मां की पुण्य तिथि पर बेटी की एक भावनात्मक उदगार
माँ, आज जब मैं चारों ओर देखती हूँ, तो गर्व से मेरा सिर झुक जाता है। तुमने जो बीज बोया था, आज वह एक विशाल ‘सुवासित बगवान’ बन गया है। याद है तुम्हें? जब तुम गोविंदपुर महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में शिक्षिका थीं, तब तुमने सिर्फ पढ़ाती नहीं थीं, तुम तो चरित्र गढ़ती थीं। आज वे सैकड़ों शिक्षक, जो तुम्हारी पाठशाला से निकले हैं, समाज में ज्ञान की मशाल जलाए हुए हैं।

अनुश्री की कलम से…
आज बहुत देर तक छत पर टहलती रही। सावन की भीगी हवाएं जब गोविंदपुर की उस पुरानी हवेली की छत से टकराती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे माँ की रेशमी साड़ी की सरसराहट अभी भी हवाओं में घुली है। 5 जुलाई 2007, वह तिथि मेरे जीवन की एक ऐसी स्थायी टीस बन गई है, जो वक्त के मरहम से भी नहीं भरती। माँ! आज फिर तुम्हारी बहुत याद आ रही है।
पिताजी—डॉ. शिरीष सुमन—को देखती हूँ तो कलेजा फट जाता है। वे अब भी माँ की पसंदीदा कुर्सी पर बैठकर घंटों खिड़की के बाहर देखते रहते हैं। पिताजी का कवि-हृदय जो कभी उपमाओं और अलंकारों में संसार ढूँढता था, अब माँ की अनुपस्थिति में एक मौन विरह की कविता बन गया है। वे अक्सर डायरी के पन्नों पर कुछ लिखते हैं, फिर कलम रोक देते हैं। मैं जानती हूँ, वे क्या लिखना चाह रहे हैं। वे लिखना चाहते हैं—”कहाँ हो अपर्णा? क्या तुम उस क्षितिज के उस पार बैठी हो, जहाँ से कोई संदेश नहीं आता?”
माँ, पिताजी की आँखों की वह नमी और उनकी खामोश तड़प अब मुझसे सही नहीं जाती। मैं उन्हें देखती हूँ तो लगता है कि एक आधा तो तुम्हारे साथ ही चला गया, जो बचा है, वह बस एक जीवित प्रतिमा की तरह धड़क रहा है।
बचपन की वह धड़कन
मुझे याद है, गोविंदपुर की वह गलियां, जहाँ कोयले की धूल के बीच भी तुम एक सफेद लिली की तरह खिलती थी। घर में माँ होने का जो अहसास था, वह अद्भुत था। वे केवल मेरी माँ नहीं थीं, वे एक ‘सबला’ थीं—एक ऐसा व्यक्तित्व जो घर के रसोईघर के मसालों की महक और कॉलेज के व्याख्यानों की गंभीरता के बीच का बारीक संतुलन बनाए रखता था।
मुझे याद है, कैसे तुम सुबह-सुबह तैयार होकर कॉलेज जाती थीं। तुम्हारे हाथ में वह बैग और चेहरे पर वह निश्चिंत मुस्कान। हम बच्चे अक्सर सोचते थे कि माँ इतनी व्यस्त कैसे रहती हैं? लेकिन रात को जब तुम हमें कहानियाँ सुनाती थीं, तो उन कहानियों में भी साक्षरता का संदेश होता था, शिक्षा का महत्व होता था। तुमने हमें सिखाया था कि जीवन केवल अपनी सुख-सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के आँसू पोंछने के लिए है।
तुमने जो उपवन लगाया, देखो कितने फूल खिले हैं
माँ, आज जब मैं चारों ओर देखती हूँ, तो गर्व से मेरा सिर झुक जाता है। तुमने जो बीज बोया था, आज वह एक विशाल ‘सुवासित बगवान’ बन गया है। याद है तुम्हें? जब तुम गोविंदपुर महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में व्यख्याता थीं, फिर प्राचार्य बनी,तब तुमने सिर्फ पढ़ाती नहीं थीं, तुम तो चरित्र गढ़ती थीं। आज वे सैकड़ों शिक्षक, जो तुम्हारी पाठशाला से निकले हैं, समाज में ज्ञान की मशाल जलाए हुए हैं।
