह है जो अंधकार चीरकर आने वाले कल के रचनाकारों का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।