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विष्कन्या का प्रेम : विष से विदेह तक: विनोद आनंद के उपन्यासों में मिथक, संवेदना और नवीन दृष्टि का अनुशीलन

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May 3, 2026
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विनोद आनंद की साहित्यिक प्रतिभा की सराहना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि उन्होंने पत्रकारिता की वस्तुनिष्ठता और साहित्य की भावुकता का एक दुर्लभ संतुलन साधा है। वे न केवल एक कथाकार हैं, बल्कि एक समाजशास्त्री भी हैं जो यह देख पा रहा हैं कि भौतिकवादी युग में हम प्रेम और संवेदना के मूल स्वरूप को खोते जा रहे हैं। ‘शकुंतला की मातृ-चेतना’ में मातृत्व को जिस प्रकार एक ‘वैश्विक रक्षा तंत्र’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, वह लेखक की विराट चेतना का प्रमाण है। अंततः, यह उपन्यास संकलन हिंदी साहित्य की उस दार्शनिक परंपरा को समृद्ध करता है जो व्यक्ति को उसकी तुच्छता से उठाकर विराटता की ओर ले जाती है। यह एक ऐसी कृति है जो पढ़ने के बाद समाप्त नहीं होती, बल्कि पाठक के भीतर एक वैचारिक मंथन के रूप में जीवित रहती है।

 

डॉ.शिवनंदन प्रसाद सिन्हा

रिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार विनोद आनंद का लघु उपन्यास संकलन, जिसमें ‘विषकन्या का प्रेम’ और ‘शकुंतला की मातृ-चेतना’ सन्निहित हैं, समकालीन हिंदी साहित्य की एक युगांतकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जा सकता है। यह कृति केवल कथा का विस्तार नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी व्याख्याओं के विरुद्ध एक दार्शनिक हस्तक्षेप है।

लेखक ने प्राचीन इतिहास और पुराणों के उन धुंधले पृष्ठों को अपनी कल्पना और मानवीय संवेदना की स्याही से पुनर्जीवित किया है, जहाँ स्त्री को केवल सत्ता के खेल में एक मोहरे या ‘जीवंत अस्त्र’ के रूप में देखा जाता था। विनोद आनंद की प्रतिभा का वैशिष्ट्य इसी में है कि वे ‘विषकन्या’ जैसी घातक और नकारात्मक छवि को तोड़कर उसके भीतर धड़कती मानवीय आकांक्षाओं, प्रेम की अतृप्त प्यास और आत्मिक संघर्ष को केंद्र में ले आते हैं।

यहाँ विष केवल शरीर का गुण नहीं, बल्कि उस राजनीतिक कुटिलता और साम्राज्यवादी लिप्सा का प्रतीक है, जो एक मासूम बालिका माधवी को उसके अस्तित्व से बेदखल कर उसे मृत्यु का साधन बना देती है।

​विनोद आनंद की लेखन शैली और बिम्ब विधान इस उपन्यास को एक विशिष्ट साहित्यिक ऊंचाई प्रदान करते हैं। उनकी भाषा परिष्कृत, तत्सम प्रधान और काव्यात्मक संवेदना से ओतप्रोत है, जो पाठक को अनायास ही उस प्राचीन कालखंड में ले जाती है जहाँ धर्म, नीति और व्यक्तिगत भावना के बीच निरंतर द्वंद्व चलता रहता है। लेखक ने ‘बिम्बों’ का जो प्रयोग किया है, वह अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावोत्पादक है।

उदाहरण स्वरूप, ‘माधवी वृक्ष’ का बिम्ब केवल एक वनस्पति का चित्रण नहीं है, बल्कि वह शुद्धि, अमर प्रेम और प्रकृति में विलीनीकरण का जीवंत रूपक है। वृक्ष की सुगंध में मिठास और तीखेपन का मिश्रण प्रेम की उस वास्तविकता को दर्शाता है जिसमें आनंद और पीड़ा दोनों का सह-अस्तित्व है। इसी प्रकार, ‘विष-पात्र’ को जड़ में दफन करना इस बात का प्रतीक है कि जब प्रेम का अंकुरण होता है, तो वह समस्त विकारों को आत्मसात कर उन्हें सृजन में बदल देता है। लेखक की शैली में एक गजब का प्रवाह है, जहाँ संवाद संक्षिप्त होते हुए भी दार्शनिक गहराई लिए हुए हैं। “देह त्यागना सरल है, पर स्मृति त्यागना कठिन” जैसे वाक्य पाठक के अंतर्मन में लंबे समय तक अनुगूँज पैदा करते हैं। साहित्य के प्रति विनोद आनंद का दृष्टिकोण अत्यंत नवीन और क्रांतिकारी है।

