“परिवर्तन ही जीवन का शाश्वत नियम है; जो केवल अतीत या वर्तमान में उलझे रहते हैं, वे निश्चित ही अपने भविष्य को खो देते हैं।”
बदलते परिवेश में संबंध, अपेक्षाएँ और स्त्री की भूमिका

आलेख :-शीला पात्रो
(साहित्यकार, कवयित्री एवं शिक्षिका )
आत्मकथ्य–
अनजाने ही मन की नीरव तरंगें
शब्दों में ढल जाती हैं,
और हृदय में छिपे जज़्बात
कागज़ पर अपनी पहचान बना लेते हैं। मेरी कविताएँ वही आवाज़ हैं,
जो अक्सर मन की गहराइयों में जन्म लेती हैं।
शीला पात्रो
प रिवर्तन—यह शब्द श्रवण में जितना सहज प्रतीत होता है, इसका प्रभाव उतना ही व्यापक, गहन और दूरगामी होता है। यह केवल बाह्य परिस्थितियों का रूपांतरण नहीं, अपितु हमारे विचारों, व्यवहारों, अंतःसंबंधों और जीवनशैली में आने वाला एक सतत प्रवाह है। कालक्रम के साथ परिवर्तित होना प्रकृति का नियम है, और जो इस गत्यात्मकता को आत्मसात कर स्वयं को ढाल लेते हैं, वही जीवन-पथ पर अग्रसर होते हैं। समकालीन युग तीव्र गति से परिवर्तित होता युग है, जहाँ प्रतिदिन वैचारिक नवता, अभूतपूर्व चुनौतियाँ और असीम अवसर हमारे सम्मुख उपस्थित होते हैं। वर्तमान में समाज, परिवार और व्यक्ति—सभी एक संक्रांति काल से गुजर रहे हैं, जहाँ रूढ़िगत परंपरा और आधुनिकता के मध्य एक अनवरत संवाद चल रहा है। यही संवाद हमारे संबंधों, मानवीय अपेक्षाओं और विशेषकर स्त्री की भूमिका को एक सर्वथा नए दृष्टिकोण से परिभाषित कर रहा है।
अतीत के मूल्य बनाम वर्तमान का यथार्थ
यदि हम अतीत की ओर दृष्टिपात करें, तो पाएँगे कि तब संबंधों की प्राचीर विश्वास, त्याग, सहिष्णुता और सामंजस्य जैसे शाश्वत मूल्यों पर टिकी थी। रिश्तों में एक स्थायित्व था, सघनता थी और आत्मीयता का अनन्य भाव था। लोक भले ही भौतिक संपदा से परिपूर्ण न रहे हों, किंतु वे भावनात्मक रूप से अत्यंत समृद्ध थे। तब परिवार मात्र एक सामाजिक संस्था नहीं, वरन एक ऐसा सुरक्षित और आत्मीय आश्रय था, जहाँ प्रत्येक सदस्य को बिना किसी शर्त के स्वीकार किया जाता था। वहाँ संबंधों में स्वार्थ के स्थान पर समर्पण और अपेक्षाओं के स्थान पर परस्पर समझ का वास था।
किंतु जैसे-जैसे समय का चक्र घूमा, जीवन की गति तीव्र हुई और समाज आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल हुआ, वैसे-वैसे संबंधों का नैसर्गिक स्वरूप भी परिवर्तित होता गया। आज रिश्तों में अपेक्षाओं का बोझ अधिक है, समय का नितांत अभाव है और धैर्य की कमी स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। व्यक्ति अब समष्टि के स्थान पर अपनी व्यक्तिगत पहचान और स्वायत्तता को प्राथमिकता देने लगा है। यह एक सीमा तक सकारात्मक परिवर्तन है, क्योंकि प्रत्येक इकाई को अपने जीवन के निर्णय लेने का संप्रभु अधिकार होना ही चाहिए। परंतु, जब यह स्वतंत्रता आत्मकेंद्रित मरुस्थल में बदल जाती है, तब संबंधों में अपरिहार्य दूरियाँ पनपने लगती हैं।
स्वतंत्रता और सह-अस्तित्व का संतुलन
आज महती आवश्यकता इस बात की है कि हम वैयक्तिक स्वतंत्रता और पारस्परिक संबंधों के मध्य एक विवेकपूर्ण संतुलन स्थापित करें। हमें यह बोध होना चाहिए कि संबंध केवल अधिकारों का अखाड़ा नहीं हैं, बल्कि वे कर्तव्यों, संवेदनाओं और मूक त्याग का सुंदर समन्वय हैं। यदि हम केवल अपनी आकांक्षाओं के केंद्र में जिएंगे और दूसरों की भावनाओं की उपेक्षा करेंगे, तो संबंधों की अंतःसलिला सूख जाएगी और उनकी जड़ें कमजोर हो जाएँगी। अतः यह अनिवार्य है कि हम एक-दूसरे को पर्याप्त समय दें, परस्पर संवाद को जीवित रखें और जीवन के लघु-लघु उल्लासों को साथ मिलकर साझा करें।
स्त्रीत्व का नव-विहान: रूढ़ियों से संप्रभुता तक
