अपर्णा : कर्म की ज्योत
(विनोद आनंद )
वह नहीं एक साधारण नारी,
वह ज्वाला का अवसान नहीं,
वह ज्ञान-धार, वह करुणा है,
वह केवल रूप विधान नहीं।
गोविंदपुर की तप्त भूमि से,
जिसने शिक्षा का दीप जलाया,
अंधकार के उस युग में भी,
नव-चेतना का राग सुनाया।
न वह ‘अबला’ थी, न ‘दुर्बल’ थी,
वह तो संकल्पों की पाषाण थी,
चुनौतियों के तीखे शूलों पर,
चलकर बनी यश-गाथा महान थी।
कर लिया जयन, जो कठिन पथ था,
वह केवल रीत निभाती थी,
वह स्वयं नदी बनकर बहती,
और मर्यादाओं को अपनाती थी।
लायंस की वह गूंज बनी,
सेवा का उसने शंख बजाया,
नारी-शक्ति के सोए गौरव को,
उसने मुखर स्वर में जगाया।
भ्रूण-हत्या हो, या दहेज की
कुत्सित प्रवृत्तियां घोर,
उसने अपनी हुंकार भरी,
और दमन किया उस ओर।
न की कामना फल की उसने,
निष्काम कर्म ही धर्म बनी ,
सादा जीवन ओढ़ लिया,
बस सादगी ही उसका मर्म बनी ।
जब तक सूरज-चांद रहेंगे,
जब तक यह माटी गूंजती रहेगी,
तब तक अपर्णा की अमर कीर्ति,
समय की धारा में पूजती रहेगी।
वे मरी नहीं, वे जीवित हैं,
उन संकल्पों की मशालों में,
जो अब भी जलते रहते हैं,
गोविंदपुर की हर एक ढालों में।
तुम साक्षात ओज की प्रतिमा,
तुम कर्म-पथ की आधार हो,
गोविंदपुर की उन गलियों का,f
तुम आज भी श्रृंगार हो।
तुम मिट्टी में रची-बसी हो,
तुम जन-जन की पहचान हो,
तुम कालजई, तुम अजरामर,
तुम ही तो महान अभियान हो।
हे कर्मयोगिनी! हे ज्योतिर्मयी!
तुम शत-शत बार प्रणाम तुम्हें,
शिक्षा, करुणा, सृजन के पथ पर,
समर्पित यह निज नाम तुम्हें।
तुमने न केवल पथ दिखाया,
तुम स्वयं पथ की मशाल बनी,
अंधियारे में भी जगमगाती,
तुम एक अमर सुविशाल बनी।