• Wed. Feb 4th, 2026
साहित्य, संस्कृति, कला

विषकन्या का प्रेम

Byadmin

Dec 14, 2025
Please share this post

विनोद आनंद का प्रथम लघु उपन्यास ‘विषकन्या का प्रेम’ शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। यह कृति एक अनूठी पहल है, जिसमें प्राचीन काल में गुप्तचर के रूप में इस्तेमाल होने वाली विषकन्या की आंतरिक दुनिया का पड़ताल किया गया है।

​उपन्यास, विषकन्या के जीवन की पीड़ा, विवशता और जटिल मनःस्थिति को केंद्र में रखकर  लेखक ने विष से भरी एक ऐसी स्त्री की भावनाओं को टटोलने की कोशिश की है, जो प्रेम और मानवीय लगाव से वंचित होकर केवल एक गुप्त अस्त्र के रूप में इस्तेमाल होती रही है। यह कृति उस दर्दनाक द्वंद्व को उजागर करती है जब एक विषैला शरीर प्रेम और मानवीय भावना की लालसा रखता है।

लघु उपन्यास

विषकन्या का प्रेम

लेखक:- विनोद आनंद

श्चिम के पर्वतीय प्रदेश में बसा था धारांश — सूर्यकुल की प्रतिष्ठित राजधानी।

चारों ओर ऊँचे किले, गंगा के उपनदियों की संगति और भूमि पर खिलते केसर-फूल, जो सूर्यवंश की यशगाथा का प्रत्यक्ष प्रतीक थे।

यही नगरी उस समय राजा विक्रमकेतु के अधीन था — एक ऐसा नरेश जिसकी प्रतिज्ञा उसकी आभा का व्रत थी।विक्रमकेतु का नाम मात्र ही शत्रुओं के हृदय में भय भर देता था। वह धर्म का रक्षक और नीति का उपासक था, परंतु उसकी नीति उतनी ही कठोर थी जितना उसका पराक्रम और् तेज।

यदि कोई अपराधी क्षमा माँगने आया भी, तो राजा की दृष्टि पहले धर्म के न्याय पर टिकती, करुणा उसके बाद में आती।

धारांश के राजमहाल में दिन-रात युद्ध की तैयारियाँ चलतीं, क्योंकि पड़ोसी नागऋद्धि राज्य का अधिपति राजा दण्डवाहन उसके विरुद्ध साम्राज्य-लालसा में आक्रामक था।

दण्डवाहन तेजतर्रार योद्धा था, लेकिन उससे अधिक धूर्त और चतुर।

कई बार संधि हुई, कई बार भंग हुई — युद्ध अविराम चल रहा था, परंतु अब दोनों राजाओं के शस्त्र शिथिल हो चुके थे।

युद्ध के बीच जब अस्त्रों की धार थकने लगी और रक्त से भूमि संतृप्त हो गई, तब राजनैतिक छल की नीति ने शस्त्र का स्थान लिया।

वहीं से प्रारंभ होती है माधवी की कथा।

2

मा धवी का  जन्म गाँव की सीमांत बस्ती में हुआ था। जब वह छह वर्ष की थी, तब महामारी ने उसके माता-पिता को छीन लिया।

अनाथ बालिका मंदिर की सीढ़ियों पर रोती मिली, जहाँ से राजवैद्य सुभुक्ति उसे लेकर आया और कहा — “राज्य को ऐसी ही नारी चाहिए, जो शत्रुओं के हृदय में प्रवेश करे और उन्हें मृत्यु का आलिंगन दे।

”विक्रमकेतु ने तब मात्र इतना पूछा — “क्या वह भेद जान सकेगी?”

वैद्य ने उत्तर दिया — “राजन्, उसे भेद नहीं चाहिए। उसे नियति चाहिए।”और यहीं से प्रारंभ हुआ माधवी का प्रशिक्षण।

रोज़ सुबह उसे सूक्ष्म मात्रा में विष पिलाया जाता, ताकि शरीर की प्रत्येक नस में विष जैसे किसी दिव्य अग्नि का संस्कार कर ले।

वह रोती, विचलित होती, पर धीरे-धीरे उसका शरीर उसी विष से अभ्यस्त हो गया। देखते ही देखते वह यौवन की देहरी पर पहुँची — नृत्य, संगीत, और काव्य में प्रवीण; पर उसके सौंदर्य के भीतर मृत्यु की छाया थी।

उसके होंठों की लालिमा, उसके हाथों की कोमलता, सब किसी संहार की छवि लिए हुए लगते।

राजमहल में उसे विशेष कक्ष में रखा गया, ऊँचे परदे, रेशमी वस्त्र, और हर कदम पर पहरा। पर वही माधवी जब दर्पण में खुद को देखती, तो कह उठती — “क्या मैं मानव हूँ, या मृत्यु का जीवंत रूप?

3

क दिन दरबार में शंखनाद हुआ। राजकक्ष में सेनानायक, मंत्रिपरिषद और वैद्य उपस्थित थे। राजा विक्रमकेतु ने गंभीर स्वर में कहा —

“नागऋद्धि फिर से हमारे सीमांत ग्रामों में प्रवेश कर चुका है। शांति सम्भव नहीं रही। अब केवल ‘नीति’ ही उपाय है। हमारी सहायता करेगी — माधवी।

”माधवी दरबार में आयी। उसके माथे पर स्वर्ण तिलक था, किंतु आँखों में एक अज्ञात उदासी।

राजा ने कहा — “कन्या, तू अब अपनी अंतिम परीक्षा के लिए तैयार है। तू नागऋद्धि जाएगी, और दण्डवाहन के दरबार में नर्तकी बनकर प्रवेश करेगी।

तुझे उसके समीप जाना होगा, और वही कार्य करना होगा जिसके लिए तू वर्षों से तैयार की गई है।

”माधवी ने मस्तक झुकाया, पर होंठ काँप उठे — “महाराज, क्या यही मेरा धर्म है?”

विक्रमकेतु का स्वर कठोर हुआ — “तेरा धर्म राज्य की रक्षा है। एक मृत्यु से हजारों की प्राण रक्षा होगी।

”वह मौन रह गई। उसके चरण थरथराए, पर उसने प्रतिज्ञा की मुद्रा में हाथ जोड़े और बोली — “जैसा राजाज्ञा।

”रात में वह अपने कक्ष में रोई। वर्षों से किसी के सामने आँसू नहीं छलके थे, पर उस रात कक्ष की दीपज्योति भी बुझ गई, जैसे किसी आत्मा ने अपने भीतर का दीपदान गिरा दिया हो।

नागऋद्धि की भूमि नागऋद्धि पहुँचने पर उसने मणिदीपा नाम धारण किया। नगर के बड़े नर्तक गृह में जब उसने पहली बार नृत्य किया, तो सारा दरबार मंत्रमुग्ध रह गया। उसकी मुद्राओं में ऐसी स्निग्धता थी कि युद्ध प्रिय राजा

दण्डवाहन भी प्रथम बार मौन रह गया। अगले ही दिन राजा ने आदेश दिया — “इस नर्तकी को राजमहल में बुलाओ। उसके नृत्य में देवलोक की झलक है।

”माधवी ने अपने भीतर धड़कते हृदय को रोकने का प्रयास किया। यही तो उसका अवसर था — उसके लक्ष्य की प्राप्ति का क्षण।

परंतु जब राजा दण्डवाहन उसके समक्ष आया, तो उसके कठोर चेहरे पर करुणा का उजाला देखा।

दण्डवाहन ने कहा — “तुम्हारे नृत्य में केवल सौंदर्य नहीं, दुःख भी है? कौन-सा दुःख तुम्हारी दृष्टि में छिपा है, मणिदीपा?