वह प्राचीन मिथकों को आधुनिक ‘एजेंसी’ (Agency) के साथ जोड़ते हैं। उन्होंने ‘विषकन्या’ और ‘शकुंतला’ दोनों ही चरित्रों के माध्यम से स्त्री के ‘साधन’ से ‘साध्य’ बनने की यात्रा को चित्रित किया है। उनकी दृष्टि में प्रेम केवल देह का मिलन या अधिकार भाव नहीं है, बल्कि वह मुक्ति का एक मार्ग है। जब माधवी शत्रु राजा दण्डवाहन को मारने के बजाय स्वयं विषपान कर लेती है, तो वह पुरुष-सत्तात्मक राजनीति की पूरी बिसात को पलट देती है। यहाँ लेखक यह स्थापित करते हैं कि प्रेम की एक बूंद राजनीति के विषैले सागर को पवित्र करने की सामर्थ्य रखती है।

उनकी यह ‘नई दृष्टि’ स्त्री-विमर्श को केवल विरोध तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे एक आध्यात्मिक और दार्शनिक गरिमा प्रदान करती है, जहाँ स्त्री अपनी नियति की स्वयं रचयिता बनती है। अकादमिक दृष्टिकोण से यह कृति’मिथक-परिवर्तन’
(Myth-Remaking) के सिद्धांतों को समझने का एक श्रेष्ठ उदाहरण है।

यह उपन्यास कथा-शिल्प, बिम्ब-योजना और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से शोध के नए आयाम खोलता है। इसमें निहित ‘पुनर्जन्म’ और ‘कर्म-फल’ की अवधारणाएं भारतीय दर्शन और साहित्य के अंतर्संबंधों को समझने में सहायक हैं। यह कृति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उन्हें यह सिखाती है कि सीमित शब्दों और लघु कलेवर में भी कैसे ‘महाकाव्यात्मक गहराई’ (Epic Depth) पैदा की जा सकती है।

​विनोद आनंद की साहित्यिक प्रतिभा की सराहना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि उन्होंने पत्रकारिता की वस्तुनिष्ठता और साहित्य की भावुकता का एक दुर्लभ संतुलन साधा है। वे न केवल एक कथाकार हैं, बल्कि एक समाजशास्त्री भी हैं जो यह देख पा रहा हैं कि भौतिकवादी युग में हम प्रेम और संवेदना के मूल स्वरूप को खोते जा रहे हैं। ‘शकुंतला की मातृ-चेतना’ में मातृत्व को जिस प्रकार एक ‘वैश्विक रक्षा तंत्र’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, वह लेखक की विराट चेतना का प्रमाण है। अंततः, यह उपन्यास संकलन हिंदी साहित्य की उस दार्शनिक परंपरा को समृद्ध करता है जो व्यक्ति को उसकी तुच्छता से उठाकर विराटता की ओर ले जाती है। यह एक ऐसी कृति है जो पढ़ने के बाद समाप्त नहीं होती, बल्कि पाठक के भीतर एक वैचारिक मंथन के रूप में जीवित रहती है।

विनोद आनंद ने अपनी इस लेखनी से यह सिद्ध कर दिया है कि शब्द जब संवेदना में भीगकर निकलते हैं, तो वे कालजयी बन जाते हैं।

*डॉ.शिवनंदन प्रसाद सिन्हा*

एम. ए. (हिंदी ), पी.एच. डी, डी -लिट
पूर्व विभागाध्य्क्ष हिंदी विभाग, विनोवा भावे विश्वविधालय, हज़ारीबाग़

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