साहित्य को समाज का दर्पण कहते हैं, साहित्य हीं समाज,व्यक्ति और व्यवस्था को परिभाषित करने का काम भी करता है।आज रामायण, गीता महाभारत ये धर्म कथाएं हमारे जीवन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है लेकिन साहित्य सृजन करने वाले कुछ चंद लोगों को छोड़ दें जो सत्ता का दलाली करता है।पुरस्कार के लिए और कुछ प्रभावशाली लोगों के कृपापात्र बने रहने के लिए स्वांग रचता है अगर ऐसे लोगों को दरकिनार कर दिया जाय तो अधिसंख्य साहित्यकार मुफलिसी में ही जीते हैं।
आलेख:- विनोद आनंद

आ ज चर्चा करता हूँ पंजाब के चंडीगढ़ में एक ऐसे शख्स की जो यह सावित कर दिया कि किसी भी व्यक्ति की डिग्री और पेशा से इत्तर भी कुछ होता है।और आज उसे उन्होंने साबित भी कर दिया उनका नाम और काम बताने के पूर्व चर्चा करना चाहूंगा जयशंकर प्रसाद की जिनकी साहित्य सृजन और उनके विषय बोध की गहनता ने आज भी बड़े बड़े डिग्रीधारी विद्वानों को उसमें भाव और विचार ढूढने के लिए शोध करने पड़ते हैं।
जयशंकर प्रसाद भी मात्र सातवीं तक पढ़ाई की थी।लेकिन जिस संस्कृतनिष्ट शब्दावली और गंभीर लेखन के द्वारा विभिन्न विधाओं में उन्होंने साहित्य सृजन किया आज उस सातवीं पास जयशंकर प्रसाद की रचनाओं को 9 वीं कक्षा से लेकर पोस्ट ग्रेजुएट तक में पढ़ाई जाती है। उनकी रचनाओं पर लोग पीएचडी और एमफिल कर रहे हैं ,कामायनी (काब्य)से लेकर ध्रुवस्वामिनी(नाटक) तक के नायक- नायिका पर लोग रिसर्च कर रहे हैं।वे तो सम्पन्न घराने से थे।खैनी की उनकी आढ़त थी।बनारस में अपने दुकान पर बैठ कर खैनी बेचते और साथ में अध्ययन और साहित्य सृजन में भी रत रहते थे।
ठीक उसी तरह आज पंजाब के चंडीगढ़ के टांडा रोड के साथ लगते मुहल्ला सुभाष नगर में रहने वाले 75 वर्षीय द्वारका भारती का चर्चा करना चाहूंगा।संदर्भ तो एक फेसबुक के एक पोस्ट से मिला जिसे एक बहन ने द्वारिका भारती पर पोस्ट किया था।लेकिन जबसे मैने इसे पढ़ा था मेरे दिमाग में ये विचार आ रहा था कि द्वारिका भारती जैसे संघर्ष जीवी की चर्चा करूँ।
द्वारका भारती मात्र 12 वीं पास हैं। घर चलाने के लिए उन्हें मोची का काम करना पड़ता हैं।गरीबी और मुफलिसी में जीने वाले भारती लोगों के जूता पॉलिस भी करते हैं।लेकिन साथ हीं साहित्य सृजन भी।

द्वारिका भारती
वे भले ही वे 12 वीं पास हैं, पर साहित्य की समझ के कारण उन्हें वर्दीवालों को लेक्चर देने के लिए बुलाया जाता है। इनके लिखे किताबों का अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है। इनकी स्वयं की लिखी कविता एकलव्य इग्नू में एमए के बच्चे पढ़ते हैं, वहीं पंजाब विश्वविद्यालय में 2 होस्टल के छात्र इनके उपन्यास मोची पर रिसर्च कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो व्यवसाय आपका भरण पोषण करे, वह इतना अधम हो ही नहीं सकता, जिसे करने में आपको शर्मिंदगी महसूस होगी।
द्वारका भारती का कहना है कि – घर चलाने को गांठता हूँ जूते, सुकून के लिए रचता हूँ साहित्य।
सुभाष नगर में प्रवेश करते ही अपनी किराए की छोटी सी दुकान पर आज भी द्वारका भारती हाथों से नए नए जूते तैयार करते हैं। अक्सर उनकी दुकान के बाहर बड़े गाड़ियों में सवार साहित्य प्रेमी अधिकारियों और साहित्यकारों का पहुंचना और साहित्य पर चर्चा करना भी होता रहता है।जिस तरह कभी बनारस में जयशंकर प्रसाद के खैनी के दुकानों पर हुआ करता है।
सबसे बड़ी बात है वे साहित्य पर चर्चा के दौरान भी अपने काम से जी नहीं चुराते और पूरे मनोयोग से जूते गांठते रहते हैं। फुरसत के पलों में भारती दर्शन और कार्ल मार्क्स के अलावा पश्चिमी व लैटिन अमेरिकी साहित्य का अध्ययन भी करते हैं।
डॉ.सुरेन्द्र अज्ञात की क्रांतिकारी लेखनी ने किया प्रभावित
द्वारका भारती ने बताया कि 12 वीं तक पढ़ाई करने के बाद 1983 में होशियारपुर लौटे, तो वह अपने पुश्तैनी पेशे जूते गांठने में जुट गए। साहित्य से लगाव बचपन से था। डॉ.सुरेन्द्र अज्ञात की क्रांतिकारी लेखनी से प्रभावित हो उपन्यास जूठन का पंजाबी भाषा में किया गया। उपन्यास को पहले ही साल बेस्ट सेलर उपन्यास का खिताब मिला। इसके बाद पंजाबी उपन्यास मशालची का अनुवाद किया गया। इस दौरान दलित दर्शन, हिंदुत्व के दुर्ग पुस्तक लेखन के साथ ही हंस, दिनमान, वागर्थ, शब्द के अलावा कविता, कहानी व निबंध भी लिखे।
द्वारका भारती ने बताया कि आज भी समाज में बर्तन धोने और जूते तैयार करने वाले मोची के काम को लोग हीनता की दृष्टि से देखते हैं, जो नकारात्मक सोच को दर्शाता है। आदमी को उसकी पेशा नहीं बल्कि उसका कर्म महान बनाता है। वह घर चलाने के लिए जूते तैयार करते हैं, वहीं मानसिक खुराक व सुकून के लिए साहित्य की रचना करते हैं। जूते गांठना हमारा पेशा है। इसी से मेरा घर व मेरा परिवार का भरण पोषण होता है।
उन्होंने सच भी कहा आज द्वारका भारती जैसे कई लोग हैं।आप को याद होगा बेबी हालदर जो घर में नौकरानी की काम करती थी।बहुत अभाव में रही झुग्गी में रहती और घरों में झाड़ू पोछा करती, मात्र सातवीं तक पढ़ी थी।लेकिन अपने कठोर जीवन की सच्चाई को आत्मकथा के रूप में लिखना शुरू किया तो उनकी यह आत्मकथा ‘‘एलो अंधेरी ” इतना प्रसिद्ध हो गया कि उसे कोर्स में भी शामिल किया गया।
साहित्य को समाज का दर्पण कहते हैं, साहित्य हीं समाज,व्यक्ति और व्यवस्था को परिभाषित करने का काम भी करता है।आज रामायण, गीता महाभारत ये धर्म कथाएं हमारे जीवन को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है लेकिन साहित्य सृजन करने वाले कुछ चंद लोगों को छोड़ दें जो सत्ता का दलाली करता है।पुरस्कार के लिए और कुछ प्रभावशाली लोगों के कृपापात्र बने रहने के लिए स्वांग रचता है अगर ऐसे लोगों को दरकिनार कर दिया जाय तो अधिसंख्य साहित्यकार मुफलिसी में ही जीते हैं।जिनके लिए ना तो क्रिकेट खेलने वाले या फिल्मों में नाचने गाने वालों के तरह धन वर्षा होती है और ना वह सम्मान हीं।
अगर बात करें प्रेमचंद्र से लेकर निराला तक किसी भी साहित्यकार को अपने जीवन काल में वह सुख सुबिधा नही मिला जिस से साहित्य से उन्हें दो जून का रोटी मिल सके।ना उन्हें वह स्टारडम मिला जिनकी अपेक्षा थी।यही बजह है कि द्वारिका भारती जैसे लोगों को आज भी दो जून के रोटी के लिए जूता बनान पड़ता है।इन साहित्यकारों के लिए सरकार के पास तो कोई यंजना नही है और नही समाज के संपन्न लोगो के पास वह नज़रिया जिस से उनका कल्याण हो सके।