डॉ. अपर्णा राय का व्यक्तित्व भावुकता और प्रशासनिक दक्षता का दुर्लभ मेल था। वे मानती थीं कि एक सच्चा इंसान होना सबसे बड़ी उपलब्धि है। पर-पीड़ा को दूर करना, दूसरों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरना — यही उनका जीवन-धर्म था। उनकी सरलता, संवेदनशीलता और परोपकारिता सहज थीं। वैचारिक परिपक्वता के कारण वे विवादों का समाधान कुशलतापूर्वक करती थीं। नेतृत्व उनके लिए पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी थी। उन्होंने साबित किया कि भावुक व्यक्ति भी कुशल प्रशासक हो सकता है, यदि भावनाओं को सद्भावना से जोड़ा जाए
ममता कुमारी
M. A. (Hindi ), D-el ed
भा रतीय मिट्टी की गहराइयों से उभरी वह महिला, जिसने गोविंदपुर की संकीर्ण गलियों को पार कर शिक्षा, सेवा और सृजन के विशाल आकाश को अपने व्यक्तित्व से आलोकित किया, आज भी समय की धारा में एक प्रेरणादायी ध्वनि की तरह गूंजती है। डॉ. अपर्णा राय — जिन्हें उनके समकालीन ‘अबला’ की बजाय ‘सबला’ कहकर पुकारते थे — 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 21वीं शताब्दी के प्रारंभ में धनबाद-गोविंदपुर क्षेत्र की एक ऐसी व्यक्तित्व थीं, जिनका जीवन चुनौतियों की चट्टानों को पार कर नदी की तरह बहता रहा। 5 जुलाई 2007 को जब उनका शरीर इस धरा से विदा हुआ, तो उनके पीछे छूटा एक ऐसा विरासत का खजाना, जो न केवल परिवार और समुदाय को, बल्कि पूरे समाज को सदैव प्रेरित करता रहेगा।
उनका जन्म गोविंदपुर की उस मिट्टी में हुआ, जहां कोयला की काली धूल और औद्योगिक धुएं के बीच शिक्षा और जागृति की किरणें दुर्लभ थीं।उस युग में, जब ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत अभी भी रूढ़िवादी बंधनों में जकड़ा था, अपर्णा राय ने पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर उच्च शिक्षा की राह चुनी। उनके हृदय में ज्ञान की प्यास और सेवा की ज्वाला इतनी प्रबल थी कि कोई बाधा उन्हें रोक नहीं पाई। उनके जीवन-साथी डॉ. शिरीष सुमन, समान विचारों वाले एक विद्वान, उनके हर कदम के सहचर बने। यह दंपति न केवल पारिवारिक स्नेह का, बल्कि सामाजिक दायित्व का भी सुंदर समन्वय था। अपर्णा जी एक ममतामयी गृहिणी थीं, फिर भी उनका हृदय पूरे समाज के लिए धड़कता था। परिवार और गृहस्थी का बोझ संभालते हुए वे सार्वजनिक जीवन में पूर्ण रूप से सक्रिय रहीं — यह संतुलन आज भी कई महिलाओं के लिए एक आदर्श मिसाल है।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता बहुमुखी प्रतिभा थी। वे ज्ञान की गागर में सागर समेटे हुए थीं। शिक्षा उनके जीवन का मूल स्तंभ बनी। गोविंदपुर महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में शिक्षिका के रूप में करियर की शुरुआत कर उन्होंने जल्द ही प्राचार्या का पद संभाला। शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय जैसा संस्थान, जहां भविष्य के शिक्षक तैयार होते हैं, उनके हाथों में एक प्रेरणा केंद्र बन गया। वे कठिन से कठिन शैक्षणिक विषयों को सरल भाषा, सरस उदाहरणों और गहरी अंतर्दृष्टि से प्रस्तुत करती थीं। उनकी कक्षा मात्र ज्ञान-प्रसार का स्थान नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण का मंदिर थी। छात्र उनके पास न केवल पढ़ने आते, बल्कि जीवन जीना सीखने आते।
