यदि भारत की संस्कृति को समझना हो, तो ट्रेन में सफर करके देखिए। वहाँ विभिन्न प्रकार के लोगों से मुलाकात होती है। सबके विचार अलग-अलग होते हैं। कभी विचार मिल जाते हैं, तो कभी विपरीत विचारों वाले लोग भी टकरा जाते हैं। और असली मज़ा तब आता है, जब विपरीत विचारों के बावजूद शालीनता से बहस हो।
आत्मकथ्य–
जीवन एक अथाह सागर है,
जिसकी गहराइयों में अनमोल मोती भी छिपे हैं
और भयावह ऑक्टोपस भी।
मैं हर अनुभव में उतरकर
उन्हीं मोतियों को चुन लेने का प्रयास करता हूँ, जो मन को उजास दें और जीवन को अर्थ प्रदान करें।
मो.इलियास अंसारी
शिक्षक,म वि जयनगर,गोविंदपुर (धनबाद
सन् 2006 के जून महीने की बात है। मैं अपने छोटे पुत्र—जो उस समय लगभग सात वर्ष का था—के इलाज के लिए उसे वेल्लोर लेकर गया था। उस दौर में आज जैसी भीड़-भाड़ और आपाधापी नहीं हुआ करती थी।
यात्रा के दौरान ट्रेन में मेरी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई। वह ओडिशा के रहने वाले थे और लेबर कॉन्ट्रैक्टर का काम करते थे।
अगल-बगल की सीट होने के कारण हम दोनों में बातचीत शुरू हो गई। धीरे-धीरे परिचय बढ़ा, तो पारिवारिक बातें भी होने लगीं।
मैंने उनसे पूछा,
“आप कहाँ जा रहे हैं?”
उन्होंने कहा,
“पहले मद्रास जाऊँगा, वहाँ कुछ काम है। उसके बाद मुंबई चला जाऊँगा।”
मैंने फिर पूछा,
“परिवार में कौन-कौन हैं?”
उन्होंने हल्की उदासी के साथ कहा,
“सब हैं—माँ, पिताजी, भाई, भाभी और भतीजा। लेकिन कोई भी नहीं चाहता कि मैं घर में कुछ दिन भी रहूँ।”
फिर एक लंबी साँस लेते हुए वे बोले,
“घर में अब माँ-पिताजी की बात चलती नहीं है। भैया-भाभी को सिर्फ पैसे से मतलब है। पैसे के लिए मुझे कोल्हू के बैल की तरह लगातार काम करना पड़ता है। मैं अपने सारे अरमानों का गला घोंटकर सबकी ज़रूरतें पूरी कर रहा हूँ।”
उनकी बातें सुनकर मन भारी हो गया। सचमुच, इस विशाल दुनिया में कितने प्रकार के लोग होते हैं! कोई अपने सपनों के लिए जीता है, तो कोई अपने परिवार के लिए स्वयं को मिटा देता है। धन्य हैं वे लोग, जो अपने अरमानों की बलि देकर परिवार को सँभालते हैं; पता नहीं वे किस मिट्टी के बने होते हैं।
खैर, वेल्लोर पहुँचकर बेटे का इलाज कराया। उस समय वहाँ ईमानदारी काफी देखने को मिलती थी, हालाँकि आज उसमें कुछ कमी महसूस होती है। इसका कारण कहीं न कहीं हम लोग स्वयं भी हैं। आजकल वहाँ भी पैसे को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। जहाँ इंसानियत से ऊपर धन को रखा जाने लगता है, वहाँ मौकापरस्ती बढ़ती है और लोग धीरे-धीरे बेईमान तथा ठग बनने लगते हैं।
इलाज के बाद वापसी का टिकट पहले से था। नियत तिथि पर हम ट्रेन से वापस लौटने लगे। मेरे सामने वाली बर्थ पर बोकारो के कुछ लोग पूरे परिवार के साथ यात्रा कर रहे थे। बातचीत के दौरान पता चला कि वे अपनी लगभग अस्सी वर्ष की वृद्ध माँ का इलाज करवाकर लौट रहे हैं।
सफर में यदि बातचीत करने वाले लोग मिल जाएँ, तो यात्रा आसान हो जाती है। ऊपर से वे लोग भी नज़दीकी जिले के ही थे, इसलिए एक अपनापन महसूस हो रहा था।
एक विचार: यदि भारत की संस्कृति को समझना हो, तो ट्रेन में सफर करके देखिए। वहाँ विभिन्न प्रकार के लोगों से मुलाकात होती है। सबके विचार अलग-अलग होते हैं। कभी विचार मिल जाते हैं, तो कभी विपरीत विचारों वाले लोग भी टकरा जाते हैं। और असली मज़ा तब आता है, जब विपरीत विचारों के बावजूद शालीनता से बहस हो।
इन लोगों के विचार मुझसे काफी मिलते-जुलते थे, इसलिए कोई विशेष बहस नहीं हुई।
रात के तीन बजे की वह घटना
रात लगभग तीन बजे की बात है। अचानक बोकारो वाले भाई साहब ने मुझे जगाया। मैंने देखा कि उनके हाथ में एक प्लास्टिक का पैकेट था।
मैंने पूछा,
“इसमें क्या है?”
उन्होंने कहा,
“इसमें रुपए हैं।”
मैंने पूछा,
“कहाँ मिला?”
उन्होंने बताया,
“टॉयलेट के सामने गिरा हुआ था।”
मैंने कहा,
“पुलिस को आने दीजिए, उन्हें ही सौंप देंगे।”
करीब एक घंटे बाद एक युवक घबराया हुआ-सा डिब्बे में इधर-उधर कुछ ढूँढ़ता दिखाई दिया। उसका चेहरा उतरा हुआ था और वह बेहद परेशान लग रहा था।
मैंने उससे पूछा,
“क्या खोज रहे हो भाई?”
उसने लगभग रोते हुए कहा,
“मैं एक छात्र हूँ। बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लेने जा रहा हूँ। मेरे पैसे और सारे सर्टिफिकेट एक प्लास्टिक के पैकेट में थे, पता नहीं कहाँ गिर गए!”
हम लोगों ने उससे नाम-पता पूछा और पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद वह पैकेट उसके हवाले कर दिया।
पैकेट पाकर उस लड़के ने भावुक होकर धन्यवाद दिया। तब मैंने कहा,
“धन्यवाद के असली पात्र तो ये बोकारो वाले भाई साहब हैं।”
उस व्यक्ति की ईमानदारी देखकर मुझे यह दृढ़ विश्वास हो गया कि आज भी दुनिया में ऐसे लोग मौजूद हैं, जो पैसों से बढ़कर इंसानियत और ईमानदारी को महत्व देते हैं। शायद ऐसे ही भले लोगों के सहारे यह पृथ्वी टिकी हुई है, वरना पता नहीं कब रसातल में चली जाती।
उस घटना के बाद मैंने अपने मन को समझाया कि निराश होने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। आज भी इस दुनिया में अच्छाई और अच्छे लोग ज़िंदा हैं।