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साहित्य, संस्कृति, कला

इतिहास के पन्नों से बाहर आते गुमनाम नायक: राजेंद्र भवन में विनोद आनंद की कृतियों का ऐतिहासिक विमोचन

Byadmin

Aug 29, 2026
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शहीद रामफल मंडल के शहादत दिवस के अवसर पर विनोद आनंद की इन दोनों पुस्तकों का विमोचन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि राष्ट्र अपने सच्चे नायकों को कभी नहीं भूलता, भले ही उन्हें याद करने में पीढ़ियां बीत जाएं। ‘बाजपट्टी संग्राम के नायक’ और ‘धानुक चेतना के स्वर’ आने वाले दिनों में शोधार्थियों, इतिहासकारों और साहित्य प्रेमियों के लिए मील का पत्थर साबित होंगी। यह आयोजन महज एक पुस्तक विमोचन समारोह नहीं था, बल्कि यह विस्मृत होते इतिहास के पुनर्पाठ और सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम था।


डॉ. अमर जी मंडल
एम.ए.,MJMC (पी एचडी ) रिसर्च स्कॉलर एवं पूर्व व्याख्याता 

दिन था 23 अगस्त 2026 !  देश की राजधानी नई दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित प्रतिष्ठित राजेंद्र भवन का सभागार उस ऐतिहासिक क्षण का गवाह बना, जब स्वतंत्रता संग्राम के महानायक शहीद रामफल मंडल की शहादत दिवस पर आयोजित भव्य समारोह में भारतीय इतिहास के उन अध्यायों को प्रकाश में लाया गया, जो अब तक धूल की परतों के पीछे छुपे हुए थे। बिहार, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे विभिन्न राज्यों से पधारे प्रबुद्ध जनों, इतिहासकारों, साहित्य प्रेमियों और गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को एक राष्ट्रीय वैचारिक उत्सव का रूप दे दिया।

इस गरिमामयी समारोह को जिस बात ने सबसे अधिक ऐतिहासिक और जीवंत बनाया, वह था झारखंड के सुप्रसिद्ध विद्वान, लेखक और पत्रकार विनोद आनंद द्वारा रचित दो महत्वपूर्ण पुस्तकों—’बाजपट्टी संग्राम के नायक : रामफल मंडल’ (उपन्यास) और ‘धानुक चेतना के स्वर’—का भव्य लोकार्पण।

संघर्ष और अस्मिता का अनूठा संग

कार्यक्रम के केंद्र में रहीं ये दोनों पुस्तकें अपने विषय और प्रस्तुति के अनूठेपन के कारण पूरे सभागार में चर्चा और आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी रहीं। एक तरफ जहां पहला ग्रंथ औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ अदम्य साहस दिखाने वाले शहीद रामफल मंडल के जीवन संघर्ष को साहित्यिक कैनवास पर उकेरता है, वहीं दूसरी तरफ दूसरा ग्रंथ सदियों से उपेक्षित एक बड़े सामाजिक समुदाय की वैचारिक मुखरता और उनकी रचनात्मक उपस्थिति का दस्तावेज बनता है।

लेखक विनोद आनंद ने अपनी पत्रकारिता की पैनी दृष्टि और साहित्यकार की संवेदनशील कल्पनाशीलता का सुंदर समन्वय कर इन दोनों कृतियों के माध्यम से भारतीय समाज और इतिहास को एक अनमोल धरोहर सौंपी है।

‘बाजपट्टी संग्राम के नायक : रामफल मंडल’ – इतिहास और कल्पना का जीवंत दस्तावेज

इस उपन्यास का ताना-बाना मुख्य रूप से अमर शहीद रामफल मंडल के जीवन, उनके संघर्ष और देश के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान के इर्द-गिर्द बुना गया है। लेकिन लेखक का कौशल इस बात में निहित है कि उन्होंने केवल एक व्यक्ति के जीवन तक सीमित न रहकर, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बिहार के कोने-कोने में सुलग रही क्रांति की आग को भी इसमें पिरोया है।

​पुस्तक में तिथिवार ढंग से बिहार के विभिन्न स्थलों पर हुए विद्रोह, अंग्रेजों के दमन चक्र और स्थानीय शूरवीरों की शहादत की सूचनाओं को इस खूबी से गूंथा गया है कि पूरा उपन्यास एक धाराप्रवाह महागाथा बन जाता है। पाठक जब इसके पन्नों से गुजरते हैं, तो उन्हें महज एक काल्पनिक कथा का अहसास नहीं होता, बल्कि वे 1942 के उस दौर की गंध, संघर्ष की तपीश और स्वतंत्रता सेनानियों की धड़कनों को महसूस करते हैं।

उपन्यास में बाजपट्टी के उस ऐतिहासिक संघर्ष को रेखांकित किया गया है जहां रामफल मंडल ने अंग्रेजी हुकूमत के आगे झुकने के बजाय हंसते-ह हंसते फांसी के फंदे को गले लगाना स्वीकार किया। बिहार के उन तमाम गुमनाम शहीदों को इस पुस्तक में न्याय मिला है, जिनका योगदान इतिहास के मुख्य पृष्ठों में कहीं खो गया था।

‘धानुक चेतना के स्वर’ – उपेक्षित समाज की मुखर आवाज

विनोद आनंद की दूसरी कृति ‘धानुक चेतना के स्वर’ समकालीन वैचारिक और सामाजिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यह पुस्तक एक ऐसा जीवंत दस्तावेज है, जिसमें सदियों से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हाशिए पर धकेल दिए गए धानुक समुदाय के उन प्रबुद्ध, कर्मठ और प्रेरणादायी लोगों को यथोचित स्पेस मिला है, जो अपने बूते समाज और देश के निर्माण में अहम योगदान दे रहे हैं।

​लेखक ने इस पुस्तक में रिपोर्टाज शैली का बेहद प्रभावी इस्तेमाल किया है। रिपोर्टाज की तथ्यात्मकता और साहित्यिक स्पर्श का यह अनूठा मेल पाठकों को गहराई से झकझोरता है। यह केवल आंकड़ों या संघर्षों का ब्यौरा नहीं है, बल्कि यह उन व्यक्तियों की आत्मकथात्मक और संघर्षशील यात्राओं का संकलन है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा, कला, समाज सेवा और प्रशासनिक क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। यह पुस्तक समुदाय विशेष की चेतना को झकझोरने के साथ-साथ मुख्यधारा के समाज को यह आईना दिखाती है कि राष्ट्र निर्माण में हर उस इकाई का योगदान महत्वपूर्ण है जो लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रही है।

विचारों का महाकुंभ और वक्ताओं के उद्गार

समारोह में उपस्थित विभिन्न राज्यों से आए वक्ताओं ने इन दोनों पुस्तकों की प्रासंगिकता पर खुलकर अपने विचार रखे। वक्ताओं का एक स्वर में मानना था कि इतिहास केवल राजा-महाराजाओं या सत्ता के गलियारों में बैठने वालों का नहीं होता, बल्कि इतिहास असली अर्थों में उन आम लोगों के पसीने और खून से लिखा जाता है जो माटी से जुड़े होते हैं। शहीद रामफल मंडल जैसे नायकों को इतिहास के पाठ्यक्रम से दूर रखने की जो प्रवृत्ति लंबे समय तक चली, विनोद आनंद जैसी रचनाएं उस सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई करती हैं।

​राजेंद्र भवन के सभागार में गूंजे इन विचारों ने उपस्थित जनसमूह में एक नई ऊर्जा का संचार किया। दिल्ली की ठंडक के बीच वैचारिक गर्माहट से भरा यह आयोजन इस बात का प्रतीक था कि जब कोई लेखक अपनी माटी, अपने नायकों और अपने समाज के प्रति पूरी ईमानदारी से कलम चलाता है, तो वह रचना केवल एक किताब नहीं रहती, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले लेती है।

शहीद रामफल मंडल के शहादत दिवस के अवसर पर विनोद आनंद की इन दोनों पुस्तकों का विमोचन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि राष्ट्र अपने सच्चे नायकों को कभी नहीं भूलता, भले ही उन्हें याद करने में पीढ़ियां बीत जाएं। ‘बाजपट्टी संग्राम के नायक’ और ‘धानुक चेतना के स्वर’ आने वाले दिनों में शोधार्थियों, इतिहासकारों और साहित्य प्रेमियों के लिए मील का पत्थर साबित होंगी। यह आयोजन महज एक पुस्तक विमोचन समारोह नहीं था, बल्कि यह विस्मृत होते इतिहास के पुनर्पाठ और सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम था।

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