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साहित्य, संस्कृति, कला

विनोद आनंद की कहानी : – बिन ब्याही माँ (5)

Byadmin

Mar 20, 2026
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लेखक परिचय:-

विनोद आनंद उर्फ़ विनोद कुमार मंडल पिछले चार दशक से पत्रकारिता एवं साहित्यिक लेखन से जुड़े हैं, इनकी कहानियाँ, संस्मरण औऱ साहित्य के विभिन्न विधाओं में लिखी गयी रचनाये देश विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है,ये कई समाचार पत्रों से जुड़ कर ज्वलांत मुद्दों को उठाते रहे हैं, ये कई वेव साइट के सम्पादक के रूप में काम करते रहे जिसमे streetbuzz.co.in है, वर्तमान में antarkatha.com, antrkatha.in तथा daily.antrkatha.com तथा अंतर्कथा E-पेपर ke सम्पादक के रूप में कार्य रत हैं.

शिक्षा:-एम ए (हिंदी), रांची विश्व विधालय

पता:-रतनपुर, पो.-गोविंदपुर, जिला धनबाद, पिन 828109, झारखण्ड, india phone no 7061143096

 

कहानी -बिन ब्याही माँ 

( विनोद आनंद )
दि ल्ली की आपाधापी और भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच, कनॉट प्लेस की एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के दफ्तर में राजेश और शीला का साथ काम करना किसी इत्तेफाक से कम नहीं था। राजेश, जो अपने काम में जितना माहिर था, स्वभाव में उतना ही मिलनसार। वहीं शीला, शांत, गंभीर और अपनी आंखों में ढेर सारे सपने लिए उस दफ्तर की एक होनहार कर्मचारी थी।

​शुरुआत में यह साथ केवल फाइलों और मीटिंग्स तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे चाय के कप और लंच ब्रेक की बातों ने एक-दूसरे के प्रति आकर्षण पैदा कर दिया। राजेश अक्सर शीला की डेस्क पर फूल रख देता या उसके काम में हाथ बंटा देता। ऑफिस के गलियारों में सुगबुगाहट होने लगी।

​सहयोगी आपस में कानाफूसी करते, “देखना, इन दोनों की नजदीकी जल्द ही कोई नया मोड़ लेगी।” कुछ लोग आरोप लगाते कि ये पेशेवर मर्यादा का उल्लंघन है, तो कुछ इसे महज एक आकर्षण मानते। लेकिन राजेश और शीला ने दुनिया की परवाह नहीं की। उनके लिए समाज की बंदिशों से ज्यादा जरूरी एक-दूसरे का साथ था।

​प्यार की गहराई इस कदर बढ़ी कि दोनों ने ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रहने का फैसला किया। उस समय के समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा और विद्रोही कदम था। बिना फेरों के, बिना सिंदूर के, वे एक छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रहने लगे। इसी प्रेम की परिणति के रूप में शीला के जीवन में एक नन्हीं कली ने दस्तक दी—उनकी बेटी ‘स्वाति’।

​स्वाति के जन्म के कुछ ही समय बाद, राजेश को बेंगलुरु की एक नामी कंपनी से बड़ा ऑफर मिला। सैलरी दुगुनी थी और पद भी बड़ा। राजेश ने शीला का हाथ थामकर कहा था, “शीला, मैं पहले वहां जाकर सब सेटल कर लेता हूं। जैसे ही घर और काम व्यवस्थित होगा, मैं तुम्हें और अपनी बेटी को बुला लूंगा। हम वहीं धूमधाम से शादी करेंगे और स्वाति को दुनिया की हर खुशी देंगे।”

​शीला ने राजेश की बातों पर भरोसा किया। वह उसे स्टेशन छोड़ने गई, उसकी आंखों में भविष्य के हसीन सपने थे। शुरुआत के कुछ महीने फोन कॉल और वादों में बीते, लेकिन धीरे-धीरे फोन की घंटी कम बजने लगी। फिर एक दिन ऐसा आया जब राजेश का नंबर ‘आउट ऑफ रीच’ हो गया।

