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साहित्य, संस्कृति, कला

विनोद आनंद की कहानी:- 4- धोखे का सुखद अंत

Byadmin

Nov 8, 2025
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जीवन परिचय :

कहानीकार :-विनोद आनंद
शिक्षा :एम.ए. (हिंदी )रांची वि. वि.
साहित्य के विभिन्न विधाओं में लेखन
सम्मान :-विभिन्न संस्थाओं से साहित्य औऱ पत्रकारिता के लिए सम्मानित
संप्रति :-सम्पादक अंतर्कथा, एवं streetbuzz

पता :-रतनपुर, पो. गोविंदपुर, धनबाद, झारखण्ड, 828109

कहानीकार:  विनोद आनंद

नीले आसमान में बादलों के टुकड़े मानो किसी बेचैनी को समेटे हुए थे।
इन सिसकती गलियों के बीच कचहरी चौक पर स्थित थी छोटी-सी, पुरानी किराने की दुकान, जिसकी काठ की अलमारी, लटके तराजू और दीवार पर टँगी पुरखों की तस्वीरें – सब मिलकर विश्वास की एक अलग ही तस्वीर गढ़ती थीं।

उसके मालिक थे रामप्रसाद – सीधे-सच्चे, अभाव में भी खुश और सबसे बढ़कर ईमानदार।

इस दुकान की दीवारें भले ही खस्ताहाल थीं, पर इसके कारोबार की बुनियाद बहुत सशक्त थी – और वो थी ग्राहकों का अटूट भरोसा।

हर सुबह रामप्रसाद दुकान खोलते तो पीछे बैठे पंछियों का कलरव, चबूतरे पर बतियाती महिलाएं, चाय की कुल्हड़ में उमड़-घुमड़ती भाप, इन सबका हिसाब लगता जैसे समय की रेखाओं पर जी रहे किसी पुराने गीत का मुखड़ा हो।

शहर के लोग कहा करते – ‘रामप्रसाद के यहाँ तौल में कभी कमी नहीं मिलती।’ उनके पास तो खुद मुनाफे की गुत्थी उलझी रहती, फिर भी दुकान पर किसी बचे-खुचे ग्राहक को उधार देने से कभी नहीं हिचकते।

इसी छलकती साख को और मजबूत बनाने के लिए रामप्रसाद ने ठाना कि अब दुकान में माल सस्ता लाकर ग्राहकों को और राहत दी जाए।

इसी सिलसिले में शहर से सप्लाई एजेंट मोहनलाल के संग उनकी जान-पहचान बढ़ी।

मोहनलाल की बोली मिश्री सी मीठी थी, चाल धंधेबाजों-सी समझदार। उसके साथ नई साझेदारी का बीज रोपा तो दुकान में सपने भी नए-नए उगने लगे।

पहले-पहले मोहनलाल पर भरोसा करना थोड़ी हिचक के साथ हुआ, मगर उसने कस्बे, फिर शहर, और आगे जिलों में नाम की गारंटी देकर रामप्रसाद को यकीन दिला ही लिया।

‘सरल आदमी हूँ, छल-कपट नहीं जानता’ – अपनी इसी सोच के चलते रामप्रसाद ने वर्षों की थोड़ी-बहुत जमा पूँजी भी मोहनलाल के हवाले कर दी।

शुरुआत में तो सब वैसा ही हुआ जैसा मोहनलाल ने बताया था। महीना दर महीना माल वक्त पर आता, बिक्री बढ़ती, मुनाफा कटोरी में भरता जाता।

रामप्रसाद के बेटे बब्बन और उनकी पत्नी सावित्री भी आश्वस्त हो गए; लगा जैसे अच्छे दिनों की बयार घर में घुस गई हो।

दूकान के बाहर बैठकर पान खाने वाला मदन भी बोला – ‘‘औ भैया, अब तो तेरी दुकान में रौनक ही रौनक है!’’

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

करीब छह महीने बाद अचानक एक दिन माल नहीं पहुँचा। रामप्रसाद ने सोचा ट्रांसपोर्ट में ही देरी हो गई होगी।

दो-चार दिन बैठे रहे, हर रोज मोहनलाल को फोन करते, जवाब मिलता – ‘‘सब बढ़िया है भाई, बस थोड़ा इंतजार कर लो’’।

शाम पड़ते शंका बढ़ती गई। आखिरकार बेचैनी का आलम ऐसा कि वे खुद शहर पहुँचे। वहाँ जाकर पाया कि सप्लाई गोदाम वीरान खड़ा है, मोहनलाल का पता ही नहीं।

पूरी जमा पूँजी, वर्षों की मेहनत, और भरोसा – सब फिसल रहा था ज़मीन से। सजल आँखों और टूटे कंधों के साथ वे लौटे तो कस्बे का हर रास्ता अजनबी सा लग रहा था, हर चिरपरिचित चेहरा एक मौन शोकगीत।

उस रात बिस्तर पर करवटें बदलते, रामप्रसाद सोचता रहा – ‘‘क्या मैंने कोई गुनाह किया? क्या मेहनत और सच्चाई का यही पुरस्कार है?’’

