विनोद आनंद
विवसता मनुष्य को बुरा काम करने के लिए विवश कर देती है। लेकिन जब कोई एक बार बुरे कामों के चक्रव्यूह में उलझ जाता है, तो व्यवस्था उसे उस चक्रव्यूह में और अधिक जकड़ लेती है। यदि वह उस चक्रव्यूह को भेदकर निकलना भी चाहे, तो चाहकर भी बाहर नहीं निकल पाता। हालाँकि, कभी-कभी कोई अप्रत्याशित घटना उसे इस दलदल से बाहर निकलने की एक नई अंतर्दृष्टि दे देती है। ऐसा ही कुछ रामदास के साथ हुआ था।
मैं पटना रेलवे स्टेशन से धनबाद जाने के लिए ट्रेन पर चढ़ ही रहा था कि तभी किसी ने पीछे से दौड़ते हुए आवाज लगाई—”बाबू! एक मिनट सुनिएगा!”
मैं ठहर गया और भौंचक्का होकर उस अजनबी को देखने लगा। बाइस-तेईस वर्ष का एक युवक धीरे-धीरे चलकर मेरे पास आया। उसके गले में एक खोमचा लटका हुआ था, जिससे वह चना और झाल-मुड़ी तैयार करते हुए बोला—”साहब, आज आप मेरे हाथ की झाल-मुड़ी खा लीजिए!”
मुझे लगा कि शायद इस खोमचे वाले युवक का झाल-मुड़ी बेचने का अपना कोई अनोखा तरीका होगा। बिना किसी विशेष इच्छा के मैंने झाल-मुड़ी ले ली और उसे पाँच का नोट बढ़ाने लगा। लेकिन वह मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहने लगा—”ना साहब! मैं आपसे पैसे नहीं लूँगा।”
”क्यों भाई!” मैं अवाक् रह गया।
”क्या आपने मुझे पहचाना नहीं? मैं रामदास हूँ।”
”रामदास!” मेरा विस्मय और बढ़ गया। मैं किसी रामदास को नहीं जानता था। मैंने उसे पैसे थमाते हुए कहा—”शायद मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूँ।” मन में थोड़ा संशय भी होने लगा, क्योंकि आजकल बिहार के कई रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को बेहोश कर लूटने वाले गिरोह सक्रिय रहते हैं। मैं सोचने लगा कि कहीं यह युवक भी उसी गिरोह का हिस्सा तो नहीं है!
उसने मुस्कुराते हुए कहा—”साहब, आप कलकत्ता वाले उस रामदास को भूल गए, जिसकी जेब मैंने काटी थी और आपने मुझे रंगे हाथों पकड़ लिया था! फिर आपने मुझे एक कमरे में बंद करके पूरे दो दिनों तक नसीहत दी थी। मैंने तो आपको देखते ही एक ही नज़र में पहचान लिया था!”
अब धुंधली-सी यादें मेरे मानस पटल पर उभरने लगीं। यह सन् अस्सी की बात है। मैं एक परीक्षा देने के सिलसिले में कलकत्ता गया हुआ था। बस हावड़ा से भवानीपुर जा रही थी। ज्यों ही हम पीजी हॉस्पिटल के पास पहुँचे, मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मेरी जेब साफ कर रहा है। मैंने तुरंत पीछे हाथ बढ़ाकर उसका हाथ दबोच लिया। देखा तो वह तेरह वर्ष का एक मासूम बालक था। उसकी मासूमियत देखकर मुझे उस पर दया आ गई। इसलिए मैंने कोई हंगामा नहीं किया, बल्कि धीरे से उसके कान में फुसफुसाया—”चुपचाप मेरे साथ उतर जाओ, वरना हल्ला कर दिया तो तुम बुरी तरह पीट दिए जाओगे।”
भवानीपुर में बस रुकते ही मैंने इशारे से उस लड़के को नीचे उतार लिया। मेरे साथ मेरे तीन मित्र और थे, जो परीक्षा दिलाने में मेरी मदद करने आए थे। मुझे छोड़कर तीन अन्य युवकों को साथ देखकर उस पॉकेटमार बालक की सिट्टी-पीट्टी गुम हो गई। वह काँपते हुए कहने लगा—”साहब, मैंने बड़ी गलती की है। मुझे पुलिस के हवाले कर दीजिए, मैं अपनी सजा भुगत लूँगा।”
मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा—”नहीं-नहीं! तुमने ऐसी कोई बड़ी गलती नहीं की है।”
”तो फिर मुझे जाने दो, साहब!”
इस पूरे मामले से अनजान मेरे तीनों मित्र अवाक् होकर मेरी ओर देख रहे थे। मैंने रास्ते में उन्हें कुछ नहीं बताया। भवानीपुर में जिस ठिकाने पर हम ठहरे थे, वहाँ पहुँचने के बाद मैंने अपने मित्रों को सारी बात विस्तार से बताई। मेरी बात सुनते ही मेरे दो मित्र गुस्से से आगबबूला हो उठे और बोले, “मारो साले को!” लेकिन मैंने उन्हें शांत करवा दिया। इसके बाद, हमने उस पॉकेटमार बालक को एक कमरे में बंद करके बाहर से ताला लगा दिया और सामने के होटल में खाना खाने चले गए।
रात को लगभग आठ बजे जब हम लौटे और कमरा खोला, तो देखा कि वह सहमा हुआ एक कोने में दुबका बैठा है। कुछ देर तक वह हमारी तरफ टुकुर-टुकुर देखता रहा, फिर हिम्मत जुटाकर मेरे पास आया और मेरे पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगा—”साहब, मुझे छोड़ दो। मेरे पास सत्रह रुपये नहीं, सत्रह सौ रुपये हैं; आप सब रख लो, बस मुझे जाने दो।”
मैं आश्चर्यचकित रह गया—”सत्रह सौ रुपये! इतनी बड़ी रकम होने के बावजूद तुम पॉकेटमारी कर रहे थे?”