​चिंता और आशंका से घिरी शीला, अपनी तीन महीने की बेटी को गोद में लेकर बेंगलुरु पहुंच गई। वहां कंपनी के दफ्तर में जो उसने सुना, उसने उसके पैरों तले जमीन निकाल दी। पता चला कि राजेश ने अपनी नई लाइफ स्टाइल और सामाजिक प्रतिष्ठा के खातिर एक रईस परिवार की लड़की ‘निशा’ से शादी कर ली है।
​शीला के सामने अंधेरा छा गया। वह राजेश के नए घर के बाहर खड़ी रही, लेकिन अंदर जाने की हिम्मत न हुई। उसने देखा कि राजेश मुस्कुराते हुए अपनी नई पत्नी के साथ कार में बैठ रहा था। उस मुस्कान में शीला और स्वाति के लिए कोई जगह नहीं थी।

​दिल्ली वापस लौटकर शीला के पास दो रास्ते थे—या तो वह इस धोखे से टूटकर बिखर जाए, या अपनी बेटी के लिए चट्टान बन जाए। उसने दूसरा रास्ता चुना। समाज ने उसे ‘बिन ब्याही माँ’ का लांछन दिया, पड़ोसियों ने ताने कसे, लेकिन शीला ने ठान लिया कि वह अपनी स्वाति को पिता और माता, दोनों का प्यार अकेले देगी।

​स्वाति जब तीन साल की हुई, तो उसने अक्सर अपनी माँ की आँखों में आँसू देखे। एक दिन उसने अपनी तोतली आवाज में पूछा, “माँ, सबके पापा होते हैं, मेरे पापा कहाँ हैं?”
​शीला के पास कोई जवाब नहीं होता था। वह बस उसे गले लगाकर रो पड़ती। स्वाति ने अपनी माँ के दर्द को महसूस करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसने पूछना छोड़ दिया। उसने समझ लिया कि उसके पिता का नाम उसकी माँ के ज़ख्मों को हरा कर देता है।

​स्वाति पढ़ाई में मेधावी थी। उसने अपनी माँ के संघर्षों को अपनी ताकत बनाया। दिन-रात की मेहनत रंग लाई और उसने ‘नीट’ (NEET) परीक्षा पास कर मेडिकल में दाखिला लिया। शीला ने रात-रात भर जागकर सिलाई-कढ़ाई की, दफ्तरों में ओवरटाइम किया ताकि स्वाति को किसी चीज की कमी न हो। अंततः स्वाति ने एमबीबीएस और फिर एमडी की डिग्री हासिल की। वह एक कैंसर विशेषज्ञ (Oncologist) बन गई।

​नियति का चक्र घूमकर फिर वहीं आया, जहाँ से कहानी शुरू हुई थी। स्वाति की पोस्टिंग बेंगलुरु के एक प्रसिद्ध कैंसर अस्पताल में हुई। अब शीला बूढ़ी हो चुकी थी और रिटायरमेंट के बाद अपनी बेटी के साथ बेंगलुरु आ गई।

​डॉ. स्वाति ने चिकित्सा जगत में अपना एक अलग नाम बनाया था। वह केवल एलोपैथी पर निर्भर नहीं थी, बल्कि पारंपरिक चिकित्सा और सकारात्मक मनोविज्ञान के समन्वय से मरीजों का इलाज करती थी। उसका मानना था, “दवा शरीर को ठीक करती है, लेकिन उम्मीद आत्मा को जिलाती है।”

​एक सुबह, अस्पताल में एक मरीज को लाया गया जिसकी स्थिति अत्यंत गंभीर थी। वह फेफड़ों के कैंसर के आखिरी चरण में था। नाम था—राजेश खन्ना।

​उसके साथ उसकी पत्नी निशा और दो बच्चे थे। वे रो रहे थे क्योंकि कई बड़े डॉक्टरों ने कह दिया था कि राजेश के पास अब केवल दो महीने का समय है। जब स्वाति ने फाइल देखी, तो उसे मरीज के नाम में कोई विशेष रुचि नहीं थी, उसके लिए वह केवल एक ‘जिंदगी’ थी जिसे बचाना था।

​इलाज शुरू हुआ। स्वाति अक्सर राजेश के पास बैठती, उसे जीने की प्रेरणा देती। राजेश जब स्वाति को देखता, तो उसे एक अजीब सी बेचैनी और अपनापन महसूस होता। उसे लगता कि इस डॉक्टर की आंखों में वैसी ही चमक है जैसी कभी… उसने बहुत पहले कहीं देखी थी।

​स्वाति की मेहनत रंग लाई। उसकी विशेष चिकित्सा पद्धति और ‘पॉजिटिव हीलिंग’ ने चमत्कार कर दिखाया। राजेश मौत के मुँह से बाहर आ गया।

​​अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद, राजेश कृतज्ञता से भर गया था। वह अपनी पत्नी निशा के साथ डॉ. स्वाति के निवास पर उसे धन्यवाद देने पहुंचा।

​स्वाति ने मुस्कुराकर उनका स्वागत किया। “बैठिए अंकल, अब आप कैसा महसूस कर रहे हैं?”

