
समीक्षक :-सिनोद कुमार मंडल
.नेत्र चिकित्सक,केवटी, दरभंगा
समीक्षक का आत्म कथ्य -साहित्य अध्ययन मे रुचि औऱ उसके विश्लेषण करने का प्रयास रहता है, बाजपट्टी संग्राम के नायक:रामफल मंडल को पढ़ कर मैंने जो अनुभव किया उसकी समीक्षा का एक छोटा सा प्रयास
विनोद आनंद द्वारा रचित उपन्यास ‘बाजपट्टी संग्राम के नायक: रामफल मंडल’ को यदि केवल एक व्यक्ति की जीवनी समझ लिया जाए तो यह पुस्तक के प्रति घोर अन्याय होगा। यह कृति वास्तव में 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान बिहार की धरती पर लहू की नदियाँ बहा देने वाले उन सैकड़ों अनाम, गुमनाम और इतिहास के हाशिये पर धकेल दिए गए शहीदों का वृहद, संवेदनशील और महाकाव्यात्मक आख्यान है।
रामफल मंडल इस कथा का केंद्र अवश्य है, पर लेखक ने उनके संघर्ष को एक विस्तृत कैनवास पर फैलाया है, जिसमें पटना से लेकर सासाराम, कटिहार से झंझारपुर, सुपौल से मधेपुरा तक के उन वीरों की गाथाएँ जीवंत हो उठती हैं, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास ने लंबे समय तक नेपथ्य में बनाए रखा।
यह उपन्यास न तो महज़ जीवनी है और न ही साधारण ऐतिहासिक उपन्यास। यह इतिहास के मूक पन्नों को संवेदना की स्याही से सींचकर एक जीवंत महाकाव्य में बदल देने वाली कृति है।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह निर्णायक अध्याय था, जब गांधी जी के “करो या मरो” के आह्वान ने पूरे देश को हिला दिया। बिहार इस आंदोलन का सबसे उग्र और जन-आधारित केंद्र बना। पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सीतामढ़ी, मधेपुरा, सुपौल और कटिहार जैसे क्षेत्रों में किसान, मजदूर, किशोर और महिलाएँ सड़कों पर उतर आए। सरकारी दफ्तरों पर कब्जा, रेल की पटरियाँ उखाड़ना, थानों पर धावा और तिरंगा फहराना आम बात हो गई।
पर इस जन-विस्फोट के पीछे जो लहू बहा, जिन किशोरों ने गोलियाँ खाईं, जिन गर्भवती पत्नियों ने अपने पतियों को अंतिम विदा दी, और जिन गरीब किसानों ने फाँसी के फंदे को हँसते-हँसते चूमा — उनके नाम इतिहास की किताबों में प्रायः नहीं मिलते। विनोद आनंद ने इन्हीं विस्मृत नायकों को अपनी कथा का नायक बनाया है।
उपन्यास का आरंभ सीतामढ़ी जिले के बाजपट्टी प्रखंड के छोटे से गाँव मधुरापुर से होता है। यहाँ जमींदार अवनि झा और उनके भाई रामचंद्र झा की सामंती जकड़न पूरे गाँव को जकड़े हुए है।

“चानमारी” पर सुनाए जाने वाले फैसले, एक पसेरी धान के कर्ज के लिए गोकुल मंडल जैसे गरीब किसान की विवशता, और पूस की अमावस्या की रात तहसीलदार के नेतृत्व में धानुक-यादव टोलों पर बरपाया जाने वाला अत्याचार — लेखक ने इन दृश्यों को अत्यंत सूक्ष्मता से उकेरा है। रामफल के बचपन में कबड्डी के मैदान में सवर्ण लड़कों द्वारा उसे “सोलकन” कहकर दुत्कारने का प्रसंग उपन्यास का एक निर्णायक क्षण है। रामफल का प्रतिवाद — “क्यों नहीं हूँ? क्या तेरे शरीर में गंगा बहती है और मेरे में नाला? … मैं तुझे फिर छूऊँगा … बार-बार छूऊँगा!” — भारतीय समाज की जातिगत असमानता के विरुद्ध एक स्पष्ट विद्रोही शंखनाद है।
यह प्रसंग केवल रामफल के व्यक्तित्व का निर्माण नहीं करता, बल्कि पूरे उपन्यास की वैचारिक भूमि तैयार करता है। लेखक स्पष्ट करता है कि अंग्रेजी हुकूमत और देशी सामंत एक ही सिक्के के दो पहलू थे। लगान का आतंक, बेचू महतो की नंगी पीठ पर चमड़े के हंटर से खून बहाना, और किसानों के मवेशी खोल लेने की घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि विदेशी सत्ता और स्थानीय शोषण साथ-साथ चल रहे थे। रामफल का अपनी माँ गरबी के रोकने के बावजूद तहसीलदार के सामने सीना तानकर खड़ा होना इस बात का संकेत है कि उसके मन से भय पूरी तरह समाप्त हो चुका था।
पर लेखक रामफल की कथा को एक अकेले नायक की जीवनी तक सीमित नहीं रखता। वह बिहार के विभिन्न अंचलों के उन ऐतिहासिक शहीदों को कथा-प्रवाह में इस तरह पिरोता है कि वे रामफल के संघर्ष के अभिन्न अंग बन जाते हैं। 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय के सात अमर किशोर — उमाकांत प्रसाद सिन्हा, सतीश चंद्र झा, जगतपति कुमार, देवी पद चौधरी, राजेंद्र सिंह और रामगोविंद सिंह — की शहादत का वर्णन उपन्यास के सबसे मार्मिक अंशों में से एक है। सचिवालय की गुंबद पर तिरंगा फहराने का प्रयास करते हुए ये किशोर गोलियों से छलनी हो गए। लेखक ने इस दृश्य को इस तरह चित्रित किया है कि पाठक स्वयं उस भीड़ का हिस्सा बन जाता है।
13 अगस्त को जयनगर के नथुनी साह पुलिस की गोलियों का सामना करते हुए तिरंगे को नीचे नहीं गिरने देते। उसी दिन कटिहार के मात्र तेरह वर्षीय ध्रुव कुंडू अंग्रेजी ट्रेन और पटरी उखाड़ने के दौरान ब्रिटिश बूटों तले कुचले जाते हैं, पर उनकी जुबान पर अंतिम क्षण तक “वन्दे मातरम्” गूँजता रहता है। सासाराम के जगदीश, महंगू राम और गुजर धोबी की गाथा और भी हृदयविदारक है। गुजर धोबी शादी के मात्र सात दिन बाद ही देश के लिए प्राण न्यौछावर कर देते हैं। झंझारपुर के पंचानन झा और पूरन मंडल कमला नदी के तट पर गोलियों से छलनी होते हैं, पर उनकी अंतिम साँस में यह संकल्प गूँजता है कि “हर बूँद खून से नया पंचानन पैदा होगा।”
रतनपुर के प्रदीप ठाकुर और मोहम्मद बिलट दर्जी हिंदू-मुस्लिम एकता और साझा शहादत का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। कटैया की वीरांगना सरस्वती देवी और सत्यनारायण सिंह महिलाओं की क्रांतिकारी भागीदारी का जीवंत दस्तावेज हैं।
इन प्रसंगों को लेखक ने कथा के स्वाभाविक प्रवाह में इस तरह समाहित किया है कि वे अलग-अलग घटनाएँ नहीं, बल्कि एक ही महान संग्राम की विभिन्न कड़ियाँ लगती हैं। रामफल जब अपनी गर्भवती पत्नी जगपतिया को नेपाल सीमा के पास मायके विदा करता है, तो उसके मन का मानवीय द्वंद्व उपन्यास के भावनात्मक चरम पर पहुँच जाता है।
राष्ट्रधर्म और परिवार के बीच का यह संघर्ष किसी भी महान क्रांतिकारी की कहानी का अपरिहार्य अंग है। तुरंत बाद बाजपट्टी चौक पर एस.डी.ओ. हरदीप सिंह और इंस्पेक्टर राममूर्ति झा के अमानवीय दमन के विरुद्ध रामफल का प्रहार इस बात का प्रतीक बन जाता है कि जब सत्ता अंधी और बहरी हो जाती है, तो जनता का संयम विद्रोह की ज्वाला में बदल जाता है। रामफल और उनके साथियों का हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूमना उपन्यास को अमर बना देता है।
लेखक यहीं नहीं रुकता। वह बाजपट्टी से आगे बढ़कर मिथिलांचल और कोसी क्षेत्र के अन्य अमर सेनानियों को भी कथा में समेट लेता है। सुपौल के केदार नाथ ने युवाओं की एक प्रखर टोली तैयार की और सरकारी कचहरी, डाकघर तथा पुलिस थानों पर धावा बोला। जब अंग्रेजी फौज उन्हें पकड़ने पहुँची, तो उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय सीने पर गोलियाँ खाईं। अंग्रेजों ने उनके शव को भी अपमानित करने की कोशिश की, पर जनता का आक्रोश और भड़क उठा।
मधेपुरा के चूल्हे मंडल ने गाँव-गाँव घूमकर किसानों को लगानबंदी और ब्रिटिश हुकूमत के बायकॉट के लिए संगठित किया। उनके नाम से बड़े-बड़े जमींदार और गोरे अधिकारी थरथराते थे। मौजे झा ने मधेपुरा और आसपास के थानों पर हमला बोलकर सरकारी अभिलेखों को आग के हवाले कर दिया। अमानवीय यातनाओं के बावजूद उन्होंने एक शब्द भी नहीं उगल। उनका संकल्प — “प्राण भले ही चले जाएँ, अंग्रेजों के सामने सिर नहीं झुकेगा” — मधेपुरा के जन-मानस में अमर हो गया।
इन सभी चरित्रों और घटनाओं को जोड़ते हुए लेखक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 1942 की क्रांति केवल शहरों के पढ़े-लिखे वकीलों और नेताओं की नहीं थी। यह गाँवों के हल चलाने वाले किसानों, झोपड़ियों में रहने वाले गरीबों, किशोरों और महिलाओं की सामूहिक हुंकार थी।
रामफल मंडल इसी सामूहिक चेतना का प्रतीक हैं। वे अकेले नायक नहीं, बल्कि उन तमाम अनाम शहीदों की आवाज हैं जिन्हें इतिहास ने भुला दिया था।
साहित्यिक दृष्टि से यह उपन्यास फणीश्वरनाथ रेणु की आंचलिक शैली और प्रेमचंद की यथार्थवादी चेतना का अद्भुत सामंजस्य प्रस्तुत करता है। मधुरापुर का गाँव, उसकी बोली, रीति-रिवाज, सामंती संरचना और किसानों की मनोदशा — सब कुछ इतनी प्रामाणिकता से चित्रित किया गया है कि पाठक स्वयं उस परिवेश का हिस्सा बन जाता है। संवाद स्वाभाविक हैं, घटनाएँ नाटकीय होते हुए भी अतिरंजित नहीं लगतीं, और भावनात्मक क्षण संवेदनशीलता से भरे हुए हैं।
लेखक ने ऐतिहासिक साक्ष्यों का सम्मान करते हुए कल्पना का ऐसा प्रयोग किया है कि इतिहास जीवंत हो उठा है। आज जब हम स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी इतिहास के कुछ चुनिंदा नामों को ही दोहराते रहते हैं, तब विनोद आनंद की यह कृति हमें याद दिलाती है कि आज़ादी की कीमत केवल कुछ प्रसिद्ध नेताओं ने नहीं चुकाई। इसके पीछे हज़ारों माताओं के आँसू, किशोरों का लहू और हुंकार भरते वीरों के सर्वोच्च बलिदान की लंबी दास्तान जुड़ी है। बाजपट्टी के रामफल मंडल, पटना के सात किशोर, जयनगर के नथुनी साह, कटिहार के ध्रुव कुंडू, सासाराम के गुजर धोबी, झंझारपुर के पंचानन झा, रतनपुर के प्रदीप ठाकुर और मोहम्मद बिलट दर्जी, कटैया की सरस्वती देवी, सुपौल के केदार नाथ, मधेपुरा के चूल्हे मंडल और मौजे झा — ये सभी नाम आज भी बिहार की माटी में स्वाभिमान का दूसरा नाम बने हुए हैं।
यह उपन्यास केवल अतीत की स्मृति नहीं है। यह वर्तमान के लिए एक चुनौती भी है। यह पूछता है कि क्या हम इन विस्मृत नायकों को केवल पन्नों तक सीमित रखेंगे, या उनकी स्मृतियों को आने वाली पीढ़ियों के दिल में बसाएँगे?
क्या बाजपट्टी, सुपौल और मधेपुरा की वह पावन आग हमेशा प्रज्वलित रहेगी? विनोद आनंद ने इस प्रश्न का उत्तर अपनी कथा के माध्यम से दे दिया है। उन्होंने इतिहास के हाशिये पर धकेले गए नायकों को फिर से मुख्य मंच पर ला खड़ा किया है।
‘बाजपट्टी संग्राम के नायक: रामफल मंडल’ एक ऐसी कृति है जो इतिहास, साहित्य और संवेदना का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है। यह रामफल मंडल की जीवनी नहीं, बल्कि 1942 की क्रांति के उन तमाम गुमनाम शहीदों की सामूहिक दास्तान है, जिन्हें इतिहास ने हाशिये पर रखा था। लेखक ने अपनी लेखनी से इन शहीदों को अमर कर दिया है। यह पुस्तक हर उस पाठक को पढ़नी चाहिए जो यह जानना चाहता है कि आज़ादी की असली कीमत क्या थी, और किन-किन अनाम हाथों ने उस कीमत को चुकाया। विनोद आनंद की यह कृति इतिहास के मूक पन्नों को आवाज देती है, और उस आवाज में बाजपट्टी से लेकर पूरे बिहार तक की हुंकार गूँजती है।