”तो क्या करता साहब! इस पूरी रकम में से मेरा हिस्सा मात्र सौ रुपये होता है, बाकी के सारे पैसे हमारे बॉस के पास जाते हैं। मैंने सोचा था कि आज आपके पास से जो मिलेगा, वह पूरा का पूरा मेरा अपना होगा।”
उसकी यह बात सुनते ही मेरे एक गुस्सैल साथी ने उसे लात मार दी और बोला—”साला, कितना ढीठ है!”
मैंने तुरंत उस मित्र को डाँटा, उस बालक को उठाया और अपने पास बिठाकर उसके प्रति अपनापन और आत्मीयता दिखाई।
यह देखकर उस बच्चे की आँखों से आँसू बह निकले, पर वह कुछ बोल नहीं पाया। उसकी दयनीय हालत देखकर मेरा दिल पसीज गया। मैंने अपने एक साथी को दस रुपये देकर उसके लिए खाना लाने को भेजा। बड़े प्यार से बिठाकर उसे भरपेट खाना खिलाया और उसका नाम पूछा। उसने अपना नाम ‘रामदास’ बताया।
खाना खाने के बाद जब मैंने उससे पॉकेटमारी करने की वजह पूछी, तो उसने जो दर्दनाक कहानी सुनाई, वह झकझोर देने वाली थी। उसके जैसे कई अनाथ बच्चों को एक शातिर गिरोह कलकत्ता के अलग-अलग हिस्सों में पॉकेटमारी करने के लिए मजबूर करता था। इस आपराधिक गिरोह को पुलिस का भी परोक्ष समर्थन प्राप्त था। जब ये बच्चे पॉकेटमारी करते हुए पकड़े जाते थे, तो पुलिस उनके पास से बरामद सारे रुपये खुद हड़प लेती और इन्हें छोड़ देती थी। रामदास ने मुझसे कहा था, “इसीलिए मैंने आपसे कहा था कि मुझे पुलिस के हवाले कर दीजिए, जहाँ से मैं आसानी से छूट जाऊँगा।”
रामदास ने अपनी पारिवारिक स्थिति के बारे में बताया कि उसके सिर पर पिता का साया नहीं है और उसकी माँ गंभीर रूप से बीमार रहती है। उससे तीन साल बड़ी एक बहन है, जो कलकत्ता में ही रहती है।
जब मैंने उसे समझाया कि “क्यों नहीं तुम यह घटिया काम छोड़कर कोई इज्जत की रोजी-रोटी कमाते हो?”, तो वह रोते हुए बोला—”साहब, यदि मैंने यह काम छोड़ा, तो हमारा बॉस मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा और मेरी बहन की इज्जत भी लूट लेगा। मैं इस चक्रव्यूह में बुरी तरह फँस चुका हूँ साहब! लाख चाहकर भी इससे बाहर नहीं निकल सकता।”
उसकी विवशता पर मुझे बहुत दया आई। मैंने उसे सलाह दी कि तुम रातों-रात यह शहर छोड़कर कहीं दूर भाग जाओ। मेरी यह बात सुनकर वह चुप हो गया और कुछ नहीं बोला। रात को उसे फिर से खाना खिलाकर हमने उसी कमरे में बंद कर दिया और हम सो गए।
अगली सुबह जब नींद खुली और उसका कमरा खोला, तो वह फिर हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा—”साहब, मुझे माफ कर दीजिए। आप लोगों की सजा देने का यह तरीका बहुत अजीब है। मैं यह शहर भी छोड़ दूँगा और यह धंधा भी हमेशा के लिए बंद कर दूँगा। मेरी बीमार माँ और बहन ने पिछले दो दिनों से कुछ नहीं खाया है। मुझ पर रहम कीजिए साहब, मुझे छोड़ दीजिए।”
यह कहते-कहते उसकी आँखें फिर से डबडबा गईं। मुझे उस पर सचमुच बहुत तरस आ गया और मैंने उसे आजाद कर दिया। साथ ही जाते-जाते यह हिदायत भी दी कि “भाई, अब एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करना और इन बुरे कामों से तौबा कर लेना।”
उस घटना के बाद मैं लगभग सब कुछ भूल चुका था। उसी रात मैं वापसी के सफर में धनबाद के लिए रवाना हो गया था।
आज अचानक पटना रेलवे स्टेशन पर उसे इस रूप में देखकर मुझे वह पुरानी घटना एक-एक करके याद आ गई। मैंने उत्सुकता से पूछा—”तो क्या तुम उस रात सचमुच कलकत्ता छोड़कर भाग गए थे?”
रामदास ने कृतज्ञता से भर आँखों से उत्तर दिया—”नहीं साहब! उस रात तो मैं नहीं भाग पाया था, लेकिन अगले दो दिनों तक मैं आपकी कही बातों पर गहराई से सोचता रहा। आखिरकार मैंने वहाँ से भागने का फैसला किया और पटना आकर यह साफ-सुथरा धंधा शुरू कर दिया। आज मैं जो भी हूँ, आपकी दी हुई उसी अंतर्दृष्टि की बदौलत हूँ।”