​राजेश भावुक होकर बोला, “बेटा, तुमने मुझे नया जीवन दिया है। मैं और मेरा परिवार तुम्हारा कर्ज कभी नहीं उतार पाएंगे।”

फिर उसने कमरे के चारों ओर देखते हुए पूछा, -“बेटा, घर में और कोई नहीं है? मम्मी-पापा नहीं दिख रहे?”

​स्वाति के चेहरे पर एक पल के लिए उदासी की परछाईं उभरी। उसने संकोच के साथ कहा, “पापा का तो पता नहीं अंकल… माँ पड़ोस में एक पूजा में गई हैं, अभी आती ही होंगी।

दरअसल, मैं एक ‘बिन ब्याही माँ’ की बेटी हूँ। मेरी माँ ने ही मुझे पाल-पोसकर इस लायक बनाया है।”

​यह शब्द सुनते ही राजेश के कानों में जैसे गरम सीसा पड़ गया हो। उसकी रूह कांप गई। उसी पल, हाथ में पूजा की थाली लिए शीला ने घर में प्रवेश किया। जैसे ही उसकी नजर सोफे पर बैठे राजेश पर पड़ी, उसके हाथ से थाली छूट गई।

​दोनों की नजरें मिलीं। सालों का मौन, बरसों का दर्द और विश्वासघात का वह मंजर एक पल में आँखों के सामने तैर गया।

राजेश ने शीला को पहचान लिया था। वह जिसे मरा हुआ या भुला हुआ मान चुका था, वह उसके सामने उसकी ‘मसीहा’ की माँ बनकर खड़ी थी।

​राजेश का सिर शर्म से झुक गया। वह जो कुछ देर पहले तक जीवन मिलने की खुशी मना रहा था, अब अपनी ही नजरों में गिर गया। वह बदहवास सा उठा और बिना कुछ कहे, निशा का हाथ पकड़कर वहां से भाग खड़ा हुआ।

​शीला अपने कमरे में भाग गई और फूट-फूटकर रोने लगी। स्वाति हकबका गई। वह माँ के पास गई और उसे गले लगा लिया। “क्या हुआ माँ? आप उन अंकल को देखकर ऐसे क्यों रो रही हैं?”

​शीला कुछ नहीं बोली, बस सिसकती रही। उधर, अपने घर पहुँचकर राजेश एक कोने में बैठ गया। वह शून्य को निहार रहा था। निशा पूछती रही,

“क्या हुआ? आप अचानक वहां से क्यों चले आए?” लेकिन राजेश के पास कोई शब्द नहीं थे। उसे वह चेहरा याद आ रहा था—वही शीला, जिसे उसने मझधार में छोड़ दिया था, और वही स्वाति, जिसे उसने कभी अपनी बेटी के रूप में स्वीकार करने का साहस नहीं दिखाया था।

​स्वाति चुपचाप अपनी माँ के पास बैठी रही। वह मेधावी थी, डॉक्टर थी, और अब वह समझ चुकी थी कि यह खामोशी ही उसके सारे सवालों का जवाब है। वह समझ गई कि जिस शख्स की जान उसने बचाई, वही उसके जीवन का सबसे बड़ा अपराधी था।

​उसने अपनी माँ का हाथ चूमा और मन ही मन कहा, “माँ, तुमने मुझे जो पहचान दी है, वह किसी नाम की मोहताज नहीं है। आज उस शख्स के पास दौलत है, परिवार है, लेकिन उसकी आंखों में जो शर्म थी, उसने साबित कर दिया कि वह हार गया और तुम जीत गईं।”

​स्वाति ने तय किया कि वह इस बारे में अब कोई सवाल नहीं करेगी। कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें खामोशी की चादर में ढका रहना ही बेहतर होता है।

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