”माधवी ने निगाह झुका ली — “दुःख वह है, राजन, जो किसी को कहने का अधिकार नहीं।

”उस दिन से उनका संवाद प्रारंभ हुआ। कभी नृत्यगृह में, कभी उद्यान में, कभी सायंकाल नदी तट पर।

उनकी बातों में धीरे-धीरे राजनीति के स्थान पर आत्मा उतरने लगी।

4

ण्डवाहन युद्धपथ का वीर था। उसके हाथों से असंख्य शत्रु नष्ट हुए थे, पर वह भी भीतर से थक चुका था। जब माधवी से संवाद हुआ, तो उसे पहली बार लगा कि युद्ध का अंत भी किसी जीवन का आरंभ हो सकता है।

एक रात, जब मेघों की गरज से नगर कांप रहा था, माधवी उसके समीप थी।

राजा ने कहा — “तुम्हारी आँखों में कोई रहस्य है। तुम नर्तकी नहीं लगतीं, तुम्हारे भीतर कुछ और है।

”माधवी ने काँपती आवाज़ में कहा — “राजन, मैं जो भी हूँ, आज बस माधवी बनकर जीना चाहती हूँ। बस… एक रात के लिए मुझे उस नाम से पुकारो, जो किसी युद्ध का कारण न बने।

”“माधवी…” राजा के होंठों से जब यह शब्द निकला, तो लगता था मानो सदियों का अंतराल मिट गया। माध्वी ने उस क्षण सब भुला दिया — विष, प्रतिज्ञा, या विक्रमकेतु का आदेश।

उसके अस्तित्व में केवल एक सत्य था — प्रेम।

गुप्त सूचना

लेकिन राज्य और रहस्य कभी अधिक दिनों तक साथ नहीं चलते।

विक्रमकेतु के गुप्तचरों ने नागऋद्धि में यह समाचार पहुँचा दिया कि “राजा दण्डवाहन की विशेष प्रिय नर्तकी वही माधवी है, जो धारांश की विषकन्या थी।

”विक्रमकेतु का क्रोध भड़क उठा। वह गर्जित स्वर में बोला —

“उस दासी ने मेरी प्रतिज्ञा का अपमान किया है! यदि उसने अपना कर्तव्य नहीं निभाया, तो लौटने पर उसे मृत्यु दी जाएगी।

”दूतों द्वारा संदेश माधवी तक पहुँचाया गया। वह रात भर महल की छत पर खड़ी रही। उसने चाँद को देखा, और कहा —

“हे ईश्वर, यही तो मेरा जीवन था — किसी के आदेश का साधन बनना! पर मेरे हृदय ने अब किसी और का आदेश मान लिया है।

”वह जानती थी कि अब दो मार्ग हैं — निष्ठा और प्रेम। दोनों में से कोई भी चुनने का अर्थ मृत्यु था।

अगली प्रातः राजमहल में भोज का आयोजन था। दण्डवाहन ने स्वयं माधवी को आमंत्रित किया —

“आज तुम मेरे साथ रात्रि-भोज करोगी। नगर में शांति का उत्सव मनाएँगे।”माधवी मुस्कुराई।

 उसके भीतर एक तूफान था, पर बाहर वह शांत थी। उसने आदेश दिया कि शाही पात्र में वही विषमिश्रित मधुर रस परोसा जाए, जिसे वह वर्षों से पहचानती थी — वही जो मृत्यु का अवतार था।

जब भोज प्रारंभ हुआ, माधवी ने पात्र उठाया। उसकी आँखों में आँसू थे, पर मुस्कुराहट स्थिर रही।

“राजन,” उसने धीरे से कहा, “क्या तुम जानते हो, यह स्वर्णपात्र देवों को प्रसन्न करने के लिए नहीं, बल्कि मृत्यु का आह्वान है?

”दण्डवाहन ने अचकचाकर उसके हाथ पकड़े — “मणिदीपा! यह क्या कह रही हो?

”वह बोली — “मणिदीपा नहीं… माधवी। मैं वह कन्या हूँ, जिसे तुम्हें मारने भेजा गया था। पर अब यह विष तुम्हारे लिए नहीं, मेरे लिए है। क्योंकि जो प्रेम करती है, वह मृत्यु का कारण नहीं बन सकती।

”उसने पात्र को होंठों से लगाया। दण्डवाहन ने उसे रोकना चाहा, पर देर हो चुकी थी।

माधवी का शरीर धीरे-धीरे काँपा, आँखों से एक आँसू छलका, और होंठों पर मुस्कान उभर आई —

“राजन… मेरा विष आज प्रेम में विलीन हो गया.”वह भूमि पर गिरी — सुमेरु  सी चुप्पी के साथ।

शोक और स्मृति के साथ दण्डवाहन ने उसे गोद में उठाया। उस क्षण उसके भीतर का योद्धा मर गया — केवल मनुष्य जीवित था।

अपने मंत्री से बोला — “कोई शव नहीं, कोई शोक नहीं। यह देवी है, जिसने प्रेम को विष से पवित्र किया। उसके लिए स्मारक बनाओ।

”राजधानी के मध्य एक वृक्ष रोपित किया गया — माधवी वृक्ष। कहा गया, उस वृक्ष की जड़ें  उसी धातु-पात्र के साथ बोई गईं, जिसमें माधवी ने विषपान किया था।

वर्षों बीते। वृक्ष बड़ा हुआ। उसके पुष्पों से ऐसी सुगंध आती थी, जो मन को मदहोश कर देती। किंतु यदि कोई उन्हें अत्यधिक सूँघता, तो हल्का चक्कर महसूस करता — मानो मिठास में कोई तीखापन अब भी शेष हो।

5

माधवी के देह त्याग के बाद धारांश और नागऋद्धि के बीच शोक फैला हुआ  था इस गहन शोक का सागर — दोनों दिशाओं में एक ही आर्तनाद सुनाई दे रहा था।

इस घटना के बाद माधवी का शरीर दाह संस्कार में विलीन हो चुका था, पर उसकी स्मृति ने दण्डवाहन के हृदय को जीवित राख बना दिया।

राजमहल में दीप बुझा दिए गए थे, संगीत मौन था और सिंहासन पर बैठा राजा अब स्वयं से अनभिज्ञ एक साधक प्रतीत होरहे थे।

रात्रि का वह क्षण — जब दाह संस्कार की राख हवा में उड़ रही थी — दण्डवाहन ने अपने सेनापति रोझित्य से कहा,-

“क्या तुमने कभी किसी फूल को आग में जलते देखा है ?

