स्मृतियों में बसा ‘डाक चाचा’:खाकी वर्दी वाला देवदूत
“डाकिया” शब्द कानों में पड़ते ही, आज से कुछ वर्ष पहले का वह शांत, किंतु जीवंत दृश्य मानस पटल पर साकार हो उठता है। आँखों के समक्ष खाकी का वह…
दीपावली पर विशेष: अब मिट्टी के घरौंदे नजर नहीं आते
मैं छोटे-छोटे फूल चुन चुन कर बाउंड्री पर लगाती, कभी आम के पत्ते तो कभी गेंदा के गुछे। घरौंदे के द्वार पर तिनकों और रंगीन कागज से ‘स्वागतम्’ लिखती। सूख…