सेवानिवृत्ति उनके लिए विश्राम का समय नहीं था। अल-इक्रा शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में शैक्षणिक प्रभारी के रूप में उन्होंने IGNOU के B.Ed. कार्यक्रम का कुशलतापूर्वक समन्वय किया। दूरदराज के क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षक शिक्षा उपलब्ध कराने का यह प्रयास उनके दूरदर्शी स्वभाव को दर्शाता है। 1980-90 के दशक में झारखंड-बिहार की साक्षरता दर निम्न स्तर पर थी।
सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन, लिंग भेद और संसाधनों की कमी के बावजूद डॉ. अपर्णा राय ने जिला साक्षरता वाहिनी में सक्रिय योगदान दिया। वे ‘आवर ड्रीम, धनबाद ग्रीन’ जैसे पर्यावरण संरक्षण अभियानों में भी अग्रणी रहीं। वृक्षारोपण, जागरूकता शिविर और साक्षरता कार्यक्रम उनके हाथों में सामाजिक परिवर्तन के सशक्त माध्यम बन गए।
उनकी शिक्षा संबंधी दृष्टि आज की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के मूल सिद्धांतों — समावेशिता, व्यावहारिकता और समग्र विकास — से गहराई से जुड़ी हुई थी। वे मानती थीं कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन कौशल, नैतिक मूल्य और सामाजिक जिम्मेदारी का विकास है। उनकी लेखनी और व्याख्यान शैली ने सैकड़ों शिक्षकों को प्रभावित किया। उनकी रचनाएं, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं, महाविद्यालय स्तर पर अध्ययन का हिस्सा बनीं।
साहित्य उनके लिए ज्ञान का सृजनात्मक विस्तार था। निबंध, विचार-लेखन या शैक्षणिक ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने शिक्षा और सेवा को जोड़ा। साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी उपस्थिति हमेशा प्रभाव छोड़ती थी। उनकी वाणी में ओज था, तर्क था और करुणा थी। विवादों को सुलझाने में वे निपुण थीं, क्योंकि उनका दृष्टिकोण संकीर्ण नहीं, बल्कि समग्र और मानवीय था।
शिक्षा के साथ-साथ सेवा उनका दूसरा स्वभाव था। 1982 में लायंस क्लब की चार्टर अध्यक्षा बनकर उन्होंने सेवा के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ा। धीरे-धीरे वे जिला स्तर, मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट पदों, क्षेत्रीय चेयरमैन और अंततः डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तक पहुंचीं। उस समय महिला नेतृत्व दुर्लभ था, लेकिन अपर्णा राय ने अपनी लगन, कार्यक्षमता और सेवा-भाव से यह सीमा लांघ दी।
लायंस क्लब उनके लिए मात्र एक संगठन नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का मंच था। उन्होंने क्लब को बड़े शहरों और अभिजात वर्ग तक सीमित नहीं रखा; छोटे कस्बों, गांवों तक इसका विस्तार किया। सामान्य परिवारों के लोगों को जोड़कर उन्होंने लायंसवाद को लोकतांत्रिक बनाया। उनके सेवा कार्य विविध और गहन थे। रक्तदान शिविर, नेत्रदान, बंध्याकरण, वस्त्र वितरण, स्वास्थ्य जांच — ये सभी कार्यक्रम उनके नेतृत्व में नियमित रूप से आयोजित होते। भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, बाल विवाह, मद्यपान जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता अभियान उनके जीवन का अभिन्न अंग थे। असहाय, साधनहीन और मजबूर लोगों के लिए वे निरंतर उपलब्ध रहती थीं। देश-विदेश के भ्रमणों के दौरान उन्हें अनेक प्रशस्तियां और पुरस्कार मिले, लेकिन उनकी सादगी कभी नहीं बदली। सरल वस्त्र, सहज व्यवहार और हर किसी तक पहुंच — यही उनकी पहचान थी। सरकार ने उन्हें विशिष्ट महिला के रूप में सम्मानित किया, जो उनके योगदान की औपचारिक स्वीकृति थी।