“रोझित्य ने धीरे से सिर झुकाया, “राजन, अग्नि में जलकर भी वह सुगंध दे जाता है।

“राजा के अधरों पर एक सूखी मुस्कान फिसल गई, “माधवी वही सुगंध थी। मैं उसे बचा न सका। अब जब तक मैं उस सुगंध की जड़ तक न पहुँचूँ, कोई राज्य, कोई युद्ध, कोई जय मेरी नहीं।

“उसने उसी रात राजमुकुट उतार दिया। करुणा से भीगी आँखों में तेज और वैराग्य का संगम था।

उसने झुककर सेनापति को आदेश दिया — “कल भोर में नागऋद्धि की गद्दी मेरे पुत्र सोमकेतु को सौंप देना। मैं तप का मार्ग ग्रहण कर रहा हूँ।

हिमालय की ओर

ब सूर्य की अंतिम किरणें नागऋद्धि के दुर्ग पर पिघलते हुए ताम्रवर्ण बन रही थीं, उस समय दण्डवाहन ने राजमहल की ओर आखिरी दृष्टि डाली। छतों पर उड़ते कबूतरों की कतारें उसे आशीष-सी लगीं, और दूर मंदिर से आती शंखध्वनि मानो किसी यात्रा का उद्घोष कर रही थी। उसके कंधे पर अब न शस्त्र था, न राजचिह्न — केवल एक कमंडल, जिसमें जीवन का अर्थ समा गया था।  गले में रुद्राक्ष की माला, जिसके प्रत्येक दाने पर माधवी का नाम उकेरा गया था। वह चला — दक्षिण से उत्तर की ओर। मार्ग में पशु-पक्षी मौन थे, वृक्ष जैसे उसकी करुणा सुन रहे थे।

पीठ के पीछे साम्राज्य का वैभव था, सामने अज्ञात हिमवन  मौन था। धरती पर जहाँ-तहाँ गिरते पत्ते उसके पाँवों को आशीर्वाद दे रहे थे। उसका चेहरा अब क्षीण नहीं, बल्कि शांति में दृढ़ था। वह चलते-चलते स्वयं से कहता — “कितना अजीब है यह जीवन। जिसे मैंने मृत्यु दी, उसी ने मुझे अमरत्व का बोध कराया। शायद यही प्रेम का रहस्य है — वह स्वयं को समाप्त करके भी जीवित रहता है।

“तीसरे दिन वह हिमालय के द्वार तक पहुँचा। क्षितिज रजत-श्वेत था, जैसे मेघों में सूर्य का प्रतिबिंब। हवा में बर्फ की तीक्ष्ण गंध और नदियों की गर्जना का मधुर संगम था।

हर मोड़ पर उसे लगता — किसी ने अभी-अभी उसका नाम पुकारा है। वह ठहरता, पर केवल हवा की सरसराहट सुनाई देती।

चतुर्दिक शांति के बीच वह एक संकीर्ण घाटी में पहुँचा। पर्वतीय दर्पण जैसी झील के किनारे एक गुफा थी, जिसके बाहर एक वृद्ध तपस्वी ध्यानमग्न बैठे थे। उनके शरीर पर वस्त्र नहीं, बस बर्फ जैसी रजकण की परतें थीं।

दण्डवाहन आगे बढ़ा और प्रणाम किया। वृद्ध ने धीरे-धीरे नेत्र खोले। उनके नेत्रों में कोई सामान्य दृष्टि नहीं थी — वहां जलते दीपकों-सा प्रकाश था। वे बोले — “राजन्, शरीर का त्याग सरल है, पर स्मृति का त्याग कठिन।

किसकी खोज में आया है तू….?

“दण्डवाहन के अधर काँप उठे। उसने मस्तक झुका लिया और कहा,

“एक स्त्री की, जो विषकन्या थी, पर जिसने विष को प्रेम में गलाकर मुझे जीवन का अर्थ सिखाया।

“तपस्वी ने मंद हँसी में कहा-

“तू उस स्त्री को खोजने नहीं, स्वयं को खोजने आया है। वह तो पहले ही तुझमें विलीन हो चुकी है। भूल मत — प्रेम देह से नहीं, चेतना से बँधता है।

और चेतना को खोजने का मार्ग भीतर से होकर जाता है।

“दण्डवाहन कुछ क्षण मौन रहा। उसने पूछा- “परंतु गुरुदेव, भीतर उतरना कैसे सम्भव है, जब भीतर स्मृतियाँ सर्पों की तरह डँसती हैं?

“वृद्ध तपस्वी ने हिम पर उँगली रखी और कहा,– “देख इस श्वेतता को — इसमें बर्फ है, पर भीतर अग्नि छिपी है। जब तू अपने शोक को समझने लगेगा, तब वह शोक अग्नि बन जाएगा। और जब भीतर की अग्नि जल उठे, तभी साधक सच में जीना सीखता है।

“उन शब्दों में कुछ ऐसा कंपन था कि दण्डवाहन का शरीर थर्रा उठा। वह गुफा के समीप ही बैठ गया।

“मैं यही रहूँगा, महाराज,” उसने कहा। “मेरा राज्य अब यह हिमवन होगा, मेरी रियासत यह मौन ध्वनि।

“वृद्ध ने मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया, “तब आरंभ कर — हर श्वास में माधवी का नाम लो, पर नाम इस तरह लो जैसे वह अपने भीतर से उठ रहा हो, बाहर से नहीं। और जब तू नाम जपते-जपते नाम भूल जाए, तब समझना कि माधवी तुझमें लौट आई है।

❤️❤️❤️❤️

“उस दिन से दण्डवाहन ने अपनी तपस्या प्रारंभ की। चारों ओर बर्फीली शांति थी — पर वह शांति स्थिर नहीं थी; उसमें एक गूंज थी, जैसे किसी दूरस्थ वीणा की लय। वह जप करता — “माधवी… माधवी…”कभी उसके नेत्रों से आँसू गिरते, और वे बर्फ पर मोती बन जाते। कभी वह माधवी की हँसी सुनता, कभी उसके अंतिम शब्द — “मेरा विष आज प्रेम में विलीन हो गया…”

— कानों में प्रतिध्वनित होते।समय जैसे ठहर गया था। दिन और रात्रि का भेद मिट गया।एक दिन हिमवर्षा के बीच उसकी चेतना गहराई में उतरी। उसे लगा कि वह स्वयं भी बर्फ बनता जा रहा है — उसका मन, उसकी देह, उसकी पीड़ा — सब जमकर शांत।

पर उस शांति के भीतर धीरे-धीरे कोई नरम उजाला फूट रहा था।वह उजाला माधवी का चेहरा था। न वे छलकती आँखें, न विष मिश्रित अधर — बस एक दिव्य तेज का आकार।

वह स्वर आया —

“राजन, मैंने कहा था न, प्रेम वहाँ समाप्त होता है जहाँ स्वामित्व आरंभ होता है। तूने मुझे मुक्त किया, इसलिए हम एक हुए।

”दण्डवाहन ने उस प्रकाश को माधवी से प्रणाम किया।

“माधवी, मुझे क्षमा कर कि मैंने तुझे मृत्यु में धकेला।”

“राजन,” स्वर ने उत्तर दिया, “वह मृत्यु नहीं थी, वह अमरत्व का द्वार था। यदि तू न भेजता, तो मैं प्रेम के सत्य को कैसे जानती?”उस क्षण वह सत्य उसकी आत्मा में अंकित हो गया।हजारों बर्फीले कण हवाओं में उठने लगे — जैसे आकाश में दीप जल गये हों। दण्डवाहन के अधरों से अब कोई शब्द नहीं निकल रहे थे, केवल मौन था। और वह मौन प्रेम की भाषा थी।वृद्ध तपस्वी दूर से उसे देखते रहे। उन्होंने मौन में कहा,

“अब यह राजा नहीं, एक योगी है। जिसने विष को वियोग की तपस्या में गलाकर अमृत बना लिया।”बर्फ की ओट में हिमालय की धवल चोटियाँ सूर्य को आलोकित कर रही थीं। और उस प्रकाश में दण्डवाहन की आकृति धीरे-धीरे विलीन हो रही थी — जैसे कोई दीपक हवा में नहीं बुझता, बल्कि प्रकाश बनकर फैल जाता है।और तब से हिमालय की घाटियों में जब भी हवा चलती, उसमें किसी के जप की मधुर ध्वनि सुनाई देती —

