• Wed. Feb 4th, 2026
साहित्य, संस्कृति, कला

संस्मरण : मिट्टी से दूर, आत्मा के पास

Byadmin

Nov 2, 2025
Please share this post

गांव की संस्कृति से दूर, शहर की भीड़ में खो जाने की पीड़ा – यह सिर्फ मेरी नहीं, लाखों युवाओं की व्यथा है। सोचता हूं – क्या किसी दिन ऐसा होगा कि गांव लौटूं, रोजगार मिले, फिर वहीं रहूं, जहां आत्मा खुश रहती है?

(विनोद आनंद)

धुबनी स्टेशन पर आज शाम की धुंधली रोशनी में जब ट्रेन आई, तो छाया के साथ-साथ मन में भी कोई उदासी उतर आई थी।

वह क्षण जब मैं धनबाद जाने के लिए डिब्बे में चढ़ा, भीतर कहीं कुछ विदा हो रहा था—जैसे खुद ही अपनी मिट्टी, अपने गांव, अपने आकाश, अपने खेतों से मूक अलविदा कह रहा था।

गांव की गली में दौड़ते बचपन की स्मृतियां, आम के बगान में खेलते दिन, और बरसात की शामों में पकी बालू के झूलों की टुनटुनाहट – सब सहसा आँखों के आगे आ खड़े हुए।

मन बेकल था, आंखें बार-बार अपने घर की चौखट पर टिकती थीं, जहां से आती बार-बार बुलाती आवाज अब कुछ दिनों तक नहीं सुनाई देगी।

यात्रा आज वैसी नहीं थी जैसी पहले कभी रही, आज सिर्फ एक सफर नहीं था बल्कि अतीत से वर्तमान में लौटने की पीड़ा थी – उस शहर की ओर जिसने मुझे रोजी-रोटी तो दी, लेकिन हर बार मेरी आत्मा को सूखा सा छोड़ दिया।

गांव के खेत-खलिहान, बागान, ताल-तलैया, और मां के हाथ की गर्मी – ये सब चित्र वर्तमान की दौड़ में धुंधले पड़ते थे, लेकिन हृदय-स्पर्शी स्मृतियाँ बनकर ज़िंदा रहते।

गाड़ी ने जैसे हीं मधुबनी स्टेशन की सरहद को पार किया, खेतों में खड़े धान, आम के बागान, मक्का के खेत और गांव की गली के मोड़ जैसे पीछे छूट गए।

ट्रेन की खिड़की से झांकते पेड़-पौधे कंधे से कंधा मिला मुस्कुराते – कोई कहता, ‘आना जरूर फिरे’, कोई मायूस होकर रह जाता।

मन जैसे भीतर घिसटता-विसरता– मिट्टी की सौंध, गांव की टोली और अपने घर की चौखट का दरार अपनी खुद की आवाज में गूंजने लगता।

******


र, परिवार, और बचपन का आरोह-अवरोह गांव में मुझे सबसे ज्यादा सुकून मिलता था बहन के घर। मेरी दूसरी जन्मभूमि सा हो गयी थी , जहाँ बहन की ममता, जीजा की स्नेहिल मुस्कान, और घर की बहुएँ – सब मिलकर परिवार की नींव को सहेजती थीं।

बचपन में मां की बीमारी ने हमें बहुत कुछ सिखा दिया; दुःख ने आत्मा को पकाया, लेकिन उतना ही बहनों ने अपने स्नेह, आदर, और कभी-कभार मजबूरी की डांट से भी जीवन को हरा-भरा रखा।

माँ को अस्थमा ने घेर लिया था – लगातार दवा के बोझ से उनके कंधे झुके, चेहरे की हंसी ओझल हुई, और सांसें मुश्किल हो गईं।

रात की तन्हाई में माँ का खंखारना, नींद में बार-बार उठना, और छत की ओर निर्लिप्त आंखों से देखना – ये सब दृश्य मेरी स्मृति में ऐसे बसे हैं जैसे किसी चुपचाप नाव में बैठे यात्री की हल्की घनघोर प्यास।

अंतिम दिनों में माँ की पीड़ा देखकर दिल का हर कण शोकाकुल हो जाता था; लगता था कि मन का कोई टुकड़ा फिर से जीवित नहीं होगा।

पिता हम सबों के लिए अथक श्रम करते रहे, मां के लिए दवा, हमारे लिए खाना, खुद के सपनों को गुम कर, हमारे लिए ज़िन्दगी हो गए।

बचपन का हर झोंका, हर धूप, हर कठिनाई अब कल्पना नहीं, यथार्थ था। छोटी बहन हमेशा आंखों में आंसू लाती – वह प्यार, वह अपनापन, वह आत्मीयता – आज भी मुझे भिगो देती है।

अब जब भी गांव लौटता, बहन के घर की में हीं ठहरता उसकी आंखों की नमी – यह सब मेरे लिए कोई साधारण भेंट नहीं थी, यह जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार था।

गांव छोड़ते हीं ट्रेन की गति के साथ मेरा मन और भी बेचैन हो उठता। प्रयास करता निदास दृश्य, बहती नदी, आम के बागान, संध्या की आरती के स्वर, खेतों में हरे रंग की चमक, और गोधूलि में साईकिल पर लौटती टोली को भूल जाऊँ – पर स्मृति का पहरा तगड़ा था।

शहर की भीड़, धुंआ, दौड़, तनाव – सब मुझसे शहर का हिस्सा बनने को कहता था, फिर भी भीतर छुपा गांव का का वह दृश्य कभी उस हकीकत को स्वीकारने को तैयार न होता।