लायंस क्लब के माध्यम से उनका सेवा क्षेत्र राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। लेकिन वे हमेशा जड़ों से जुड़ी रहीं। गोविंदपुर क्षेत्र के विकास के लिए वे सदैव तत्पर रहती थीं। नारी जागरण और जन चेतना अभियान में वे अग्रदूत थीं। उनकी ओजस्विनी वाणी कठिन कार्यों को भी सरल बना देती थी। थकान उन्हें छू नहीं पाती थी। रोग-शोक की पीड़ा को पार कर वे अंतिम क्षण तक यौवन की ऊर्जा से लबरेज रहीं। यह उनकी आंतरिक शक्ति थी, जो कर्मयोग की गीता-प्रेरित दृष्टि से उपजी थी। वे कार्य को निष्काम भाव से करती थीं — फल की चिंता किए बिना।
डॉ. अपर्णा राय का व्यक्तित्व भावुकता और प्रशासनिक दक्षता का दुर्लभ मेल था। वे मानती थीं कि एक सच्चा इंसान होना सबसे बड़ी उपलब्धि है। पर-पीड़ा को दूर करना, दूसरों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरना — यही उनका जीवन-धर्म था। उनकी सरलता, संवेदनशीलता और परोपकारिता सहज थीं। वैचारिक परिपक्वता के कारण वे विवादों का समाधान कुशलतापूर्वक करती थीं। नेतृत्व उनके लिए पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी थी। उन्होंने साबित किया कि भावुक व्यक्ति भी कुशल प्रशासक हो सकता है, यदि भावनाओं को सद्भावना से जोड़ा जाए।
आज के भारत में, जहां महिला आरक्षण, डिजिटल शिक्षा, सतत विकास लक्ष्य (SDGs) और सामाजिक न्याय की चर्चाएं जोरों पर हैं, डॉ. अपर्णा राय का जीवन एक जीवंत केस स्टडी है। उन्होंने दिखाया कि छोटी जगह से भी बड़ी उड़ान भरी जा सकती है। उनकी कहानी उन युवा महिलाओं, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रेरित करती है जो परिवर्तन लाना चाहते हैं। शिक्षा के माध्यम से सशक्तिकरण, सेवा के माध्यम से समावेशन और सृजन के माध्यम से अमरता — यही उनका त्रिवेणी मार्ग था।
उनकी विरासत गोविंदपुर की मिट्टी में बसी हुई है, धनबाद की हवाओं में फैली हुई है और पूरे समाज के हृदय में बसती है। “अहर्निश सेवामहें” — यही उनका आदर्श वाक्य था। आज के तेज गति वाले, उपभोक्तावादी विश्व में उनकी याद हमें सिखाती है कि सच्ची सफलता बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि सेवा, ज्ञान और करुणा में निहित है। वे एक प्रकाश स्तंभ थीं, जो अंधेरे को चीरकर रास्ता दिखाती रहीं।
जब हम उनके जीवन को गौर से देखते हैं, तो लगता है कि प्रकृति कभी-कभी ऐसे अद्भुत पुष्प उत्पन्न करती है, जिनकी सुगंध दिशाओं को महकाती रहती है। डॉ. अपर्णा राय वही पुष्प थीं। उनका जीवन हमें बताता है कि सच्चा मानव कर्म से बनता है, संकल्प से मजबूत होता है और सेवा से अमर। उनकी स्मृति में हम सबको प्रणाम है — उस महिला को, जिसने शिक्षा को ज्योति, सेवा को कर्म और सृजन को जीवन बना दिया।