“माधवी…”

वह न कोई नाम था, न स्मृति — वह आत्म  साक्षात्कार का एक अनन्त स्वर था।

माध्वी की प्रतिध्वनि

रात हिम से अभिषिक्त थी। आकाश के गहरे नीले परत पर तारों का अनगिनत लोक चमक रहा था। हवा में एक गूढ़ नीरवता थी — ऐसी कि अपने श्वास की ध्वनि तक पराई प्रतीत हो। उस निस्तब्ध श्वेत संसार में तपस्वी दण्डवाहन एक पाषाण पर आसन जमाए बैठे थे।

महीनों की कठोर साधना ने उनके शरीर को सूखा दिया था, किंतु मुख पर कोई करुण तेज था — आँखें बंद थीं, पर उनमें भीतर का ब्रह्मांड सक्रिय था। 

उनके चारों ओर बर्फ से झिलमिलाता तपवन, पिघलती धारा का मधुर स्वर, और दूर कहीं गिरती बर्फ के टुकड़ों की मंद थरथराहट — सब जैसे किसी अदृश्य तानपथ का हिस्सा थे।

उनके भीतर ध्यान की लहरें उठ रही थीं — माधवी का नाम, उसकी मुस्कान, उसका अंतिम क्षण। सब एक-दूसरे में घुलते जा रहे थे।

वह जप करते-करते जैसे इस लोक के पार पहुंचने लगे। तभी एक सूक्ष्म कंपन से हवा काँपी। ऐसा लगा मानो किसी अदृश्य प्राणी ने पृथ्वी के मौन को छू लिया हो।

बर्फ के कण धीरे-धीरे घूमने लगे। उसी क्षण दण्डवाहन के शरीर में एक झटका-सा उठ गया। उन्होंने नेत्र खोले।  आसपास का वातावरण बदल गया था। हवा में वह सुगंध तैर रही थी, जो उन्हें जीवन भर प्रिय रही — वही जो माधवी के केशों से आती थी, मधुर और हल्की विषाक्तता से युक्त, जैसे स्मृति की सुगंध।उनकी दृष्टि आगे ठिठक गई। झील के पार एक श्वेत प्रभामय आकृति उभर रही थी — हल्की, पारदर्शी, पर सजीव। रूपरेखा धीरे-धीरे स्पष्ट हुई— वह माध्वी थी।

आंखों में वही करुणा, वही तेज, पर अब वह कोई सांसारिक रूप नहीं थी — जैसे चाँदनी में बनी हुई कोई दिव्य छवि।

स्वर आया — मंद, पर समस्त वायु में प्रतिबिंबित — “राजन…”दण्डवाहन का हृदय धड़क उठा। उन्होंने दोनों हाथ जोड़ लिए, आवाज कंपित थी —आँख बंद थे वह बुदबुदाया –

“माध्वी! क्या तू सचमुच मेरे सामने है, या यह मेरा भ्रम है?

”माध्वी का मुख मुस्कराया, किंतु उसमें दुख और स्नेह की गहराई घुली थी।

“मैं वही हूँ, जिसे तूने प्रेम से मृत्यु दी थी। तूने सोचा था विष ने मुझे हर लिया — पर वह विष मेरे भीतर अमृत बन गया।

अब मैं विष नहीं, अनुग्रह हूँ। तुमने मेरे भीतर की मृत्यु को पोषित नहीं, मुक्त किया।”उनकी आँखों से अश्रु बह निकले।

“किन्तु मैंने तुझे खो दिया…”

“नहीं, राजन,” माध्वी का स्वर वायु की तरह उनके चारों ओर फैल गया, “जो प्रेम देह से आगे जाता है, वह कभी खोता नहीं।

 मुझे पाने की लालसा ने तुझे भटकाया था, पर अब तू उस सीमान्त तक पहुँचा है जहाँ प्रेम देह से विलग होकर चेतना बनता है।

”दण्डवाहन की दृष्टि उस ज्योति पर स्थिर थी। उनके भीतर शब्द नहीं बन रहे थे, केवल कंपन।

“माध्वी,” उन्होंने कहा, “मैं अब भी तुझे महसूस करता हूँ — तेरी हँसी, तेरे अधर, तेरी आँसुओं की गर्मी तक। यह सब क्या भ्रम है?”माध्वी के होंठों पर हल्की मुस्कान खिली।

“प्रेम वहाँ समाप्त हो जाता है, जहाँ स्वामित्व आरंभ होता है,” उसने कहा।

“तेरा प्रेम अब आध्यात्मिक हो रहा है, पर उसे पूर्ण बनने के लिए त्याग चाहिए — स्मृति का, देह की चाह का, मोह का।

“मोह?” दण्डवाहन ने दोहराया, “क्या किसी से इतनी गहराई में प्रेम करना भी मोह है? ”“जब उसका केंद्र ‘मैं’ हो, तब हाँ,

” माध्वी का स्वर शांत था, “जब प्रेम में ‘तू’ मिट जाए और केवल ‘हम’ बचे, तब वह भक्ति बन जाता है।

मुझे पाने की साधना मत कर, मुझे समझने की साधना कर। जब तू समझ जाएगा कि प्रेम कोई व्यक्ति नहीं, एक स्थिति है, तब मैं तेरे भीतर सदा जीवित रहूँगी।

”हवा की लहर उनसे टकराई। उसकी ठंडक में अनकही ऊष्मा थी।

दण्डवाहन ने महसूस किया, जैसे वह सुगंध उनके चारों ओर एक वृत्त बना रही हो। उनके होंठ काँपे, आवाज फुसफुसाहट बन गई —

“माध्वी… क्या यही अंत है हमारी कहानी का?

“नहीं,” वह बोली, “यही आरंभ है। हमारी कथा अब स्मृतियों में नहीं रहेगी, प्रकृति में रचेगी। मैं तेरी तपस्या का भाग बनूँगी, तेरे प्रत्येक मंत्र में दस्तक दूँगी, और तू जब ध्यानस्थ होगा, तेरे भीतर मेरी ध्वनि गूँजेगी।यह देहों का नहीं, आत्माओं का मिलन है।

”उसकी आकृति और अधिक उज्ज्वल हो उठी। बर्फ के कण उसके चारों ओर घूमने लगे जैसे अग्नि में प्रकाशमाला। भू सतह पर नीली छाया नृत्य करने लगी।

दण्डवाहन ने देखा — उनके कमंडल में बर्फ पिघलकर मृदु झंकार बन गई थी। उन्होंने उसे दोनों हाथों से उठाया, और तीव्र श्रद्धा से भक्ति भरा प्रणाम किया।

“माध्वी,” उन्होंने कहा, “तेरे जाने के बाद दुनिया मेरे लिए मौन हो गई थी। अब मैं जानता हूँ, वही मौन तेरा स्वर है।

तूने विष दिया था, पर उस विष ने मुझे सत्य दिया। मैं अब संसार से मोह नहीं, बस तेरे नाम की साधना करता रहूँगा।”उस क्षण आकाश में जैसे कोई अदृश्य वीणा झंकी। सूक्ष्म स्वर में गूँज उठा —

“सच्चा प्रेम त्याग में खिलता है, और जब त्याग पूर्ण हो जाता है, तब वही प्रेम आत्मा का स्वर बन जाता है।

”दण्डवाहन ने आँखे मूँद लीं। अनुभव ऐसा हुआ, जैसे कोई शीतल हवा उनके कपोलों को छूते हुए भीतर उतर गई हो।

वह कंपन उनके सारे शरीर में फैल गया।जब नेत्र खोले, तो वह दृश्य जा चुका था।

बर्फ पर केवल एक हल्की उजली आभा थी, जैसे किसी ने दीप जलाकर पीछे हवा में छोड़ दिया हो।कुछ क्षण मौन बीता।

फिर दण्डवाहन के होठों के पास एक शांति फैल गई, जिसमें कोई दुःख नहीं रहा।

उन्होंने कमंडल को भूमि पर रखा और धीरे-धीरे बर्फ की ओर झुक गए। उनकी आँखों से आँसू झर गए, लेकिन इन आँसुओं में पीड़ा नहीं थी; कोई कोमल गरमाहट थी — जैसे वर्षों का बोझ उतर गया हो।उन्होंने धीमे स्वर में कहा —

“अब मैं जानता हूँ कि प्रेम मृत्यु नहीं, मुक्ति है। जिसने प्रेम किया, वह केवल जीवित नहीं होता — वह शाश्वत हो जाता है।

”उस क्षण हिमालय की दिशाओं में रहस्यमय ध्वनि गूँजी। झरनों की लय बढ़ गई, दूर के वृक्ष हौले-से झूम उठे।

मानो स्वयं प्रकृति इस नवबोध में सहभागी हो गई हो।

रात के उस श्वेत मंच पर दण्डवाहन ध्यानस्थ हो गए। उनके चारों ओर वायु में हल्की सुगंध बनी रही — कभी मंद, कभी सघन। अब वह सुगंध माध्वी का नहीं, समग्र अस्तित्व का प्रतीक थी।

समय जैसे थम गया। घंटों बाद जब पूर्व दिशा में सूर्य की पहली किरण पड़ी, तो उसका सुनहरा प्रकाश बर्फ पर पड़कर उसी आभा को पुनर्जीवित कर गया, जिसमें माध्वी खड़ी थी।

दण्डवाहन ने आँख मूँद लीं और मन ही मन जपा —

“तू गई नहीं, तू रूपांतरित हुई है।

जिस क्षण मैं भीतर उतरता हूँ, तू वहीं मिल जाती है।

❤️❤️❤️❤️

”वह तपस्वी नहीं रहा अब; वह एक ज्योति था, जो प्रेम को भक्ति में बदल चुका था। बर्फ पिघल रही थी, उसकी बूंदें उनके चरणों को धो रही थीं — जैसे प्रकृति स्वयं उनका स्नान करा रही हो। तब से उस घाटी को लोग “प्रतिध्वनि तपवन” कहने लगे — जहाँ हर वायु के साथ किसी के नाम की ध्वनि तैरती थी।

और जब भी रात्रि में हवा चलती, कोई कानों में फुसफुसाकर कहता-सा प्रतीत होता —“प्रेम वहाँ समाप्त हो जाता है, जहाँ स्वामित्व शुरू होता है।”वह केवल एक वाक्य नहीं, जीवन का सूत्र था।

और तब दण्डवाहन ने अंतिम बार आसमान की ओर देखा — शून्य, किन्तु उसी शून्य में माध्वी की गंध, माध्वी का अस्तित्व, और प्रेम का शाश्वत स्पंदन था।

वह समझ चुका था — प्रतिध्वनि केवल सुनाई नहीं देती, वह भीतर जीती रहती है।

वन की कथा

प्रकृति  ने अपना आवरण बदल लिया था! आकाश में ऋतुओं का क्रम घूम चुका था; पर्वतों पर बर्फ का रंग पीला से फिर श्वेत हो गया था। पर उस हिमवन की एक गुफा में, जहाँ पहले एक राजसी पुरुष मौन साधना में बैठा था, अब एक साधु की कथा जीवित थी।

लोग उसे “राजऋषि” कहते थे, पर कोई उसका पुराना नाम नहीं जानता था। केवल इतना सुनने में आता था कि उसने कभी एक स्त्री से इतना प्रेम किया कि उसे मृत्यु देना और जीवन देना — दोनों एक साथ सीखा।

गाँवों और आश्रमों में उसका नाम आदर से लिया जाने लगा। जो भी उसके पास आता, लौटते समय अपने भीतर कुछ हल्का महसूस करता — उसका सारा बोझ उतर जाता।

कहा जाता है, वह साधु अपने शिष्यों को धर्म नहीं, प्रेम सिखाता था।हिमालय की गोद में उसकी कुटी एक विशाल पीपल के नीचे थी। चारों ओर बर्फीले देवदारों की पंक्तियाँ थीं; उनके बीच छोटी जड़ी-बूटियों के समूह खिलते रहते।

उसकी कुटी के बाहर एक जलधारा बहती थी, जो हल्की पीतवर्ण रेत पर झिलमिलाती, मानो सूर्य की चूड़ियाँ हों।

वह जलधारा ही उसकी संगिनी थी। जब वायु चलती, धारा झंकृत होकर जैसे उसका नाम गुनगुनाती — “दण्डवाहन…”एक दिन भोर में जब धुंध अभी धरती से चिपकी थी, एक युवा सन्यासी वहाँ पहुँचा। उसकी दृष्टि में उत्सुकता थी, और मुख पर ज्ञान की भूख। उसने झुककर प्रणाम किया।

“गुरुदेव,” उसने कहा, “आपके नाम का यश समुद्रों के पार तक फैल चुका है। कहा जाता है, आपने धर्म से ऊपर एक नये अर्थ को जन्म दिया है — प्रेम।

”राजऋषि मुस्कुराए। उनका चेहरा अब शांत और उदासीन दोनों था, जैसे किसी झील पर चंद्रमा की प्रतिछाया हो।

“पुत्र, जो प्रेम को समझ ले वही धर्म को भी समझ लेता है। बाकी सब पूजा और ग्रंथ केवल आवरण हैं।

“पर गुरुदेव,” युवक का स्वर काँप उठा, “कहते हैं, आप पहले राजा थे — क्या यह सत्य है?”

“सत्य वही है जो हृदय स्वीकार कर ले,” उन्होंने कहा।

“राजपद, वैभव — वह सब तो माया थी। जब किसी ने मुझसे मृत्यु में प्रेम बताया, तभी मुझे राजपद का अर्थ समझ आया — सेवा। अब वही मेरा धर्म है।

”युवक ने कुछ सोचकर पूछा,

“गुरुदेव, क्या संसार में विषकन्याएँ अब भी होती हैं?”राजऋषि की दृष्टि क्षितिज में खो गई। बर्फीली हवा में उनका स्वर बह गया,

“हाँ, पुत्र — हर वह हृदय जो प्रेम से डरता है, वही विषकन्या बन जाता है।

जहाँ भय है, वहाँ विष है। पर जब वही हृदय स्वयं को देने लगे, वहाँ विष गल जाता है, और देवत्व जन्म लेता है।

”युवक विस्मय से बोले, “तो क्या किसी ने आपको प्रेम से मुक्त किया?