धनबाद – यह शहर मेरे लिए सिर्फ काम की जगह है, जहां जमीन के नीचे कोयले की परतें हैं, लेकिन ऊपर हर आदमी की हथेली पर चिंता की रेखाएं।

जितना इस शहर में समय बिताया, उतना ही अपनी मिट्टी, अपने गांव, अपने रिश्तों को अधिक महसूस किया।

शहर ने रोजी तो दी, मगर अपनापन नहीं। मेरे साथी, पड़ोसी, मकान मालिक – सबने जरूर व्यवहार निभाया, लेकिन कभी गांव जैसी तसल्ली नहीं मिली।

****


धुबनी से धनबाद की यात्रा में सोचते हुए सामाजिक पीड़ा ट्रेन में बैठने के बाद बाहर के दृश्य बदलते रहे, लेकिन भीतर कोई वेदना स्थिर रही। सोचता रहा – क्यूँ गांव के लोग शहर में जा रहे हैं?  क्यूँ हर बार जब गांव छोड़ लौटता हूँ, आत्मा का एक पहलू वहीं छूट जाता है ?

याद आता– पहले गांव में घर होते, खेत होते, हाथ से बोया धान, मां के हाथ की बनी रोटी, बहनों की हंसी, और शाम को तलाब के किनारे  बैठना। आज सब कुछ बदल गया है।

गांव में अब भी जिन्दगी है, लेकिन रोजगार नहीं। माटी के लोग विदा हो गए, युवा शहर की ओर जाने लगे– रोजगार की तलाश में।

सरकार और व्यवस्था की विफलता ने गांव को बंजर बना दिया है। सरकार ने गांव को विकास का स्वप्न दिया, लेकिन शहरों में काम हीं उपलब्ध कराए। बेरोजगारी के भंवर में फंसे गांव के युवा, अपनी पहचान, अपने संस्कार के साथ शहर आते हैं। लेकिन शहर उन्हें सिर झुकाकर मजदूर बना देता है, उनकी आत्मा को नहीं अपनाता।

गांव की संस्कृति से दूर, शहर की भीड़ में खो जाने की पीड़ा – यह सिर्फ मेरी नहीं, लाखों युवाओं की व्यथा है।

सोचता हूं – क्या किसी दिन ऐसा होगा कि गांव लौटूं, रोजगार मिले, फिर वहीं रहूं, जहां आत्मा खुश रहती है?

***

नबाद स्टेशन पर – विस्मरण की कोशिश ट्रेन की सीट पर बैठा मैं बार-बार वही दृश्य घुमाता रहा– गांव के खेत, बहन जा घर, मां की पुकार, और हल्की-सी डांट। गाड़ी के हर हिलने पर मन में एक धड़कन बढ़ जाती। जब धनबाद स्टेशन आया, और ट्रेन ने रफ्तार धीमी हुई, लगा हकीकत अब सामने है– मुझे अब उसी जीवन की ओर लौटना है, जिसे शहर ने मुझे दिया है।स्टेशन पर उतरते हीं मन बार-बार उन सब स्मृतियों को भूल जाना चाहता है, जो आंखों में आंसू लाते हैं।

खुद को समझाता– यह दौड़ है, यह भागना है, फिर रोजमर्रा की जिन्दगी में सब भूला देना है।इस शहर में रहने वाले लाखों युवाओं की कहानी यही है– वे गांव से आते हैं, सपना लेकर आते हैं, मेहनत करते हैं, चुपचाप दर्द के साथ जीते हैं।

उनकी आत्मा भले गांव में हीं रहती है, लेकिन शरीर शहर में जीता रहता है।

गांव की मिट्टी, आत्मा की पुकार और व्यवस्था की बेबसी….यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं– यह पुरे समाज, पुरे गांव के हर नौजवान की है, जिसके पास जमीन है, लक्ष्मण रेखा है, रिश्तों की सुलगती चिंगारी है, लेकिन रोज़ी-रोज़गार नहीं।

सरकार और व्यवस्था की उदासीनता, गांव में बदलाव के नाम पर मशाल की जगह अंधकार ले आती है। गांव की गलियां सूनी हो जाती हैं– वहां का युवा शहर आता है, लेकिन उसकी आत्मा गांव में ठहर जाती है।

आज जब मैं धनबाद की गलियों में रोजगार के लिए दौड़ता, जीवन के तनाव में झूलता, खुद को संतोष देता कि सब ठीक है। मन की गहराई से आवाज आती है – ‘‘हमारे देश का युवा आज शहर में तो है, लेकिन आत्मा गांव में छोड़ आया है।

’’शहर उसे कबूलता नहीं, गांव में रोजगार मिलता नहीं। इन सब के बीच बस वो भूलना चाहता है– अपने गांव की गलियां, खेत, बचपन, परिवार, और वो आत्मीयता की मकान जो उसके सपनों के दरवाजे हैं।

इस कहानी का अंत उन रेल की पटरियों पर होता है, जहां गांव का युवा हाथ में झोला लिए उतरा, लेकिन मन में वही चिंगारी लिए– ‘‘शहर में बेशक रहूं, मगर आत्मा गांव में ही बसती है।

’’यह कहानी एक चुपचाप पीड़ा है, जो आज के समाज को झकझोरती है, सरकार की नीतियों को आईना दिखाती है – जब तक गांव में रोजगार नहीं मिलेगा, गांव की मिट्टी से दूर होती आत्माओं की तड़प कम नहीं होगी।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *