
लेखक परिचय :- विनोद आनंद (विनोद कुमार मंडल)
जन्म 10 जनवरी, 1965
शिक्षा:-स्नातकोत्तर(हिंदी), रांची विश्व विद्यालय,
पिछले चार दशक से साहित्य औऱ पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय, साहित्य के विभिन्न विधाओं में लेखन,विभिन्न संस्थाओं से सम्मान प्राप्त, कई स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन,अंतर्कथा (antarkatha.Com एवं antarkatha.In) एवं streetbuzz के सम्पादक,
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विनोद आनंद
को लकाता की सांझ का अपना एक अलग जादू है। धुएँ सी हवा में पके आम की गंध, ट्राम के धीमे पहिए और सूरज ढलते वक्त की लालचढ़ी रोशनी।
यहीं, शहर के बीचोंबीच एक शांत कोना है — विक्टोरिया पार्क।
संगमरमर की बेंचों पर बैठा इतिहास, और उस इतिहास के बीच कुछ चेहरे जो आज भी अपनी कहानियाँ ढूँढ रहे हैं।
ईशान ने उस दिन यूँ ही पार्क का रुख किया था। ऑफिस से थका हुआ, मन में अजीब-सी ऊब।
उसके मन में कई दिनों से कोई गहराई नहीं बची थी — कोड, ईमेल और प्रोजेक्ट्स के बीच ज़िंदगी जैसे फाइलों में कैद हो गई थी।
धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए वह उस बेंच तक पहुँचा जो पुराने पीपल के पेड़ के नीचे थी।
वहीं उसने उसे देखा — एक लड़की, गहरी नीली आँखों वाली।
वह अकेली बैठी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, मगर मुस्कान के पीछे कहीं भीतर एक ठहरी हुई उदासी भी थी।
धीरे से ईशान बेंच के दूसरे सिरे पर जाकर बैठ गया। कुछ पल खामोशी रही।
हवा का एक झोंका आया, उसके खुले बालों को उड़ाते हुए ईशान के तरफ चला आया.जिसकी सुगंध ईशान को उससे बात करने का साहस उसे दिया.
ईशान ने धीरे से कहा —
“सुंदर शाम है आज, है ना?”
लड़की ने थोड़ा सा मुस्कराकर कहा —
“शाम तो हमेशा सुंदर होती है, लेकिन हर किसी की शाम खुशगवार नहीं होती।”
ईशान मुस्कराया।
“लगता है आपकी शाम आज कुछ ठीक नहीं रही।”
“ठीक क्या होती है, ये भी अब भूल गई हूँ शायद,” उसने शांत स्वर में कहा।
“मेरा नाम पारुल है, बर्धमान जिले के एक छोटे से गाँव से आई हूँ। माँ के साथ यहाँ रहती हूँ, यहीं पढ़ रही हूँ, बी.ए. के आखिरी साल में।”
वह रुककर बोली, “पापा अब नहीं हैं… माँ बहुत मेहनत करती हैं, छोटी-सी कंपनी में काम करती हैं।”
ईशान ने सिर हिलाया:
“जीवन का भार वक्त से भी भारी होता है, पारुल।”
वे दोनों धीमे स्वर में बात करते रहे — किताबों, शहर, काम, उम्मीदों पर।
सूरज ढल गया, और उस गुलाबी रोशनी में किसी अनजाने भाव ने जन्म लिया।
जब पारुल उठी, उसने बस इतना कहा —
“शायद हम फिर मिलेंगे।”
उसकी आँखों की नीली चमक ईशान के मन में बस गई।
ईशान अगले हफ़्ते फिर वहाँ पहुँचा।
शाम वही थी, हवा वही, और वही बेंच।
वह बैठा ही था कि पीछे से वही मधुर आवाज़ सुनाई दी —
“आज फिर वही बेंच चुनी आपने?”
