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ज़हर की थाली और व्यवस्था की लाचारी: हमारी सेहत पर मंडराता खतरा और जनप्रतिनिधियों की आपराधिक चुप्पी

Byadmin

Oct 18, 2026
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हाल ही में ग्रेटर नोएडा से एक ऐसी ही दहला देने वाली खबर सामने आई, जहां नूडल्स खाने से एक ही परिवार के पांच सदस्यों—माता-पिता और तीन मासूम बच्चों—की दर्दनाक मौत हो गई। दूसरी तरफ, दिल्ली के करोल बाग से एक बच्चे के सभी अंग (किडनी, लिवर और हार्ट) फेल होने का मामला सामने आया, जिसका कारण पाम ऑयल और निम्न गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों का सेवन बताया गया। ये घटनाएं केवल इक्का-दुक्का हादसे नहीं हैं, बल्कि यह उस सड़ी-गली और भ्रष्ट व्यवस्था का परिणाम है, जो मुनाफाखोरों और मिलावटखोरों के सामने पूरी तरह घुटने टेक चुकी है। रोजाना अखबारों के पन्नों और सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें आती हैं, लेकिन न जाने कितनी ही ऐसी मौतें और बीमारियां हैं जो कभी आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो पातीं। सवाल यह उठता है कि आखिर हम कब तक इस जानलेवा लापरवाही को सहते रहेंगे? क्या हमारा लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रैलियों, भाषणबाजी और सत्ता के खेल तक सीमित रह गया है?

( विनोद आनंद)

​आज भारतीय समाज एक बेहद खतरनाक और अमानवीय दौर से गुजर रहा है। सुबह की पहली किरण के साथ जिस थाली को हम अपने परिवार के सामने परोसते हैं, वह पोषण का स्रोत न होकर बीमारियों और मौत का जाल बन चुकी है। हाल ही में ग्रेटर नोएडा से एक ऐसी ही दहला देने वाली खबर सामने आई, जहां नूडल्स खाने से एक ही परिवार के पांच सदस्यों—माता-पिता और तीन मासूम बच्चों—की दर्दनाक मौत हो गई। दूसरी तरफ, दिल्ली के करोल बाग से एक बच्चे के सभी अंग (किडनी, लिवर और हार्ट) फेल होने का मामला सामने आया, जिसका कारण पाम ऑयल और निम्न गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों का सेवन बताया गया। ये घटनाएं केवल इक्का-दुक्का हादसे नहीं हैं, बल्कि यह उस सड़ी-गली और भ्रष्ट व्यवस्था का परिणाम है, जो मुनाफाखोरों और मिलावटखोरों के सामने पूरी तरह घुटने टेक चुकी है। रोजाना अखबारों के पन्नों और सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें आती हैं, लेकिन न जाने कितनी ही ऐसी मौतें और बीमारियां हैं जो कभी आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो पातीं। सवाल यह उठता है कि आखिर हम कब तक इस जानलेवा लापरवाही को सहते रहेंगे? क्या हमारा लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रैलियों, भाषणबाजी और सत्ता के खेल तक सीमित रह गया है?

​आज स्थिति यह हो गई है कि रसोईघर में इस्तेमाल होने वाली हर बुनियादी चीज में मिलावट का जहर घुला हुआ है। रोटी के लिए इस्तेमाल होने वाले आटे में खतरनाक मिलावट, मसालों में लकड़ी का बुरादा और ईंट का चूरा खुलेआम बिक रहा है। त्योहारों और आम दिनों में यूरिया, डिटर्जेंट और सिंथेटिक रंगों से बना दूध और खोआ बच्चों और बुजुर्गों की जान ले रहा है। सब्जियों को हरा-भरा और बड़ा दिखाने के लिए जानलेवा रसायनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। कोरोना काल में महंगी जीवनरक्षक दवाओं में पानी भरकर बेचने से लेकर दक्षिण भारत में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की नकली दवाओं का रैकेट सामने आना यह बताता है कि मानवीय संवेदनाओं का गला घोंट दिया गया है। बहुराष्ट्रीय और घरेलू कंपनियां भारत के नागरिकों के लिए जो दवाएं और खाद्य उत्पाद बनाती हैं, उनकी गुणवत्ता अलग होती है, जबकि निर्यात किए जाने वाले उत्पादों के मानक अलग होते हैं। आज देश में कैंसर, लिवर फेलियर, किडनी खराब होना और हृदयघात जैसी बीमारियां महामारी का रूप लेती जा रही हैं। डॉक्टर और स्वास्थ्य विशेषज्ञ चीख-चीख कर कह रहे हैं कि प्लास्टिक के बर्तनों का इस्तेमाल और मिलावटी खान-पान इन सबका मुख्य जवाबदेह है। इसके बावजूद, सरकार और संबंधित विभाग इस पर कोई ठोस प्रतिबंध लगाने या कड़े कदम उठाने में पूरी तरह असफल रहे हैं।

​इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल उन संस्थाओं और विभागों की भूमिका पर उठता है, जिन्हें जनता की सुरक्षा के लिए करोड़ों रुपये के बजट के साथ खड़ा किया गया था। देश में खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन जैसे दर्जनों विभाग मौजूद हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बाजार में बिकने वाली हर वस्तु शुद्ध और सुरक्षित हो। लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। इन विभागों के अधिकारी कुर्सियों पर बैठकर केवल मासिक वसूलियों का नेटवर्क चलाते हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक भ्रष्टाचार का एक ऐसा चक्रव्यूह बना हुआ है जहां मिलावटखोर और ड्रग माफिया खुलेआम छूट खरीदते हैं। अधिकारी अपनी नौकरी के दौरान अकूत संपत्ति जुटाते हैं और अंततः करोड़ों के साम्राज्य के साथ सेवानिवृत्त हो जाते हैं। आज स्थिति यह है कि शासन और प्रशासन दोनों स्तरों पर नैतिक मूल्यों का पूरी तरह पतन हो चुका है। सरकार ने न तो कभी किसी बड़े मिलावटखोर गिरोह के खिलाफ नजीर पेश करने वाली कार्रवाई की है, और न ही संसद या विधानसभाओं में इस जनस्वास्थ्य आपातकाल पर कोई गंभीर चर्चा होती है।

​आज का राजनेता जनता की गाढ़ी कमाई से मिलने वाले टैक्स के पैसों पर ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहा है। एक सांसद और विधायक के रखरखाव, वेतन, भत्तों और विदेशी दौरों पर जनता के करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। लेकिन जब जनता के बुनियादी अधिकारों, जीवन और स्वास्थ्य की बात आती है, तो सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसर जाता है। आज देश की मुख्यधारा की राजनीति विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा पर आधारित न होकर केवल और केवल हिंदू-मुसलमान और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर सिमट गई है। जनता को आपस में लड़ाकर वोट हासिल करना और सत्ता की मलाई खाना ही राजनीतिक दलों का एकमात्र एजेंडा बन गया है। जहरीला सामान बेचने वाले, नकली दवा बनाने वाले और मिलावट का काला कारोबार करने वाले लोग राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में करोड़ों रुपये का पार्टी फंड देते हैं। इसके बदले में इन माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण मिलता है, जिससे सरकारी अमला चाहकर भी उन पर हाथ नहीं डाल पाता। आज टीवी चैनलों के स्टूडियो से लेकर राजनीतिक मंचों तक जिस भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, उसने सभी संवैधानिक मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। विरोधी दलों और आवाजों को दबाने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों और सरकारी तंत्र का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है। जनता के असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए केवल गालियों और ओछी बयानबाजी की संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है।

​एक तरफ देश के लिए ईमानदारी से दिन-रात काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन योजना को बंद कर दिया जाता है, ताकि सरकारी खजाने पर बोझ न पड़े; वहीं दूसरी तरफ, चुनाव जीतने वाले हर सांसद और विधायक को आजीवन पेंशन और मुफ्त सुविधाएं दी जाती हैं। जब कोई जनप्रतिनिधि चुनाव लड़ता है, तो वह हाथ जोड़कर खुद को जनता का सेवक बताता है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद वही सेवक जनता का मालिक बन जाता है। वह संसद और विधानसभाओं में बैठकर ऐसे कानून बनाता है जो जनता का शोषण करें और उनके अधिकारों को सीमित करें।

​ऐसी भयावह और दयनीय परिस्थितियों में अब हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना आत्महत्या के समान है। यदि आज हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। इसके लिए हमें सामूहिक रूप से सजग होना होगा। जिस भी कंपनी की दवा या खाद्य उत्पाद नकली या मिलावटी पाया जाए, उसका और उसके सभी उत्पादों का पूर्ण बहिष्कार करें। चीनी उत्पादों की तर्ज पर उन सभी ब्रांड्स और खान-पान की चीजों जैसे मैगी, चाउमीन, मोमोज और फास्ट फूड संस्कृति का त्याग करें जो हमारी सेहत के लिए धीमा ज़हर हैं। अपने किचन से प्लास्टिक के सभी बर्तनों और डिब्बों को पूरी तरह बाहर करें। पारंपरिक और प्राकृतिक बर्तनों की तरफ वापसी करें। जो जनप्रतिनिधि जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी जरूरतों पर बात नहीं करता, जो धर्म के नाम पर समाज को बांटता है, उसे आगामी चुनावों में उसकी औकात दिखाएं। उसे सिरे से नकार दें और किसी भी कीमत पर वोट न दें। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर आवाज उठाएं, मिलावटखोरों की सूचना प्रशासन तक पहुंचाएं और सामाजिक स्तर पर एक जन आंदोलन खड़ा करें।

​ग्रेटर नोएडा और करोल बाग की घटनाएं मात्र दो आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह हमारी सामूहिक विफलता का चीखता हुआ दस्तावेज है। सरकारें आएंगी और जाएंगी, नेता अपनी रोटियां सेकते रहेंगे, लेकिन हमारी जिंदगी और हमारे बच्चों का भविष्य हमारे ही हाथों में है। अब समय आ गया है कि हम अपनी नींद से जागें, झूठे राजनीतिक नारों के मायाजाल से बाहर निकलें और एक मजबूत, सजग और स्वास्थ्य समाज के निर्माण के लिए सही निर्णय लें। जागो, भारत के नागरिकों, जागो! इससे पहले कि यह ज़हर हमारी पूरी पीढ़ी को लील जाए, अपनी ताकत पहचानो और इस निकम्मी व्यवस्था को बदलकर दिखा दो!

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