”उन्होंने मृदुल स्वर में कहा — “नहीं, उसने मुझे प्रेम से बाँधा नहीं, प्रेम में विलीन कर दिया।

”फिर उन्होंने अपनी माला उठा ली —

“देखो,” बोले, “इस माला के हर दाने में माध्वी का नाम अंकित है। हर दाना एक स्मृति है — कभी पीड़ा, कभी क्षमा, कभी करुणा। जब मैं इस माला को फेरता हूँ, तो केवल नाम नहीं जपता — मैं उन सभी भावों को जपता हूँ, जो मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं।

”युवक स्थिर खड़ा रहा। उसके नेत्रों से आँसू बह निकले।

“गुरुदेव… प्रेम का यह रूप मैंने कभी नहीं सुना।”राजऋषि मुस्कुराए।

“इसलिए तो मनुष्य अशांत है, पुत्र। वह प्रेम को या तो भोग मानता है, या त्याग। जबकि प्रेम न तो भोग है, न त्याग — वह एक सतत प्रवाह है। जैसे यह नदी — इसे रोकोगे तो कुंठा बनेगी, बहने दोगे तो शुद्धि।

”संध्या के समय कुटी के बाहर कुछ ग्रामीण लोग भिक्षा अर्पित करने आए। वे वन के लोग थे — उनके चेहरों पर सादगी थी पर आँखों में आस्था।

एक वृद्धा आगे बढ़ी।

“महाराज,” उसने कहा, “हमने सुना है आप तपस्वी हैं, पर हम आपमें किसी राजसी तेज की झलक देखते हैं। आप कौन हैं?

”राजऋषि ने हँसकर कहा,

“मैं वही हूँ जो प्रेम से स्पर्शित हुआ और पहचान खो बैठा। पहले मुझे नाम था, अब केवल स्मृति हूँ।

जब तक मनुष्य नाम से जीता है, वह विभाजित रहता है। जब स्मृति से जीने लगता है, वह एकाकार हो जाता है।

”गाँव की स्त्रियाँ उनके चरणों में फूल रख गईं। तभी आसपास के देवदारों से पक्षियों का समूह उड़ता दिखाई दिया। नीला आसमान उनके पंखों से भर गया।

राजऋषि ने आकाश की ओर देखकर कहा,

“देखो, यही है प्रेम। कोई पंछी किसी सीमा रेखा को नहीं जानता, फिर भी सब संग उड़ते हैं। मनुष्य ने हर सीमा प्रेम से तोड़ी, और हर सीमा भय से बनाई। अगर भय मिटा दो, तो प्रेम मुक्त रहेगा।

”समय आगे बढ़ा। धीरे-धीरे उसके पास शिष्य बढ़ने लगे — कुछ ब्राह्मण, कुछ क्षत्रिय, कुछ वन के शिकारी और कृषक। कोई पूछता — “गुरुदेव, धर्म क्या है?”

वह उत्तर देते — “जहाँ करुणा है, वही धर्म है।”एक दिन उन्होंने सबको माध्वी की कथा सुनाई। उस कथा में उन्होंने किसी को दोषी नहीं ठहराया — न स्वयं को, न नियति को।

“वह स्त्री मुझे हत्या के लिए भेजी गई थी,” उन्होंने कहा, “पर उसने मुझे जीवन दिया। वह जिसके शरीर में विष था, उसने मेरे हृदय का विष पिघला दिया। प्रेम ने हमें मरने नहीं दिया — उसने हमें देखना सिखाया!

”शिष्य मौन सुनते रहे। किसी के अधर पर प्रश्न आया, “क्या वह अब भी कहीं है, गुरुदेव?”राजऋषि ने झील की ओर देखा।

“हाँ, वह हर उस फूल में है जो खिलते समय काँपता है, हर उस मन में जो प्रेम से डरता है।  याद रखना, विषकन्याएँ मिट नहीं जातीं — वे प्रेम की परख के लिए जन्म लेती हैं। और जो उन्हें समझ लेता है, वही मुक्त हो जाता है।

”रात्रि ढली। दीयों की लौ कांपते हुए स्थिर हुई। आकाश में बादल छंटे तो अर्धचंद्र निकल आया। उस चाँदी-से परिदृश्य में दण्डवाहन अपने शिष्यों के बीच बैठे हुए थे।

“गुरुदेव,” एक वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, “हमने शास्त्रों में पढ़ा है कि आत्मा को मुक्ति ज्ञान से मिलती है। आप कहते हैं कि प्रेम ही मुक्ति है। क्या दोनों भिन्न हैं?

”राजऋषि ने धैर्यपूर्वक कहा,

“ज्ञान बिना प्रेम अधूरा है। ज्ञान प्रकाश है लेकिन ठंडा; प्रेम ऊष्मा है पर दिशा-रहित। जब दोनों मिलते हैं, तब जीवन संतुलित होता है। वही संतुलन ईश्वर है।

”उन्होंने एक प्रसंग बताया:

“कभी मैं भी सोचता था कि प्रेम एक दुर्बलता है, शत्रुओं के बीच बाधा। पर जब माध्वी ने विषपात्र उठाया, मैंने जाना — प्रेम दुर्बलता नहीं, अंतिम बलिदान है। वह जो अपना अस्तित्व खोकर दूसरे को आशीष दे दे, वही सच्चा धर्म है।

”उनकी आवाज में हल्की कंपकंपी थी। पर भीतर से करुणा की गहराई झलक रही थी।

शिष्यगण शांत बैठे रहे — जैसे कोई गंगा अपनी धार को सुन रहा हो।कई वर्षों बाद जब राजा और साधु की सीमाएँ पूरी तरह मिट गईं, तब उसकी कुटी “करुणावन आश्रम” कहलाई।

वहाँ आने वाले हर यात्री के लिए एक माला होती थी — मिट्टी के दानों की। हर दाना किसी प्रार्थना, किसी स्मृति, किसी क्षमा का प्रतीक था।जो उस माला को फेर लेता, वह हल्का हो जाता।

कोई पूछता, “गुरुदेव, ये दाने इतने शोभायमान क्यों लगते हैं?”

वे बताते, “क्योंकि ये आँसुओं से गीले हुए हैं। प्रेम के आँसू मिट्टी को सोना बना देते हैं।

”धीरे-धीरे निकट के गाँवों में परिवर्तन दिखा।वहाँ झगड़ों की जगह संवाद बढ़ने लगे। लोग कहते —“राजऋषि कहते हैं, जो भी प्रेम से बोले, वह असत्य नहीं बोल सकता।

”एक दिन संध्या बेला में जब सूर्य ढल रहा था, दण्डवाहन अकेले बैठे थे। हवा में वही पुरानी सुगंध तैर गई।

दूर नदी के किनारे एक युवती जल ले रही थी। उसकी देह-भंगिमा, उसकी आँखे, उसकी मुस्कान — सब में उन्हें माध्वी की झलक दिखी।

वह मुस्कुराए, बोले, “तू फिर लौट आई, माध्वी? अब किसी रूप में बंध कर नहीं, चेतना बनकर।

उत्तर सुनाई दिया —

“मैं कभी गई नहीं थी राजन, बस प्रसंग बदल गया।

”अब उनकी करुणा इतनी व्यापक थी कि फूलों तक में उनकी वाणी बसी थी। जब कोई पुष्प झिलमिलाता, तो उसकी पंखुड़ियाँ हल्के से हिलतीं — जैसे माला के दाने।

दण्डवाहन की दृष्टि मृदु थी, पर उसमें एक संपूर्णता की झलक थी।अंततः उनके शिष्य और ग्रामीण सभी उन्हें ‘प्रेमयोगी’ कहने लगे।

एक बार जब उनसे पूछा गया —

“गुरुदेव, क्या यह वन आप ही ने बसाया?”