इस संपूर्ण युगीन परिवर्तन का सबसे मुखर और प्रभावी स्वरूप स्त्री की बदलती भूमिका में परिलक्षित होता है। एक कालखंड वह था जब स्त्री को गृह की चौखट तक सीमित कर दिया गया था। उसकी अस्मिता को केवल उसके पारिवारिक संबंधों—जैसे माता, भगिनी, पत्नी या पुत्री—के संकुचित दायरे में ही परिभाषित किया जाता था। वह निर्णय लेने के अधिकार से वंचित थी, और उसकी दमित इच्छाओं को प्रायः सामाजिक रूढ़ियों के तले कुचल दिया जाता था। परंतु आज की स्त्री ने शिक्षा, स्वावलंबन, विज्ञान, राजनीति, कला और सामाजिक सरोकारों जैसे प्रत्येक क्षेत्र में अपनी मेधा और अदम्य क्षमता का परचम लहराया है।
आज की स्त्री पूर्णतः आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और अपने मानवीय अधिकारों के प्रति पूर्णतः सजग है। उसने सप्रमाण सिद्ध कर दिया है कि वह किसी भी मोर्चे पर पुरुषों से कमतर नहीं है। वह अपने स्वप्नों को यथार्थ में बदलने का सामर्थ्य रखती है और अपने कृतित्व के बल पर समाज में अपनी स्वतंत्र पहचान निर्मित कर रही है। यह युगांतरकारी परिवर्तन केवल स्त्री-विमर्श के लिए ही नहीं, अपितु संपूर्ण समतामूलक समाज के लिए एक शुभ संकेत है।
दोहरी भूमिका का द्वंद्व और मूक संघर्ष
परंतु इस आलोकित वितान के पीछे एक स्याह यथार्थ यह भी है कि स्त्री के सम्मुख चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुई हैं, बल्कि वे और अधिक जटिल व बहुआयामी हो गई हैं। आज की स्त्री को ‘घर’ और ‘बाहर’ दोनों ही मोर्चों पर दोहरी जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करना पड़ रहा है। वह कार्यस्थल पर अपने व्यावसायिक कौशल और कठोर परिश्रम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाती है, और घर लौटकर उसी समर्पण भाव से संपूर्ण परिवार की परिचर्या भी करती है। समाज उससे यह अपेक्षा रखता है कि वह प्रत्येक भूमिका में पूर्णता (परफेक्शन) सिद्ध करे—वह एक आदर्श कर्मचारी भी हो, एक स्नेही माता भी, एक समर्पित संगिनी भी और एक उत्तरदायी वधु भी।
यह अंतहीन दोहरी अपेक्षा उसे मानसिक और शारीरिक रूप से जर्जर कर देती है। कई बार इस चक्रव्यूह में वह अपनी इच्छाओं, अपने स्वास्थ्य और अपनी स्वयं की संवेदनाओं को नेपथ्य में धकेल देती है। विडंबना यह है कि उसके इस अनवरत संघर्ष को ‘सामान्य’ मानकर उपेक्षित कर दिया जाता है, जबकि वास्तव में यह समाज से एक गहरी संवेदनशीलता और कृतज्ञतापूर्ण समझ की माँग करता है। समकालीन समाज को यह स्वीकार करना ही होगा कि स्त्री की सत्ता केवल कर्तव्यों की वेदी पर बलि होने के लिए नहीं है, वरन उसे भी पुरुषों के समान अवसर, सहयोग और विश्राम का पूर्ण अधिकार है।
यह भी नितांत आवश्यक है कि परिवार के अन्य पुरुष व सदस्य उसकी इस बहुआयामी जिम्मेदारी में सहभागिता निभाएँ। यदि गृह का प्रत्येक सदस्य हाथ बँटाए, तो न केवल स्त्री का मानसिक बोझ कम होगा, वरन परिवार में आंतरिक सामंजस्य और अगाध प्रेम का संचार होगा। स्त्री-सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ उसे केवल स्वच्छंद छोड़ देना नहीं है, बल्कि उसके निर्णयों के साथ दृढ़ता से खड़ा होना और उसके संघर्षों को गरिमा प्रदान करना है।
उपभोक्तावाद, तकनीक और बिखरते अंतःसंबंध
बदलती और अनियंत्रित अपेक्षाएँ इस पूरे परिदृश्य को और अधिक उलझा देती हैं। आज का समाज तीव्र गति से उपभोक्तावाद की अंधी खाई की ओर बढ़ रहा है, जहाँ सफलता और श्रेष्ठता का मापदंड केवल भौतिक उपलब्धियों और आर्थिक संपन्नता से तय होता है। अधिक अर्जित करने, अधिक संचय करने और अधिक प्रदर्शन करने की इस अंधी होड़ में हम यह विस्मृत कर बैठे हैं कि जीवन का वास्तविक रस और आनंद आत्मीय संबंधों में ही निहित होता है।