तुमने ‘आवर ड्रीम, धनबाद ग्रीन’ जैसा जो अभियान शुरू किया था, देखो, आज वे पौधे कितने बड़े हो गए हैं। तुमने जो साक्षरता की ज्योति जलाई थी, वह आज लाखों लोगों के जीवन में रोशनी बनकर फैली है। तुमने साबित कर दिया कि शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री लेना नहीं, बल्कि संवेदनाओं को जीवित रखना है। तुमने लायंस क्लब के माध्यम से जो सेवा का ताना-बाना बुना, उसने आज न जाने कितने असहायों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरी है।
पिताजी की विरह-वेदना और मेरी पुकार
माँ, जब मैं पिताजी को उनके कवि-हृदय की पीड़ा में टूटते देखती हूँ, तो मेरा मन करता है कि तुम्हें आकाश के पार से नीचे खींच लाऊँ। पिताजी अक्सर तुमसे बातें करते हैं। वे कहते हैं, “अपर्णा, आज की गोष्ठी में तुम्हारी कमी बहुत खली। मैंने तुम्हारी पसंदीदा कविता पढ़ी, लेकिन तुम्हारी आँखों की वह चमक नहीं थी जो मेरे शब्दों को अर्थ देती थी।”
वे तुम्हारी सादगी को बहुत याद करते हैं। वे कहते हैं, “कितनी बड़ी गवर्नर थी वह, लेकिन घर आते ही बस एक साधारण माँ बन जाती थी।” माँ, क्या तुम सच में क्षितिज के पार बैठी हो? अगर सुन रही हो, तो एक बार आ जाओ न! पिताजी की विरह की पीड़ा अब मुझसे देखी नहीं जाती। वे तो शब्द हैं, तुम उनकी व्याकरण थी। तुम नहीं रही, तो वे बेमानी से हो गए हैं।
विरासत की अमर धुन
तुमने सिखाया था—”अहर्निश सेवामहें”। तुमने अपना पूरा जीवन निष्काम भाव से जीया। न पद का लोभ, न पुरस्कार की आकांक्षा। तुमने तो बस सेवा की। जब तुम जिला साक्षरता वाहिनी में काम करती थीं, तब क्या तुम्हें थकान नहीं होती थी? लेकिन तुमने कभी इसे महसूस नहीं होने दिया। आज जब मैं देखती हूँ कि कैसे लोग तुम्हारी स्मृतियों को संजोए हुए हैं, तो लगता है कि तुम गई नहीं हो, तुम यहीं हो—हर उस बच्चे की मुस्कान में, जिसे तुमने पढ़ना सिखाया, हर उस बुजुर्ग की दुआ में, जिसकी आँखों का तुमने ऑपरेशन करवाया।
तुम एक ऐसा प्रकाश स्तंभ हो, जो अंधेरे को चीरकर रास्ता दिखाता रहता है। तुम मेरी वह शक्ति हो जो मुझे हर संकट से लड़ना सिखाती है। जब मैं हारने लगती हूँ, तब तुम्हारे जीवन की वे कठिन चुनौतियाँ याद आती हैं, जिन्हें तुमने मुस्कराकर पार किया था।
माँ, लौट आओ न!
क्षितिज के पार का वह लोक शायद बहुत सुंदर होगा, तभी तो तुम वहाँ जाकर बैठ गई हो। पर यहाँ, इस दुनिया में, जो बगिया तुमने अपने पसीने और खून से सींची थी, वह आज लहलहा रही है। इस बगिया में अब बहुत फूल खिले हैं, लेकिन उस माली की कमी हर पल खलती है।
पिताजी का मौन, मेरी उदासी और गोविंदपुर की हवाओं की वह टीस—सब तुम्हें पुकार रहे हैं। तुम जहाँ भी हो, बस एक बार अपनी उस ओजस्वी वाणी से कह दो कि ‘मैं यहीं हूँ।’ तुम्हारी सादगी, तुम्हारा सेवा-संकल्प और तुम्हारी वह करुणा ही मेरी एकमात्र विरासत है।
मैं तुम्हें हर पल महसूस करती हूँ, माँ। तुम मेरी प्रेरणा थी, हो और रहोगी। तुम्हारी विरासत अमर है, क्योंकि वह केवल स्मृति में नहीं, बल्कि समाज के हर उस जागरूक मन में है जिसे तुमने गढ़ा है।
प्रणाम माँ, उस करुणा की ज्योति को, जो आज भी मेरे हृदय के अंधकार को मिटाती है।