उन्होंने कहा —

“नहीं, यह वन स्वयं बस गया था, जब मैंने अपने भीतर के विष को विसर्जित किया। यह वन उसी क्षमा का स्वरूप है। इसे मेरे नाम से नहीं, उस स्त्री की स्मृति में जानो, जिसने सिखाया कि मृत्यु भी प्रेम की भाषा बोल सकती है।

”उस दिन से उस जगह का नाम पड़ा — माध्वीवन।

लोग कहते हैं, जब भी उस वन में वसंत आता है, तो हवा में हल्की विषगंध घुल जाती है। वह गंध न तो भय देती है, न मादक करती है — बस याद दिलाती है कि प्रेम की सुगंध हमेशा त्याग से जन्म लेती है।

वर्षों बाद जब राजऋषि समाधिस्थ हुए, तो उनके शिष्यगण ने उनकी माला को नदी में विसर्जित कर दिया।

कहा जाता है, उस दिन नदी का रंग हल्का सुनहरा हो गया था। कुछ लोगों ने तो आसमान में दो पल भर के लिए एक श्वेत-नीली आकृति देखी — जैसे कोई पुरुष और स्त्री मिलकर आलोक बन गए हों।

तब से हर भोर उस नदी के जल में हल्की चमक देखी जाती है, और जब सूर्य उदय होता है, लोग उसके सामने हाथ जोड़ते हुए कहते हैं —

“जय माध्वी-राजऋषि की — जिन्होंने विष को प्रेम बना दिया।”

पुनर्जन्म की दहलीज़

हुत काल बीत चुका था। युगों के परिवर्तन, लोकों के उलटफेर, और समय के अविरल प्रवाह में कब खो गई थी, इसकी कोई स्मृति नहीं रही।

शायद हर मृत्यु, हर जन्म अपने बीच की स्मृतियों को मिटा देता है, पर आत्मा का एक हिस्सा — वह जो प्रेम से बना है — कभी नहीं मरता।

 उस दिन जब ब्रह्मलोक के विस्तृत आलोक में प्रकाश आया, तो उसने कहा —

“अब तेरा विधान पूर्ण हुआ, माधवी। अब तू पुनर्जन्म पा सकती है।” उसकी आँखों में एक ऐसी नीरवता देखी जिसमें सृष्टि की समूची भाषा छिपी थी।

उसके भीतर एक प्रश्न उठा —

“क्या अब  मुझे फिर वही जीवन जीना होगा? वही श्रम, वही दुख, वही वियोग?

”प्रकाश मुस्कुराया।

“पुनर्जन्म तुझे वही नहीं देता जो तू भोग चुकी है, वह तुझे देता है — नई अनुभूति। तू चाहे तो फिर राज्य की रानी बन सकती है, या दासी, या योगिनी। पर अब तेरे भीतर का संकल्प ही तेरा भाग्य लिखेगा।

”उसने गहरी साँस ली। चारों ओर अनगिनत दीप जल रहे थे, जैसे आत्माएँ अपने नए मार्ग के लिए तैयार हों।

तभी माधवी ने कहा —

“मैं मानव बनना चाहती हूँ, पर इस बार किसी राज्य की दासी नहीं, किसी के हृदय की आलोक बनना चाहती हूँ।”प्रकाश ने अपनी हथेली खोली। उसमें स्वर्णज्योति का एक बिंदु चमका —

“तो जा, अपने सत्य की खोज कर। प्रेम की धारा में तेरा स्वर फिर बहने को तैयार है।”और फिर उस ज्योति ने उसके चारों ओर घूमते हुए एक अजाने दृश्य में विलीन कर दिया।

गोधूलि का बेला में जब उसकी चेतना लौटी, तो वह गोधूलि के रंग में रंगी एक धरती पर थी। सांझ के धुएँ और धूप का संगम मानो किसी पवित्र प्राण की तरह फैल रहा था। गाँव की हवाएँ मिट्टी की सोंधी गंध से भरी थीं, कहीं दूर बैलों की घंटियाँ बज रही थीं, और आँगन में किसी लड़की की हँसी गूंज रही थी।

धीरे धीरे वह बालिका — शायद तेरह चौदह की हो गयी — अपने छोटे से आँगन में फूल चुन रही थी। उसके हाथों में सफेद-गुलाबी रंग के पुष्प थे — वही ‘माधवी वृक्ष’ से झरे हुए फूल। हर फूल से हल्की-सी सुगंध उठती जाती, और जब वह झोले में गिरता, तो एक लहर-सी उसके चेहरे को छू जाती।उसी क्षण, उसे अपने भीतर एक अनकही पहचान मिली। वह सुगंध, वह लहर — वह फूस फुसा उठी क्या यह मैं ही हूँ ।

उसे महसूस हुआ “मैं लौट आई हूँ,” उस गन्ध ने उसके कानों में फुसफुसाया।बालिका ने चौककर फूलों को देखा, फिर मुस्कुरा दी।

“इन फूलों में कुछ अजब सी मिठास है,” उसने अपनी दादी से कहा, “पर साथ ही कोई तीखापन भी। जैसे कोई बात खुश कर दे और फिर रुला भी जाए।

”उसकी दादी हँस पड़ीं, “माधवी के फूल ऐसे ही होते हैं बिटिया, मधुर और तीक्ष्ण — जैसे प्रेम। उसे सहेजना जानो, तो जीवन महकता है, और अनदेखा करो, तो काँटे बन जाता है।

”बालिका सोच में पड़ गई। उसकी आँखों में संध्या का रंग उतर आया।स्मृति के बीज दिन बीतते गए, और हर शाम वह वैसी ही गोधूलि में माधवी के फूल चुनती।

पर हर बार उसे लगता, इन फूलों में कोई “कहानी” बसी है। कभी उस सुगंध से उसकी पलकें झपकने लगतीं, कभी वह अपने ही नाम “मधुरा” को किसी और स्वर में सुन लेती — मानो कोई भीतर से उसे पुकार रहा हो।

धीरे-धीरे वह अपने आप में विचित्र परिवर्तन महसूस करने लगी। जब गाँव की कलछौंयों ने नदी में पानी भरते हुए गीत गाए, तो मधुरा को लगा कि वे गीत उसने कहीं सुने हैं — शायद किसी और जन्म में।

एक रात, जब सावन का मेघ गरजा, वह बिस्तर से उठी और बरामदे में चली आई। सामने माधवी वृक्ष था, जिसकी डालियों से वर्षा की बूँदें गिर रहीं थीं।

उसने वृक्ष को निहारा —

“तू मुझे क्या कहना चाहता है?”अचानक हवा चली, और एक सूखा पुष्प उसके गाल से टकराया।

उसी क्षण उसके भीतर से एक स्वर उठा —

“मैं वही  हूँ, जिसने कभी किसी राज्य में प्रेम किया था। आज उसी प्रेम की लौ बनकर तेरे भीतर जल रही हूँ।”मधुरा काँप उठी।

“कौन ?” उसने फुसफुसाया।उत्तर भीतर से ही आया —

“वह जो प्रेम करना जानती थी, पर जीना नहीं जानती थी। जिसने अधूरा रहकर भी अमरता पाई।”सहजज्ञान का जागरण समय के साथ मधुरा बड़ी हुई। उसकी चाल में एक गंभीरता थी, उसकी आँखों में अनुभव की सिंचित गहराई।

 

गाँव वाले अक्सर कहते, “यह छोरी तो जैसे किसी पुराने युग की आत्मा हो।”वह खेतों में जाते हुए मौन रहती, पर हवा से बातें करती। कभी किसी नदी किनारे बैठकर मिट्टी पर उँगलियाँ फेरती और उनमें अनाम आकृतियाँ बनाती। उसे न किताबों का मोह था, न बाज़ार की चकाचौंध का।

वह कहती — “मुझे बस माधवी के फूल चाहिए, बस वही मेरी पूजा हैं।”एक बार उसका पिता, राघव, जो सौम्य किसान था, मुस्कुराकर बोला —

“बिटिया, इन फूलों में ऐसा क्या है जो तू रोज़ इन्हें चुनती है?