इस महानगरीय आपाधापी में मानवीय भावनाएँ कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। संवादहीनता, समय का नितांत अभाव और आभासी (डिजिटल) दुनिया की कृत्रिम व्यस्तता ने सगे रिश्तों में भी एक मरुस्थलीय दूरी पैदा कर दी है। हम एक ही छत के नीचे रहते हुए भी परस्पर अजनबी होते जा रहे हैं। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि बिना जीवंत संवाद के कोई भी मानवीय संबंध दीर्घजीवी नहीं हो सकता। तकनीक ने निसंदेह हमारे भौतिक जीवन को सुगम बनाया है, परंतु इसके अति-उपयोग ने हमारे अंतस के मानवीय जुड़ाव को पंगु भी किया है। आज विवेकपूर्ण तकनीक-प्रयोग और प्राथमिकताओं के पुनर्निर्धारण की महती आवश्यकता है। हमें यह स्मरण रखना होगा कि कोई भी सोशल मीडिया या आभासी माध्यम, वास्तविक स्पर्श, स्नेह और अपनत्व का विकल्प नहीं हो सकता।
ग्राम-संस्कृति का विस्थापन और संयुक्त परिवारों का अवसान
हमारे ग्रामीण अंचल और परिवार की मूलभूत संरचना भी इस युगीन बयार से अछूती नहीं रही है। संयुक्त परिवार, जो कभी हमारे सामाजिक और भावनात्मक जीवन की सुरक्षा का अभेद्य दुर्ग हुआ करते थे, वे अब बिखरकर एकल परिवारों (न्यूक्लियर फैमिली) में तब्दील हो रहे हैं। इस विस्थापन ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को तो हवा दी है, परंतु इसके साथ ही सामूहिकता, सहकारिता और पारस्परिक सुरक्षा की भावना को गहरी क्षति पहुँचाई है।
गाँवों की वह पारंपरिक सादगी, निश्छल सहजता और आत्मीयता अब नगरीकरण के प्रभाव स्वरूप धुंधली पड़ती जा रही है। पुरातन मूल्यों का स्थान आधुनिक विचार ले रहे हैं—जो कि तार्किक दृष्टि से आवश्यक भी हैं—किंतु यदि इस वैचारिक संक्रमण में हम अपनी मूल संस्कृति, अपनी सनातनी जड़ों और अपने नैतिक मूल्यों को ही विस्मृत कर दें, तो ऐसी प्रगति एकांगी और खोखली सिद्ध होगी। हमें यह समझना होगा कि आधुनिक होने का अर्थ केवल पाश्चात्य भेष-भूषा या बाह्य आवरण का अंधानुकरण नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक अर्थ विचारों की परिपक्वता, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों की सुदृढ़ता है।
विवेक पूर्ण आधुनिकता और समग्र दृष्टि
अतः आज समय की पुकार है कि हम परिवर्तन को संकीर्णता से परे हटकर खुले मन से स्वीकार करें, परंतु उसे विवेक की कसौटी पर कसकर ही अपनाएँ। हमें यह भेद करना होगा कि कौन-सा परिवर्तन हमारे जीवन को ऊर्ध्वमुखी बना रहा है और कौन-सा हमें हमारी जड़ों से काटकर पहचानविहीन कर रहा है। हमें आधुनिक अवश्य बनना है, परंतु संवेदनहीन पाषाण नहीं; हमें स्वतंत्र अवश्य होना है, परंतु अपनों से विमुख होकर एकाकी नहीं।
हमें अपने अधिकारों के जयघोष के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के मूक निर्वहन को भी समझना होगा। हमें यह कला सीखनी होगी कि कैसे हम अपने व्यक्तिगत अभ्युदय और अपने पारिवारिक संबंधों के माधुर्य के मध्य एक सुंदर सेतु निर्मित कर सकें। यही सम्यक संतुलन हमें एक सार्थक, समृद्ध और आनंदमय जीवन की ओर अग्रसर करेगा।
और अंततः, सबसे मुख्य विचारणीय बिंदु—हमें स्त्री को केवल उसके द्वारा निभाए जाने वाले सामाजिक दायित्वों या भूमिकाओं के संकुचित चश्मे से देखना बंद करना होगा। हमें उसे एक स्वतंत्र इकाई, उसके विराट व्यक्तित्व, उसके मूक संघर्षों, उसकी सूक्ष्म भावनाओं और उसके अनंत सपनों के धरातल पर पहचानना होगा। उसे केवल पूजना या त्याग की प्रतिमूर्ति बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके अनथक प्रयासों की सराहना करते हुए उसे वह वास्तविक सम्मान और समता का अधिकार देना होगा जिसकी वह आदि-काल से हकदार है।
जब हमारा समाज स्त्री को इस गरिमा, समानता और वास्तविक आदर की दृष्टि से निहारेगा; जब हमारे संबंधों में पुनश्च संवेदनशीलता और गहरी समझ का रस घुलेगा, तभी हम एक ऐसे सुसंस्कृत समाज की संरचना कर सकेंगे, जहाँ परिवर्तन केवल सतही और बाह्य न होकर आंतरिक, मानवीय, कल्याणकारी और स्थायी होगा।
— शीला पात्रो