उपन्यास का सबसे सशक्त, कलात्मक और प्रभावशाली पक्ष इसकी भाषा-शैली और इसकी गहन प्रतीक योजना में निहित है। लेखक विनोद आनंद की लेखनी में काव्यात्मकता के सुकोमल सौंदर्य और दार्शनिकता के गंभीर चिंतन का एक ऐसा अद्भुत, विरल और संतुलित सामंजस्य दिखाई देता है जो आज के गद्य में अत्यंत दुर्लभ है।
समीक्षक :रामचंद्र मिश्र
लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार विनोद आनंद का लघु उपन्यास-संकलन ‘विषकन्या का प्रेम’ एवं ‘शकुंतला की मातृ-चेतना’ आधुनिक हिंदी साहित्य के आकाश में एक अत्यंत जाज्वल्यमान नक्षत्र की तरह प्रतिस्थापित होता है।
यह संकलन केवल अतीत की धूल-धूसरित घटनाओं या पौराणिक आख्यानों का साधारण संपादन या पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि यह हमारी सांकृतिक और ऐतिहासिक चेतना का एक ऐसा क्रांतिकारी पुनर्पाठ है जो सदियों पुरानी रूढ़ियों को झकझोर कर रख देता है। लेखक विनोद आनंद ने अपनी इस कालजयी कृति के माध्यम से इतिहास और पुराणों के बंद पन्नों में कैद उन स्त्री पात्रों को एक नया आकाश, नया जीवन और नई अस्मिता प्रदान की है, जिन्हें पुरुष-प्रधान इतिहासलेखन और सामंती व्यवस्था ने हमेशा हाशिए पर रखा। इतिहास के क्रूर पन्नों में जिन स्त्रियों को केवल सत्ता के गलियारों में चलने वाले षड्यंत्रों, राजनीतिक संधियों, और पुरुष-प्रधान समाज की वासना या महत्वाकांक्षा के एक बेजान उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा, लेखक ने उन्हीं चरित्रों के भीतर धड़कते हुए एक संवेदनशील और मुखर मन को खोज निकाला है।
यह कृति एक ऐसे समय में हमारे सामने आती है जब समकालीन समाज स्त्री के अस्तित्व, उसकी स्वायत्तता और उसके आत्मनिर्णय के अधिकारों को लेकर नए सिरे से बहस कर रहा है।
ऐसे में यह उपन्यास-संकलन अतीत के झरोखे से झांकते हुए वर्तमान और भविष्य के समाज के लिए एक आवश्यक वैचारिक और दार्शनिक दिशा-निर्देश तय करता है।
इस संकलन की पहली रचना ‘विषकन्या का प्रेम’ के केंद्र में स्थित माधवी का चरित्र हिंदी साहित्य की एक युगांतरकारी सृष्टि है। पारंपरिक इतिहास और लोक-कथाओं में ‘विषकन्या’ शब्द सुनते ही मस्तिष्क में एक ऐसी स्त्री की छवि उभरती है जो केवल विनाश, मृत्यु, छल, कपट और राज्य-विस्तार के लिए पुरुषों द्वारा तैयार किया गया एक घातक और अमानवीय हथियार है। समाज ने कभी उसकी देह के भीतर छिपी आत्मा को देखने का प्रयास नहीं किया, कभी यह जानने की चेष्टा नहीं की कि उस विषैली परतों के पीछे भी एक कोमल, प्रेमी और निष्पाप हृदय धड़क सकता है।
लेखक विनोद आनंद ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से इस रूढ़िवादी धारणा पर करारा प्रहार किया है। वे यह बेहद खूबसूरती और दृढ़ता से स्थापित करते हैं कि किसी भी स्त्री की वास्तविक पहचान उसके ऊपर समाज या व्यवस्था द्वारा बलात आरोपित की गई भूमिका से कहीं अधिक व्यापक, गहरी और पवित्र होती है। माधवी केवल राजाओं और सेनापतियों की हत्या करने वाली या राजनीतिक शतरंज की बिसात पर चली जाने वाली कोई विष से भरी निर्जीव देह नहीं है, बल्कि वह तो प्रेम, असीम करुणा, पुरानी स्मृतियों के कोमल शिखरों और आत्मसम्मान से ओतप्रोत एक जीवंत, स्पंदनशील मानवीय मन है। उसका चरित्र हमें यह सोचने पर विवश करता है कि जिसे समाज ने विष मान लिया, क्या वह वास्तव में विष था, या फिर पुरुष-सत्ता की हिंसक लालसाओं ने उसके भीतर के अमृत को सोखकर उसे विष बनने पर मजबूर किया था।
लेखक ने माधवी के इसी अंतर्द्वंद्व और उसकी आंतरिक पवित्रता को इतनी संवेदनशीलता से उकेरा है कि पाठक उसकी पीड़ा से एकाकार हो जाता है।
उपन्यास का सबसे सशक्त, कलात्मक और प्रभावशाली पक्ष इसकी भाषा-शैली और इसकी गहन प्रतीक योजना में निहित है। लेखक विनोद आनंद की लेखनी में काव्यात्मकता के सुकोमल सौंदर्य और दार्शनिकता के गंभीर चिंतन का एक ऐसा अद्भुत, विरल और संतुलित सामंजस्य दिखाई देता है जो आज के गद्य में अत्यंत दुर्लभ है।
उनकी भाषा मूलतः संस्कृतनिष्ठ है, जिसमें तत्सम शब्दावली का प्रचुर प्रयोग हुआ है, परंतु यह संस्कृतनिष्ठता कहीं भी कथ्य को बोझिल, दुरूह या थकाऊ नहीं बनाती। इसके विपरीत, यह एक अत्यंत मनमोहक, सौंदर्यपूर्ण और नैसर्गिक प्रवाह के साथ कथा की नदी को आगे बढ़ाती है।
पाठक भाषा के इस प्रवाह में बहता चला जाता है और उसे शब्दों की क्लिष्टता का नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपे नाद-सौंदर्य का बोध होता है। इसके साथ ही, उपन्यास में प्रयुक्त प्रतीक योजना अत्यंत उत्कृष्ट कोटि की है। उदाहरण के लिए, कथा में आने वाला ‘माधवी वृक्ष’ केवल एक वनस्पति नहीं है, बल्कि वह निश्छल प्रेम, निरंतर साधना और आंतरिक आत्मशुद्धि का एक विराट रूपक बनकर उभरता है।
जैसे वसंत में माधवी लता खिलती है, वैसे ही विपरीत परिस्थितियों में भी माधवी का प्रेम पुष्पित होता है। दूसरी ओर, ‘विष’ केवल किसी रासायनिक पदार्थ या शारीरिक अवस्था का सूचक नहीं है, बल्कि वह इस संसार में व्याप्त कुटिल राजनीति, मनुष्यों के स्वार्थ, साम्राज्यवादी विस्तार की अंधी भूख और समूची मानवीय क्रूरता का एक अत्यंत भयावह संकेतक बनकर सामने आता है। यह प्रतीक योजना उपन्यास को एक साधारण कहानी के स्तर से उठाकर वैश्विक मानवीय संकट के दस्तावेज़ में बदल देती है।
विनोद आनंद इस कृति के माध्यम से यह महान दार्शनिक सत्य स्थापित करते हैं कि प्रेम कोई साधारण, सतही या केवल एक भौतिक और भावनात्मक अनुभव मात्र नहीं है, बल्कि प्रेम तो अंततः आत्ममुक्ति और आत्मसाक्षात्कार की एक अत्यंत पवित्र और क्रांतिकारी प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम मनुष्य को कायर नहीं बनाता, बल्कि उसे अपनी परिस्थितियों से लड़ने और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का अदम्य साहस प्रदान करता है।
उपन्यास का चरम बिंदु तब आता है जब माधवी, जो अब तक व्यवस्था के हाथों प्रताड़ित हो रही थी, सत्ता की उस क्रूर, हिंसक और अमानवीय योजना का हिस्सा बनने से पूरी तरह इनकार कर देती है। वह राजाओं के अहंकार और पुरुषों के दंभ को चुनौती देते हुए अपनी नियति को अपने हाथों में ले लेती है।
वह यह तय करती है कि उसकी देह और उसके मन पर केवल और केवल उसका अपना अधिकार है। जब वह अपनी नियति स्वयं लिखना शुरू करती है, तो वह एक पीड़ित स्त्री से रूपांतरित होकर एक क्रांतिकारी चेतना बन जाती है। यही वह विद्रोही और गौरवशाली बिंदु है जो इस पूरी कृति को किसी भी साधारण, सतही प्रेमकथा की श्रेणी से बहुत ऊपर उठा देता है और इसे एक अत्यंत उच्च वैचारिक, सामाजिक और दार्शनिक धरातल प्रदान करता है।
यहाँ आकर प्रेम केवल दो शरीरों का मिलन नहीं रह जाता, बल्कि वह व्यवस्था के विरुद्ध एक मौन परंतु सबसे शक्तिशाली प्रतिवाद बन जाता है।
संकलन की दूसरी महत्वपूर्ण रचना ‘शकुंतला की मातृ-चेतना’ में भी लेखक की यही प्रगतिशील और नवोन्मेषी दृष्टि पूरी प्रखरता के साथ प्रतिध्वनित होती है। कालिदास के अभिज्ञानशाकुंतलम् और महाभारत की शकुंतला से इतर, विनोद आनंद की शकुंतला एक सर्वथा नए रूप में हमारे सम्मुख आती है। यहाँ लेखक ने मातृत्व की अवधारणा को रूढ़िवादी, पारंपरिक और संकीर्ण सीमाओं से पूरी तरह मुक्त कर दिया है। यहाँ मातृत्व केवल एक जैविक संबंध, पुत्र-मोह या केवल अपने वंश को आगे बढ़ाने की विवशता मात्र नहीं है। इसके विपरीत, लेखक ने इसे एक व्यापक मानवीय करुणा, असीम वात्सल्य और संपूर्ण चराचर जगत के संरक्षण की एक दैवीय शक्ति के रूप में अत्यंत भव्यता के साथ चित्रित किया है। इस उपन्यास में शकुंतला का मातृत्व केवल उसके पुत्र भरत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह समूची प्रकृति, वन के पशु-पक्षियों, लताओं और वृक्षों, अर्थात इस धरती की हर छोटी-बड़ी इकाई के प्रति एक गहन उत्तरदायित्व का भाव बनकर सामने आता है। वह एक ऐसी माता है जो केवल जननी नहीं है, बल्कि इस सृष्टि की रक्षक और पोषक भी है।
उसका यह मातृत्व पुरुष-सत्ता के उस दंभ को पराजित करता है जो केवल विजय और विनाश की भाषा समझता है। शकुंतला की यह मातृ-चेतना समाज को यह संदेश देती है कि संसार का कल्याण युद्धों या साम्राज्यों के विस्तार में नहीं, बल्कि मातृत्व की उसी करुणामयी और संरक्षणात्मक भावना में निहित है जो सबको समेट कर चलती है।
साहित्यकार विनोद आनंद की सबसे बड़ी सृजनात्मक विशेषता और उनकी सफलता यह है कि वे प्राचीन मिथकों को केवल एक कथा के रूप में नहीं देखते, बल्कि वे उन मिथकों को आज की आधुनिक संवेदनाओं, आज के द्वंद्वों और आज के सामाजिक सरोकारों से जोड़ते हुए उन्हें एक अत्यंत प्रासंगिक समकालीन संदर्भ प्रदान करते हैं। उनके द्वारा रचे गए या पुनर्जीवित किए गए पात्र नियति, भाग्य या देवताओं के हाथों संचालित होने वाली असहाय कठपुतलियाँ मात्र नहीं हैं। वे भाग्यवादी नहीं हैं जो परिस्थितियों के सामने घुटने टेक दें, बल्कि वे अपने विवेक, अपनी बुद्धि और अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर आत्मनिर्णय की क्षमता से संपन्न, पूर्णतः चेतन और जाग्रत व्यक्तित्व हैं।
वे अपनी नियति से लड़ते हैं, प्रश्न पूछते हैं और समाज की स्थापित व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करते हैं। यही मुख्य कारण है कि यह लघु उपन्यास-संकलन एक साथ तीन अलग-अलग परंतु अत्यंत महत्वपूर्ण स्तरों पर अपनी गहरी सार्थकता सिद्ध करता है—पहला, स्त्री-विमर्श के स्तर पर जहाँ यह स्त्री की अस्मिता और उसकी स्वतंत्रता की नई परिभाषा गढ़ता है; दूसरा, मिथकीय पुनर्रचना के स्तर पर जहाँ यह प्राचीन आख्यानों को आधुनिकता का चश्मा पहनाता है; और तीसरा, मानवीय संवेदना के स्तर पर जहाँ यह मनुष्यता के मूल तत्वों को पुनर्जीवित करता है।
कथा-शिल्प, संरचना और औपन्यासिक बुनावट की दृष्टि से भी यह संपूर्ण कृति हिंदी कथा-साहित्य में एक उल्लेखनीय और अनुकरणीय प्रतिमान स्थापित करती है। एक लघु उपन्यास के सीमित आकार और विधागत सीमाओं के भीतर रहते हुए भी लेखक ने कथ्य की जिस अगाध गहराई, वैचारिक विस्तार और दार्शनिक ऊँचाई को साधा है, वह उनकी असाधारण सृजनात्मक दक्षता, परिपक्वता और उनके प्रौढ़ लेखन का सजीव परिचायक है। उपन्यास के संवाद अत्यंत चुस्त, सारगर्भित और पैने हैं, जिनमें एक गहरी दार्शनिक गूंज सुनाई देती है। हर एक संवाद पाठक को सोचने पर मजबूर करता है। इसके साथ ही, लेखक के विवरणों और दृश्यों के अंकन में एक ऐसी सजीव दृश्यात्मकता है कि पूरी कथा पाठक की आँखों के सामने किसी जीवंत चित्रपट या नाटक की भाँति चलने लगती है। तपोवन का वातावरण हो, राजदरबार के षड्यंत्र हों या माधवी और शकुंतला के अंतर्मन का कोलाहल, सब कुछ अत्यंत प्रामाणिक और प्रभावी प्रतीत होता है। इस संकलन के कई प्रसंग और विचार-बिंदु इतने मर्मस्पर्शी और झकझोरने वाले हैं कि वे पुस्तक समाप्त होने के बाद भी पाठक के अवचेतन मन में बहुत लंबे समय तक वैचारिक उद्वेलन और गहरी संवेदना का कंपन बनाए रखते हैं।
निष्कर्षतः और समग्र रूप से देखा जाए तो, निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि वरिष्ठ पत्रकार और मूर्धन्य साहित्यकार विनोद आनंद का यह लघु उपन्यास-संकलन समकालीन हिंदी साहित्य की उस महान, गौरवशाली और समृद्ध परंपरा को और अधिक सशक्त तथा ऊर्जावान बनाता है, जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम, असीम करुणा, अटूट आत्मसम्मान और आत्मबोध की अनंत संभावनाओं की निरंतर तलाश करती है। विनोद आनंद ने अपनी इस ओजस्वी और संवेदनशील लेखनी से यह पूरी तरह प्रमाणित और सिद्ध कर दिया है कि जब उच्च कोटि का साहित्य शुद्ध मानवीय संवेदना, गहरी सामाजिक चिंता और गहन दार्शनिक चिंतन के साथ एकाकार होता है, तब वह केवल मनोरंजन की वस्तु या समय काटने वाली एक साधारण कथा मात्र नहीं रह जाता।