”मधुरा बोली, “इनमें कोई याद बसती है, कोई सांस, जो मुझसे बात करती है पर दिखाई नहीं देती।

”राघव ने उसकी ओर देखा — कुछ क्षण मौन रहा, फिर बोला, “कभी किसी प्राण की याद इतनी गहन हो जाए, तो वह पुनः जनम लेती है।

शायद तू उसी को सुन पाती है।”मधुरा झुक गई — “तो क्या आत्मा सचमुच लौट आती है?”

“हाँ,” राघव ने कहा,

 “पर केवल वह जो अपूर्ण रह जाती है।

”प्रेम का पुनः अवतरण।

❤️❤️❤️❤️❤️

क दिन गाँव में नये अध्यापक आए — अर्णव।

वे नगर से पढ़े-लिखे युवक थे, पर आँखों में एक उदासी थी जैसे किसी ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया हो। जब मधुरा पहली बार उनसे मिली, तो वह ठिठक गई।वह न जाने क्यों, उन्हें देखती रही।

अर्णव भी उसके पास आए तो बोले —

“तुम माधवी के फूल चुन रही हो?”

“हाँ,” मधुरा मुस्कुराई, “इनमें कोई बात है जो मन को छू जाती है।

अर्णव के चेहरे पर हल्की कंपकंपी आयी।

“इन फूलों की गंध मुझे भी कहीं दूर ले जाती है… पर कहाँ, यह नहीं जानता।

”उस दिन के बाद से दोनों की मुलाक़ातें बढ़ीं। शब्द कम होते गए, पर मौन गहरा होता गया। जब कभी वे किसी पेड़ तले बैठे रहते, तब हवाओं में वही पुरानी सुगंध फैल जाती — वही जो यशोदा ने अपने अंतिम जीवन में महसूस की थी।

एक शाम अर्णव ने कहा, “कभी-कभी लगता है तुम्हें बहुत पहले किसी और समय से जानता हूँ। यह पहचान नई नहीं।

”मधुरा ने चुपचाप फूलों की पंखुड़ियाँ उँगलियों के सिरों से रगड़ते हुए कहा, “तो शायद हम वही हैं — वही जो अधूरे थे, और जिन्हें फिर मिलने का वरदान मिला।

”उसके होंठों से बोले गए शब्द जैसे समय के पार किसी प्रतिध्वनि से जुड़े हों — ब्रह्मलोक में जहाँ प्रकाश ने कहा था, “जा, अपने सत्य की खोज कर।

”धूप की देहरी और स्मृति का आलोक माधवी का वृक्ष अब हर वर्ष और अधिक फूल देता था।

पूरा गाँव जानता था कि जब वह वृक्ष खिलता है, तब हवा में एक अनोखी मिठास भर जाती है। पर मधुरा के लिए वह मिठास अब दर्द का रूप लेने लगी थी।

एक रात उसने सपना देखा — वही राज्य, वही प्राचीन प्रासाद, जहाँ वह कभी माधवी थी। वह किसी वीर पुरुष के प्रेम में थी, पर परिस्थितियाँ उन्हें अलग कर गईं।

मृत्यु ने उसे छीन लिया, और उसका अधूरा प्रण हवा में बिखर गया।सुबह जब वह नींद से उठी, उसके हाथों में वही सपने का फूल था — वही सुगंध, वही पीड़ा।

उसने उसे अर्णव को दिया —

“यह फूल उस प्रेम का प्रतीक है जो कभी मरा नहीं।”अर्णव ने मुस्कुराकर कहा, “फिर तो हमें इसे सहेज लेना चाहिए, ताकि यह अधूरा न रह जाए।

”मधुरा बोली, “कभी-कभी अधूरापन ही पूर्णता है। अगर सब कुछ पा लिया जाए, तो फिर जन्मों का अर्थ क्या रह जाए?”

अन्तर्देश की पुकार कई वर्ष बीत गए। गाँव के लोग कहते कि माधवी का वृक्ष अब बोलता है।

उसकी डालियाँ जब हिलतीं, तो मानो दो आत्माएँ फुसफुसातीं — एक माधवी की, एक मधुरा की।कभी हवा में बुलाते हुए स्वर आता, “मैं वही हूँ जिसने प्रेम में मृत्यु भी स्वीकार की थी।”

दूसरा स्वर उत्तर देता, “और मैं वही हूँ जिसने मृत्यु के पार फिर उसी को देखा।

”धीरे-धीरे मधुरा ने सांसारिक मोह त्याग दिया। वह कहती — “पुनर्जन्म कोई सजा नहीं, बल्कि दूसरे अवसर की करुणा है।

जब प्रेम अधूरा रह जाता है, तो वही हमें लौटाता है।

”वह गोधूलि में बैठी फूल चुनती रहती — पर अब वे फूल आत्माओं के संवाद बन चुके थे। और हर शाम जब हवा में वह सुगंध फैलती, गाँव की दादी कहतीं, “यह कौन लौट आई है।

”पुनर्मिलन की बेला बरसों पश्चात जब अर्णव वृद्ध हुआ, और मधुरा भी समय की थकान से झुकने लगी, दोनों माधवी के वृक्ष तले बैठे।

सूर्य अस्त हो रहा था, और आकाश का रंग वैसा ही था जैसा उस दिन था जब पुनर्जन्म की यात्रा शुरू हुई थी।मधुरा ने कहा, “क्या तुझे याद है, वह दिन जब तूने पहली बार ये फूल देखे थे?”

अर्णव ने मुस्कुराकर कहा, “तब इनकी गंध ने मेरे भीतर जिसे जगाया था, शायद वही अब मुझे शांत कर रही है।

”मधुरा ने हवा से कहा, “प्रकाश, मैंने अपना वचन निभाया। इस बार मैं किसी राज्य की दासी नहीं हुई — मैं किसी के हृदय की आलोक बनी।

”फिर उसने अपनी आँखें बंद कीं। हवा में पुष्प झरे।

अर्णव ने उसकी हथेलियों को थामा — और उसी क्षण माधवी वृक्ष की डालियाँ झुकीं, जैसे सृष्टि ने दो आत्माओं के पुनर्मिलन को प्रणाम किया हो।

आत्मा का वृत्तकहते हैं, उस गाँव में आज भी वह वृक्ष खड़ा है — न बहुत बड़ा, न बहुत छोटा, पर सदा फूलों से लदा। हर गोधूलि में उसकी डालियों से वही गंध आती है — मीठी, पर थोड़ी तीखी।जब कोई बालिका उन फूलों को चुनती है और कहती है, “इनमें अजब मिठास है,” तो हवा में एक आवाज़ उठती है —

“मैं लौट आई हूँ।”और शायद यहीं इस कथा का रहस्य है —

हर आत्मा को वह क्षण फिर मिलता है जब वह अधूरी रह गई थी।

हर प्रेम, चाहे पिछले जन्म का क्यों न हो, किसी न किसी रूप में लौट आता है —कभी गंध बनकर, कभी आँसू बनकर,

पर लौटता अवश्य है, ताकि आत्मा पुनः अपनी दहलीज़ पार कर सके।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *