कवि डॉ शिरीष सुमन की कलम से
नभ के नीले विस्तारों में, जब ढलती संध्या आती है,
तब तेरी स्मृतियों की छाया, उर में दीप जलाती है।
हे अपर्णा! तू है सीमा, मैं हूँ बस एक किनारा,
तेरी अनुपम काया का अब, नभ में चित्र सजाती है।
तारे टिमटिमाते हैं जो, वे तेरी ही आँखें हैं,
ठंडी साँसों की लहरों में, तेरी ही बातें हैं।
मेरे सूनेपन की वीणा, अब मौन साध बैठी है,
छंदों की इस मरु-भूमि में, खोई हुई रातें हैं।
शिरीष की यह लेखनी जब भी, तेरा नाम उकेरती है,
स्याही भी तब आँखों बनकर, पन्नों पर ही बिखरती है।
तू है वह मलयज समीर जो, छूकर मुझे निकल गई,
मेरी हर एक आह अब तुझसे, मिलने को ही तड़पती है।
बिखर गए हैं सुर मेरे, परिभाषाएँ खोई-खोई,
तेरे बिना ये सृष्टि मुझे, लगती है निद्रा में सोई।
तूने जो बोई थी ममता, वह शूल बन गई हृदय में,
मेरी विरहाग्नि में देखो, रूह मेरी है अब रोई।
हे प्रिय! उस पार बैठी तुम, क्या सुनती हो मेरी पुकार?
अस्तित्व मेरा मिट रहा है, सहकर यह विरह का भार।
तू आदि और तू ही अंत है, इस व्याकुल जीवन की,
तुझ बिन शिरीष की कविता भी, है बस एक अश्रु-धार।