एक शिक्षक थे। नया स्कूल था, नई जिम्मेदारी थी और बहुत-सी उम्मीदें भी।
वह रोज़ समय से पहले स्कूल पहुँचते। कक्षा में बच्चों के चेहरे देखते और सोचते-
“इनमें से हर बच्चा कुछ बन सकता है, बस इसे सही दिशा और थोड़ा विश्वास चाहिए।”
लेकिन हर किसी को उनकी मेहनत दिखाई नहीं देती थी।

एक दिन स्टाफ रूम में किसी ने कह दिया-
“आपका पढ़ाने का तरीका ही गलत है।”
दूसरे ने हँसकर कहा-
“आपसे यह सब नहीं हो पाएगा।”
किसी ने तंज कसते हुए कहा-
“आपसे पहले भी कितने लोग आए और चले गए… देखते हैं आप कितने दिन टिकते हैं।”
कुछ लोग उनकी बातों पर हँसे भी।
शिक्षक चुप रहे।
उस दिन घर लौटते समय उनके कदम थोड़े भारी थे। मन में बार-बार वही बातें घूम रही थीं।लेकिन अगले दिन जब वे कक्षा में पहुँचे, तो एक कमजोर छात्र उनके पास आया। उसने धीरे से कहा-“सर, कल जो सवाल मैं नहीं कर पाया था, आज मैंने खुद कर लिया।”
शिक्षक ने उसकी कॉपी देखी। उत्तर सही था।
बच्चे के चेहरे पर जो खुशी थी, वह किसी भी प्रशंसा से बड़ी थी।शिक्षक मुस्कुराए और बोले-
“देखा! मैंने कहा था न, तुम कर सकते हो।”
उस छोटे-से क्षण ने शिक्षक को भीतर से बदल दिया।
उन्हें समझ आया कि हर लड़ाई का जवाब शब्दों से देना जरूरी नहीं होता। कुछ जवाब समय देता है।
उन्होंने फिर वही किया जो एक शिक्षक को करना चाहिए था-पढ़ाया, समझाया, गलतियों पर डाँटा, सफलता पर हौसला बढ़ाया और हर दिन खुद को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश की।
कुछ साल बाद उसी स्कूल का एक पुराना छात्र उनसे मिलने आया। वह एक अच्छी नौकरी में था।
उसने शिक्षक के पैर छुए और कहा-“सर, अगर आपने उस समय मुझसे यह नहीं कहा होता कि ‘तुम कर सकते हो’, तो शायद मैं आज यहाँ नहीं होता।”
शिक्षक कुछ बोल नहीं पाए।
उनकी आँखों में आँसू थे।
उन्हें उस दिन स्टाफ रूम की बातें याद आईं—
“आपसे नहीं होगा…”
वक्त ने अपना जवाब दे दिया था।
संस्कृत में कहा गया है-“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।”
गुरु का स्थान इसलिए बड़ा नहीं है कि वह कितना बोलता है, बल्कि इसलिए है कि वह किसी और के जीवन में कितना उजाला भर पाता है।
शिक्षकों के लिए,अगर कभी कोई कहे- “आप गलत पढ़ाते हैं।”
तो सीखने की गुंजाइश हो तो सीखिए।
अगर कोई कहे-
“आपसे नहीं होगा।”
तो इसे चुनौती मत बनाइए, अपने काम को जवाब बनने दीजिए।
अगर कोई आपका मज़ाक उड़ाए, तो याद रखिए-
जिस व्यक्ति को अपने उद्देश्य पर विश्वास होता है, उसे हर आवाज़ का जवाब देने की जरूरत नहीं होती।
और सबसे बड़ी बात-शिक्षक का असली पुरस्कार कोई पद, प्रशंसा या सम्मान नहीं है।
उसका असली पुरस्कार वह दिन है, जब उसका कोई विद्यार्थी लौटकर कहे-“सर/मैडम, आपकी वजह से मैं आज यहाँ हूँ।”
उस दिन शिक्षक समझ जाता है-उसकी सारी मेहनत बेकार नहीं गई।