पुस्तक :पुण्यश्लोक :अहिल्यादेवी होलकर
साझा संकलन
सम्पादक :- विजय पाटिल
प्रकाशक : शिवोहम प्रकाशन
शिवोहम प्रकाशन की साझा संकलन कृति की एक साहित्यिक मीमांसा
भा रतीय इतिहास के फलक पर कुछ नाम नक्षत्रों की भाँति चमकते हैं, जो काल की सीमाओं को लांघकर युगों-युगों तक मानवता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। लोकमाता अहिल्यादेवी होलकर एक ऐसा ही देदीप्यमान चरित्र हैं।
शिवोहम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और संपादक डॉ. विजय पाटिल द्वारा संकलित यह साझा संकलन केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि उस पुण्यआत्मा के प्रति शब्दों की भावांजलि है, जिन्होंने सत्ता को ‘उपभोग’ नहीं, बल्कि ‘सेवा और न्यास’ माना।
इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहुआयामी दृष्टि है। डॉ. पाटिल ने विभिन्न लेखकों के वैचारिक प्रवाह को एक सूत्र में पिरोकर अहिल्यादेवी के व्यक्तित्व के उन कोनों को प्रकाशित किया है, जो अक्सर इतिहास की शुष्क तारीखों में दब जाते हैं।
व्यक्तित्व का उद्भव: साधारण से असाधारण की यात्रा
संकलन के प्रारंभिक खंड अहिल्यादेवी के बाल्यकाल और उनके संस्कार पक्ष पर प्रकाश डालते हैं। एक साधारण ग्रामीण परिवेश में जन्मी बालिका का मल्हारराव होलकर की पारखी नजरों में आना और फिर होलकर साम्राज्य की कुलवधू बनना, किसी दैवीय विधान से कम नहीं लगता।
लेखकों ने बड़े ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया है कि कैसे अहिल्यादेवी ने व्यक्तिगत त्रासदियों—पति खंडेराव, ससुर मल्हारराव और एकमात्र पुत्र मालेराव के असामयिक निधन—के वज्रपात को सहा। साहित्य की भाषा में कहें तो, यह संकलन उनके ‘शोक’ को ‘शक्ति’ में बदलने की गाथा है। जब एक स्त्री के पास बिखर जाने के सारे कारण मौजूद थे, तब उन्होंने अपनी प्रजा के लिए ‘माता’ बनने का संकल्प लिया।
प्रशासनिक कुशलता: सुराज का जीवंत प्रतिमान
इस पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा अहिल्यादेवी के ‘रामराज्य’ की अवधारणा पर केंद्रित है। डॉ. विजय पाटिल जी ने संपादन में इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि पाठक उनके प्रशासनिक कौशल को आधुनिक संदर्भों में समझ सकें।
न्याय व्यवस्था: अहिल्यादेवी के दरबार में न्याय निष्पक्ष था। संकलन में वर्णित प्रसंग बताते हैं कि उनके लिए ‘स्व’ और ‘पर’ का भेद नहीं था।
आर्थिक सुधार: उन्होंने किसानों को संरक्षण दिया, व्यापार को बढ़ावा दिया और महेश्वर को बुनकरी का केंद्र बनाया (महेश्वरी साड़ियाँ आज भी उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण हैं)।
रक्षा नीति: एक महिला शासक के रूप में उन्होंने भील विद्रोहों को जिस कुशलता और प्रेम से शांत किया, वह उनके ‘सामा, दामा, दंडा, भेदा’ की कूटनीति का उत्कृष्ट उदाहरण है।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान: काशी से कन्याकुमारी तक का संकल्प
शिवोहम प्रकाशन की इस कृति में अहिल्यादेवी के ‘धर्मपरायण’ स्वरूप को बहुत ही गरिमामय ढंग से प्रस्तुत किया गया है। वे केवल इंदौर या मालवा की शासिका नहीं थीं, बल्कि वे अखंड भारत की सांस्कृतिक चेतना की संरक्षिका थीं।
सोमनाथ से काशी विश्वनाथ तक, और हिमालय की गुफाओं से लेकर दक्षिण के रामेश्वरम तक, उन्होंने जिस प्रकार मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, घाट बनवाए और अन्नक्षेत्र खोले, वह उनके वैश्विक दृष्टिकोण को दर्शाता है। संकलन के लेखक रेखांकित करते हैं कि अहिल्यादेवी का धर्म कर्मकांडीय नहीं, बल्कि ‘लोक-कल्याणकारी’ था। उनके लिए शिव की आराधना का अर्थ था—त्रस्त मानवता की सेवा।
साहित्यिक सौंदर्य और संपादन कला
डॉ. विजय पाटिल जी का संपादन सराहनीय है। साझा संकलनों में अक्सर लयबद्धता का अभाव होता है, किंतु यहाँ विचारों का प्रवाह गंगा की धारा की तरह निरंतर है।
भाषा-शैली: संकलन की भाषा अलंकृत होते हुए भी सुबोध है। इसमें इतिहास की प्रामाणिकता और साहित्य की तरलता का अद्भुत संगम है।
भावुकता और तर्क का संतुलन: जहाँ एक ओर उनके व्यक्तिगत दुखों का वर्णन पाठक की आँखें नम कर देता है, वहीं उनके राजनैतिक निर्णयों का विश्लेषण बुद्धि को झंकृत करता है।
स्त्री शक्ति का वैश्विक स्वर
यह पुस्तक अहिल्यादेवी को केवल ‘अतीत की नायिका’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘भविष्य की प्रेरणा’ के रूप में स्थापित करती है। आज के युग में जब महिला सशक्तिकरण की बातें होती हैं, तब 18वीं शताब्दी की यह महान नारी हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति करुणा और कर्तव्यनिष्ठा में निहित होती है। उन्होंने सिद्ध किया कि शस्त्र और शास्त्र, भक्ति और शक्ति, तथा ममता और न्याय एक साथ एक ही व्यक्तित्व में समाहित हो सकते हैं।
एक अनिवार्य संग्रहणीय कृति
शिवोहम प्रकाशन (कोलकाता/हैदराबाद)खास कर इस प्रकाशन केसीईओ प्रतीक्षा गाँगुली नाथ इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए बधाई का पात्र है। +91 93542 72936 पर उपलब्ध यह कृति हर उस पाठक के पुस्तकालय में होनी चाहिए जो भारतीय मूल्यों, सुशासन और नारी शक्ति के वास्तविक स्वरूप को समझना चाहता है।
अंततः, यह साझा संकलन अहिल्यादेवी के चरणों में अर्पित एक ऐसा शब्द-पुष्प है, जिसकी सुगंध आने वाली पीढ़ियों को त्याग और सेवा की प्रेरणा देती रहेगी। डॉ. विजय पाटिल जी ने बिखरे हुए मोतियों को पिरोकर जो माला तैयार की है, वह वास्तव में ‘लोकमाता’ के वैभव के अनुरूप है।