पेट हल्की भूख से सिकुड़ा, दिल भारी धुंआ-सा। मगर एक अजीब सी जिद भी जागी – ‘अगर आज हार गया, तो नाम के आगे बेईमानी लग जाएगी।’

सुबह दुकान फिर से खोली।

बचे-खुचे माल को करीने से सजाया, पुराने ग्राहक जाने लगे लेकिन कुछ पुराने मुसाफिर अब भी साथ थे।

एक दिन बुढ़ा रघुनाथ दुकान पर आ बैठा, थैली में दो केले थमाए और चुपचाप बगल में बैठ गया, मानो महीनों की थकावट बाँटना चाहता हो।

उसने कहा – ‘‘जो हुआ बुरा हुआ, बेटा। पर तुम्हारी ईमानदारी हमारा अभिमान है।’’ उन्होंने अपने रिश्ते के थोक व्यापारी अटल बिहारी से रामप्रसाद को मिलवाया।

अटल बिहारी बोले – ‘‘विश्वास की पूँजी सबसे बड़ी पूंजी है, जब तक चाहो माल ले जाओ, जब होगा चुका देना।’’

इस भरोसे के सहारे दुकान फिर से चल पड़ी।

धीरे-धीरे कस्बे में खबर फैली – ‘रामप्रसाद अब भी पहले जैसा ही है!’ अहंकार, दुख और तकलीफ के बीच सच्चाई का उजास फैलने लगा।

दुकान में फिर से ग्राहकों की चहल-पहल लौट आई।

छोटे कस्बे के लोग, जो पहले उस पर तरस खाते थे, अब प्रेरणा लेने लगे। रामप्रसाद दिन-रात मेहनत करते, बच्चों की पढ़ाई में मदद करते, माँ की दवा का बंदोबस्त करते और किसी कठिन ग्राहक से झगड़ने की जगह मुस्कराकर समझाते – ‘‘छोटा-मोटा नुकसान तो चलता है, लेकिन रिश्तों की मिठास बनी रहनी चाहिए।’’

वक्त का पहिया घूमता रहा। दो साल गुज़र गए। रामप्रसाद ने दुकान के पिछले हिस्से में एक छोटा सा गोदाम बनवा लिया था अब। उसी रोज़, सुबह डाकिया आया, रंगीन लिफाफा थमाया।

पत्र खोलते ही हाथ काँप गए – मोहनलाल का नाम! — पत्र में लिखा था:

‘‘रामप्रसाद, तुम्हारे साथ जो किया उसकी सजा तो उपरवाला देगा ही, मेरा अंतरात्मा भी मुझे चैन नहीं लेने देती। चाहे हालात थे, या मेरा अपना लालच… मैं हार गया।

वक्त ने बहुत तंग किया, मगर तुम्हारी ईमानदारी याद आई। एक-एक पैसे जोड़कर वह राशि भेज रहा हूँ, और दिल से माफी मांगता हूँ।’’

लिफाफे में मनीऑर्डर था – ठीक उतनी रकम का जितनी डूबी थी। पत्र पढ़ते-पढ़ते रामप्रसाद की आँखें भर आईं, बेटे बब्बन दौड़कर बोले – ‘‘बाबूजी, सब वापस आ गया!’’ सावित्री ने पूजा की थाली सजा दी।

अब रामप्रसाद वही रकम लेकर एक ओर कस्बे के सरकारी स्कूल में एक छोटी पुस्तकालय शुरू करवाने निकल पड़े।

लोगों को बताया – ‘‘यह दान नहीं, कस्बे के उन बच्चों के लिए है जो सच्चाई और किताबों से बड़ा बनेंगे। बाक़ी पैसे से दुकान में नई मशीनें लगाईं और दो और कर्मचारियों को रखा।’’

कभी कोई नया व्यापारी दुकान पर आता, रामप्रसाद उसके कंधे पर हाथ रख बोलते – ‘‘भाई, व्यापार में धोखा मिल सकता है, पर सच्चाई और धैर्य रखोगे तो जो खोया वो भी लौटेगा, और मन से बड़ा मुनाफा मिलेगा।’’

बरसों बाद भी कस्बे की सड़कों से गुज़रते, लोग कहते – ‘देखो, यह है ईमानदारी की मिसाल – रामप्रसाद।’

वो मुस्कराते, दुकान में माप-तराजू ठीक करते, और सोचते – ‘धोखा चाहे जितना गहरा हो, अगर दिल साफ हो, तो उसका सुखद अंत भी हो सकता है।’

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