वह मुड़ा — पारुल मुस्करा रही थी, हाथ में किताब लिए।
यूँ शुरू हुई उनकी दूसरी मुलाकात — अब कुछ कम औपचारिक, कुछ ज़्यादा आत्मीय।
कभी वह अपनी माँ के बारे में बताती, जो अब भी अपने पति की तस्वीर के सामने दिया जलाती है;
कभी वह अपने गाँव के तालाबों की बात करती, जहाँ नीले कमल खिलते हैं।
ईशान चुपचाप सुनता, और हर शब्द उसके भीतर उतरता चला जाता।
वह खुद को हल्का महसूस करता — जैसे किसी ने वर्षों बाद उसके भीतर का शोर शांत किया हो।
“तुम्हारी आँखें समंदर जैसी हैं,” एक दिन उसने कहा, “गहरी और रहस्यमयी।”
पारुल ने हल्के से हँसकर जवाब दिया —
“और समंदर में उतरने की हिम्मत सब में नहीं होती, ईशान।”
उनके बीच अब खामोशियाँ भी संवाद बन चुकी थीं।
कभी बारिश में भीगना, कभी कॉफी शॉप में घंटों बैठना बिना किसी बात के —
दोनों का बंधन अब किताबों या बातचीत से परे किसी अदृश्य धागे से बंध चुका था।
कुछ महीने बीते।
ईशान अब लगभग हर शाम विक्टोरिया पार्क जाता।
कभी पारुल परीक्षा की चिंता में होती, कभी ईशान ऑफिस की भागदौड़ में।
पर जब दोनों साथ बैठते, तो वक्त रुक जाता।
एक शाम उसने पूछा —
“ईशान, तुम्हारे परिवार में कौन है?”
“माँ और छोटी बहन। पापा विदेश में रहते थे, अब सेवानिवृत्त होकर चेन्नई में बस गए हैं। मैं यहीं नौकरी करता हूँ।”
“तो क्या तुम कभी अकेले नहीं महसूस करते?”
“करता हूँ पारुल, और शायद इसलिए तुम्हें ढूँढ लिया।”
पारुल चुप हो गई।
वह धीरे से बोली — “कभी-कभी सोचती हूँ, अगर जीवन इतना आसान होता, तो हर कोई मुस्कराता। मेरी माँ को देखो… उन्होंने सब कुछ खोकर भी हमें थामे रखा।”
ईशान ने उसका हाथ हल्के से थाम लिया —
“और इसी ताक़त के लिए मैं तुम्हारे आगे झुक सकता हूँ।”
पारुल की आँखें भर आईं। उस रात दोनों कुछ नहीं बोले, बस झील के किनारे बैठे रहे।
महीनों की निकटता में दूरी का विचार भी क्रूर लगता है।
लेकिन ज़िंदगी स्थिर नहीं रहती।
एक दिन ईशान को कंपनी से ट्रांसफर लेटर मिला — छह महीने के लिए मुंबई प्रोजेक्ट पर भेजा जा रहा था।
पारुल ने कुछ नहीं कहा।
सिर्फ़ पूछा — “लौट आओगे ना?”
“हाँ, वादा रहा। छह महीने बाद फिर वहीं मिलेंगे, उसी बेंच पर।”
विदाई वाली शाम में विक्टोरिया पार्क का आसमान शायद दोनों के हालात समझ रहा था।
ईशान ने धीरे से कहा —
“यह बेंच हमारी साक्षी है पारुल। जब लौटूँगा, तुम यही रहना।”
“अगर मैं न रही?”
“फिर मैं तुम्हें हर शाम ढूँढूँगा, हर हवा के झोंके में।”
पारुल की आँखों में आँसू झिलमिला उठे।
उसने काँपती आवाज़ में कहा —
“ईशान, मुझे डर लगता है दूरी से… ये बिछड़न बहुत भारी होती है।”
मुंबई में दिन भारी थे। ईशान को हर दिन याद आती — उस नीली आँखों वाली लड़की की जो कोलकाता में उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।
पहले रोज़ कॉल, फिर हफ्ते में एक-दो बार।
धीरे-धीरे कॉल्स कम होने लगे, मैसेज अधूरे रहने लगे।
उधर पारुल की ज़िंदगी में एक और मोड़ आया।
उसकी माँ को अचानक सीने में दर्द हुआ। रात भर वह हॉस्पिटल के चक्कर लगाती रही।
सुबह तक डॉक्टरों ने बताया — हार्ट अटैक से निधन हो गया।
पारुल ने हाथ कांपते हुए ईशान को फोन मिलाया।
लेकिन ईशान मीटिंग में था — उसने कॉल मिस कर दी।
जब उसने दो घंटे बाद फोन देखा, सब कुछ चुप हो चुका था।
“ईशान,” आख़िरी मैसेज में पारुल ने लिखा था, “अब मैं बिल्कुल अकेली हूँ।”
ईशान उसी रात फ्लाइट लेकर कोलकाता पहुँचा।
पर तब तक सब कुछ खत्म हो चुका था।
पारुल मूक थी — न रोई, न बोली। बस उसकी आँखों की चमक बुझ चुकी थी।
ईशान ने उसका हाथ थामा — “काश मैं पहले आता…”
पारुल ने हल्के स्वर में कहा —
“कभी-कभी वक्त हमारे साथ नहीं होता, ईशान। बस यही सच है।”
वह गाँव चली गई, सब कुछ पीछे छोड़कर।
तीन साल गुजर गए।
ईशान कोलकाता लौट आया।
अब वह बड़ा अधिकारी था, पर भीतर से खाली।
एक दिन उसे एक एनजीओ में सॉफ्टवेयर सेटअप के सिलसिले में भेजा गया।
वहाँ बच्चों के शोर में उसने वह आवाज़ सुनी — मधुर, परिचित, सजीव।
वह मुड़ा —
वो थी पारुल।
थोड़ी परिपक्व, थोड़ी थकी हुई, लेकिन आँखें अब भी वही नीलीं, वही शांति।
“पारुल…”
वह पलटी, एक पल को सन्न, फिर मुस्कराई।
“ईशान… तुम?”
“हाँ, मैं… बहुत देर कर दी, ना?”
पारुल ने सिर झुकाया।
“देर तो हुई, पर शायद किस्मत ने हमें अब किसी और रूप में मिलाया है। मैं अब बच्चों को पढ़ाती हूँ। शायद यही मेरा जीवन है।”
ईशान ने पूछा —
“क्या अब भी विक्टोरिया पार्क जाती हो?”
“नहीं,” पारुल मुस्कराई, “अब वो बेंच बच्चों की हँसी में छिप गई है।”
दोनों देर तक चुप रहे।
कुछ महीनों तक ईशान रोज़ उस एनजीओ में जाता रहा।
वह बच्चों को खेल सिखाता, पारुल उन्हें पढ़ाती।
एक दिन उसने कहा —
“पारुल, अगर इस बार तुम्हें फिर से थामने का मौका मिले, तो क्या तुम छोड़ोगी नहीं?”
पारुल मुस्कराई —
“अब डर नहीं है, ईशान। सपने देखना फिर से सीख लिया है।”
कुछ ही हफ्तों में उन्होंने सादगी से विवाह किया — मंदिर में, कुछ बच्चों की उपस्थिति में।
ईशान ने पारुल के मांग में सिंदूर लगाया तो ईशान की आँखें भर आईं।
उसने कहा —
“अब ये बेंच हमारी नहीं, बल्कि उन सभी की है जो प्यार में विश्वास करते हैं।”
विवाह के बाद दोनों ने एक छोटा लर्निंग सेंटर खोला, उसी पार्क के किनारे।
नाम रखा — ‘स्मृति बेंच’।
वहाँ हर शाम बच्चों की हँसी गूंजती।
ईशान किताबें बाँटता, पारुल कहानियाँ सुनाती।
ज़िंदगी दोबारा रंगीन हो चली थी।
लेकिन किस्मत को शायद कहानी अधूरी ही पसंद थी।
एक दिन पारुल को तेज बुखार हुआ।
चेकअप के बाद पता चला — स्टेज थ्री कैंसर।
ईशान की दुनिया थम गई।
वह हर रात उसके पास बैठता, दवाइयाँ देता, लेकिन धीरे-धीरे पारुल की आँखों की चमक फीकी पड़ने लगी।
एक शाम, अस्पताल के कमरे की रोशनी में पारुल ने धीरे से कहा—
“ईशान, हर कहानी को अंत की जरूरत होती है, लेकिन प्यार कभी खत्म नहीं होता।
अगर मैं चली जाऊँ, तो इस लाइब्रेरी को ज़िंदा रखना… वहीं मेरी साँसें रहेंगी।”
ईशान ने आँसुओं में डूबते हुए कहा —
“तुम जाओगी नहीं, पारुल। मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूँ।”
पारुल मुस्कराई —
“अधूरा नहीं, पूरा। क्योंकि अब मेरा भी एक हिस्सा तुम्हारे भीतर रहेगा।”
कुछ हफ्तों बाद वह चली गई।
शांत, मुस्कुराती हुई — जैसे किसी बंधन से मुक्त हो गई हो।
ईशान अब भी विक्टोरिया पार्क की उसी बेंच पर आता है।
बच्चे आसपास खेलते हैं, और हवा में नीली चमक झिलमिलाती है।
कभी-कभी, शाम के वक्त जब सूरज ढलता है,
उसे लगता है कि पास बैठी कोई हँस रही है — वही नीली आँखें, वही पुरानी मुस्कान।
वह धीरे से कहता है —
“पारुल, ये बेंच अब हमारी नहीं रही, ये शहर की है, उन सबकी जो प्यार में यक़ीन रखते हैं।”
और गुलमोहर के फूल बेंच पर गिरते रहते हैं।
कोलकाता की हवा अब भी उन दोनों की कहानी सुनाती है —
प्रेम, विरह, त्याग और पुनर्मिलन की कहानी।
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